कार्य का फल परिणाम

कार्य और नियोजन; परीणाम (Results)का आधार है! सत्ता के उद्देश्यों पूर्ती के लिये सभी को कष्ट लेने होंगे!
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  *वर्षावास अवसर पर आयोजित कार्यक्रम दि.26/10/2019 को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले, शेगांव रहाटगाव अमरावती अभ्यासिका मे धम्मक्रांती विषय पर यह विचार व्यक्त किये.*
   *समाजिक समानता मतलब सर्वसामान्य जिवन मुल्य जो जिवन के हर क्षेत्र मे सभी को समानता से लागु हो जिसे सामाजिक लोकतंत्र कहा जाता है यह एक ऐसी जीवन शैली जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन का मूल सिद्धांत मानती हो जो सहजीवन है; लेकिन समाजिक वास्तव विपरीत है सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम असमानता से ग्रस्त है. हर बडे क्षेत्रों मे व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विवेक से निर्णय लेनेकी अनुमति नही है अनके क्षेत्र का आका हुक्म देता है वही करना होता है मतलब व्यक्तिगत और माणसिक गुलामगी मे रहना स्वतंत्रता है? समानता वह भेदभाव रहीत केवल निसर्ग प्रदान करता है वह सभीको पंच तत्व समानता से प्रदान करता है ऐसी समानता समाज मे प्रस्तापित है? बंधुत्व भ्रातृत्व भाईचारा सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना; हम एक जनसमुदाय को समाज मानते है जो सामाजिक जीवन को एकता और एकजुटता प्रदान करता है? व्यक्ति के सामाजिक जिवन मुल्य स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व को हासिल करना आसान है?*
*समाज का पिडीत,शोषित वर्ग एसी स्थीती मे राजनीतिक सत्ता को हासिल करना चाहते है उन्होनेे सुना है पढा है के, "जावो अपने घर की दिवाल पर लिख दो के, हमे इस देश का शासक, हुक्मरान, बनना है"!!!*

*समस्या के तत्थ और ऊपाय*
    *राजनीतिक लोकतंत्र को सामाजिक लोकतंत्र कैस बनाये? राजनीतिक सुधार से पहले सामाजिक सुधार करने के लिये कोई तैयार नही है क्यो की यह दिर्घ कालिन प्रक्रिया है सामाजिक बुराइयों के विरुद्ध लडना यह कठिन कसरत है और राजनीती क्षेत्र में खुद को उभारना और कार्य करना यह तुलनात्मक आसान है और हम सामाजिक और राजनीतिक व्याकरण को जाने बगैरे राजनीतिक परिणाम चाहते है.*
    *भारत देश एक राष्ट्र मान कर हम बहुत बड़ी गलतफहमी पाल रहे हैं हम कई हजार जातियों में बंटे हुए लोग भला एक राष्ट्र कैसे हो सकते हैं? भारत मे हजारों जातियां और उपजातियां राष्ट्रविरोधी है. जाती आधार पर धर्म सत्ता एक विशिष्ट वर्ण के हात मे, राजसत्ता दुसरे वर्ण के हात मे और अर्थसत्ता तिसरे वर्ण के हात मे है. सामान्य व्यक्ति की प्राथमिक जरुरतो का अभाव अर्थीकता की समस्या से है. धर्म के क्षेत्र में भक्ति व्यक्तिगत मुक्ति का मार्ग हो सकता है, परंतु राजनीति में भक्ति या नायक पूजा पतन और अंतत: तानाशाही का सीधा रास्ता है. यह सारी बाते सामाजिक असमानता को दर्शाती है.*
   *लोकतांत्रिक राष्ट्र के निर्माण मे और राजनीतिक ध्येय हासिल करने मे समाज की सही समस्या "जाती" और "जातीवाद" है जाति प्रथा भारत के आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास में सबसें बड़ा रोडा है और उनके विनाश के लिए डॉ. बाबासाहब आंबेडकर ने(The Annihilation Of Caste)मे सुझाया गया तरीका ही सबसे उपयोगी है.*
*कोशिश ओर वास्तव*
*जाती के आधार पर राष्ट्र का निर्माण और नैतिकता का निर्माण करने का प्रयास करना मतलब उसमें दारारे कायम करना है.*
*सहभोजन से जातीय भावना एवं जातीवाद नष्ट नही हुआ.*
*अंर्तजातीय विवाह से खून की मिलावट से अपना पराया यह भावाना निर्माण होती है लेकीन इस कार्य के लिये सामाजिक और राजनीतिक स्तर पर कोई परिवार खुद होकर रोटी बेटी व्यवहार के लिये कोशिश नहीं करता.*
*जाती की भावना जनमानस के मन मे निर्माण करने का कार्य धर्म और धर्मशास्त्र करते है, वेद, धर्मशास्त्रो की पवित्रता के विश्वास को नष्ट कर सच्चाई का एहसास जनमानस मे जागृति लाकर.*
*मानवता के उद्धरण हेतु समाज के लिये विचारधारा और जिवन पद्धति बुद्ध और उनका धम्म है. एकमात्र मार्ग धर्म परीवर्तण है जो विचार कृती और सन्मानसेभी महत्वपूर्ण है.*
      *वास्तव को समझना जरुरी है, समाज मे जिनकी धर्मसत्ता होती है उनकी राजसत्ता भी होती है क्यो की, राजनीतिक क्रांती का स्त्रोत धर्मसत्ता है जो धर्म सत्ता पर कार्य करेगा वह राजनीतिक सत्ता हासिल करेगा ईतीहास गवाह है और मिसाल भी!!!*
१)ल्यूथर ने धर्म पर कार्य किया यूरोप मे उनकी राजसत्ता स्थापित हुई.
२)प्युरीटीनीझम के प्रभाव से इंग्लैंड मे राजसत्ता स्थापित हुई.
३)मो.प्रेषित ने धर्म पर कार्य किया अरब मे राजसत्ता स्थापित हुई.
४)चंद्रगुप्त मौर्य के वक्त भगवान बुद्ध की तत्वो और प्रभाव से १३१ वर्ष दीर्घकाल तक मौर्य साम्राज्य की राजसत्ता रही.
५)छत्रपति शिवाजी महाराज के पूर्व संतो ने जनमानस मे धार्मिक विचारोसे राजसत्ता स्थापित कर पाये.
६)संत गुरूनानक द्वारा जनता मे धार्मीक विचारधार से सिख्खो की राजसत्ता स्थापित हुई.
  *राजनीतिक विकास के लिए लोगों के विचारों, मन व बुद्धि की शुद्धि (emancipation of mindand soul) तथा मन की आजादी बहुत जरूरी है.*
   *डॉ.बाबासाहब अंबेडकर औऱ भगवान बुद्ध की विचारधारा जनमानस द्वारा अपनाये बगैर कैसे राजसत्ता प्रस्थापित होगी? अनुयायी को कडी मेहनत कर स्वयं आचरण कर स्वयं समाज मे आदर्श व्यक्ति बनकर मिसाल कायम करनी होगा ताकी लोग अनुयायी की तरह बनने को प्रेरित हो! समाज के जनमानस मे धम्म का प्रचार, प्रसार और अभ्यास द्वारा धम्म प्रचारको का निर्माण. बुद्ध धम्म को सर्वव्यापी बनने हेतु और “जाति प्रथा का विनाश” करने हेतु "धर्मांतर" "हर व्यक्ति ने हर व्यक्ति को दिक्षा के लिये प्रेरित कर दिक्षीत करना मतलब धम्मचक्र को अधीक गतीमान करना; भारत मे धम्मराज्य का निर्माण करना दुनीया को बुद्ध के धम्म के अलावा कोई और पर्याय नही है क्योंकि बुद्ध और उनका धम्म तत्वज्ञान ही समस्या का समाधान है.*
संदर्भ:-डॉ.बाबासाहब आंबेडकर लिखीतThe Annihilation Of Caste

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