ईतीहास जो हकीकत बयाँ करें.
ईतीहास जो हकीकत बयाँ करें.!!!
*डॉ. बाबा साहब अंबेडकर ने आरक्षण मांगा नहीं था और न आरक्षण के लिए संघर्ष किया था बल्कि उन्हें आरक्षण लेने के लिए मजबूर किया गया था, जानिए कैसे ?*
डॉ. बाबा साहब अंबेडकर ने शोषित बहुजन समाज के लिए जीवनभर सघर्ष किया था लेकिन उनका इरादा कभी भी समाज को आरक्षण दिलाने का नहीं रहा और न कभी उन्होंने आरक्षण के लिए संघर्ष किया तथा न कभी अंग्रेजों के सामने आरक्षण की माँग रखी लेकिन फिर भी आरक्षण मिला और वह भी डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की बदौलत ही मिला।
डॉ.बाबा साहब अंबेडकर जानते थे कि आज का शोषित बहुजन समाज सिन्धु घाटी सभ्यता के समय तक इस देश का राजा हुआ करता था लेकिन आर्यों ने उन्हें साम दाम दण्ड भेद नीति अपनाकर गुलाम बना लिया था इसलिए डॉ.बाबा साहब अंबेडकर का संघर्ष बहुजन समाज को पुनः इस देश का राजा बनाने के लिए था और उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि लोकतंत्र में राजा वोटों से ही बन पाता है इसलिए बाबा साहब अंबेडकर ने अंग्रेजो के सामने एक नहीं बल्कि दो वोट की माँग रखी थी एवं साथ ही पृथक निर्वाचन का अधिकार भी मांगा था।
डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की तार्किक दलीलों एवं उनकी विदत्ता एवं बुद्धिमत्ता से शोषित समाज की सही एवं मजबूत तरीके से अंग्रेजी हुकूमत के समक्ष पेश की गई तस्वीर के आगे अंग्रेजों को झुकने पर मजबूर होना पड़ा और लन्दन गोलमेज सम्मेलन में बाबा साहब की दोनों मांगे मान ली गयी जिन्हें *कम्युनल एवार्ड* के नाम से जाना जाता है।
लेकिन जब गांधीजी को पता चला कि डॉ.अंबेडकर दो वोटों का अधिकार लेकर आ गये हैं और इस अधिकार के बल पर अब शोषित बहुजन समाज को राजा बनने से कोई नहीं रोक सकेगा तब गांधीजी ने इसे रोकने के लिए आमरण अनशन शुरू करने का षड्यंत्र रचा वैसे उन्होंने षड्यंत्र रचा ही नहीं बल्कि येरवदा जेल के अन्दर तुरंत ही आमरण अनशन शुरू भी कर दिया।
गांधीजी के आमरण अनशन की खबर बाबा साहब अंबेडकर को मिली तो बाबा साहेब ने कहा कि गांधीजी ने हमारे खिलाफ सबसे खतरनाक हथियार काम मे लेना शुरू कर दिया है।
गांधीजी के आमरण अनशन से बाबा साहब पर कोई असर पडता दिखाई नहीं दिया तब उनके लोगों द्वारा बाबा साहेब को मारने पीटने एवं हत्या करने का डर दिखाकर भयभीत करने का प्रयास किया गया लेकिन तब भी बाबा साहब टस से मस नहीं हुए और कम्युनल अवॉर्ड से समझौता करने की बजाय उनके हाथों मर जाना ही बेहत्तर समझा। लेकिन गांधी एंड कम्पनी बाबा साहब को मारना भी नहीं चाहती थी क्योंकि बाबा साहब के अलावा उस फैसले को कोई भी व्यक्ति बदलवा नहीं सकता था इसलिए बाबा साहब को जिंदा रखना उन लोगों की मजबूरी बन गई थी।
अब क्या करें उन लोगों को कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था अंत में उन्होंने बाबा साहब अंबेडकर की कमजोरी को ढूंढना शुरू किया और अंत में उनको बाबा साहब अंबेडकर की एक कमजोरी मिल गई और वह कमजोरी यह थी बाबा साहब अंबेडकर को शोषित समाज अथवा अछूत समाज बहुत प्रिय था, अछूत समाज के दुख दर्दों को देखकर बाबा साहब अंबेडकर की आंखों से आँसू टपकने लग जाते थे और वे दुखी होकर कहते थे कि तुम लोग मर क्यों नहीं जाते हो, तुम्हारी ये दुर्दशा मुझसे देखी नहीं जाती है।
बाबा साहब अंबेडकर की इसी कमजोरी का फायदा उठाकर गांधी एंड कम्पनी ने देश भर में अछूत समाज को परेशान करना शुरू कर दिया और खतरनाक योजना बना डाली कि यदि डॉ. भीमराव अंबेडकर अपनी जिद्द नहीं छोड़ता है तो अछूत समाज की बस्तियों को जला डालो एवं जमकर मार काट मचा दो।
पूरे देश से बाबा साहेब अंबेडकर के पास तार आना शुरू हो गए कि बाबा साहब हमारा जीवन खतरे में है ये लोग हमें काट डालेंगे और मार डालेंगे एवं कई जगहों पर तो बस्तियों को जलाना भी शुरू कर दिया गया तब बाबा साहब ने सोचा कि जब मेरा समाज ही नहीं रहेगा तो अधिकार फिर किस काम आएंगे।
तब आखिर में बाबा साहब अंबेडकर पूना यरवदा जेल में गांधी जी से मिलने पहुंचे और उनसे कहा कि गांधीजी आप क्यों हमारे साथ नाइंसाफी कर रहे हो तब गांधीजी ने कहा कि ऐसा करना मेरे लिए जरूरी है और वैसे भी मैं स्वयं भी आपके साथ हूँ मैं और मेरी कॉंग्रेस के लोग अस्पृश्यता और जातिवाद को खत्म करने के लिए पूरे देश में अभियान शुरू करने वाले हैं।
अंत में बाबा साहेब अंबेडकर ने कहा कि ठीक है यदि हम कम्युनल अवॉर्ड की मांग छोड़ देते हैं तो इसके बदले हमें क्या मिलेगा तब गांधीजी ने स्वयं ही आरक्षण देने की पेशकश की थी।
बाबा साहेब अंबेडकर को मजबूरीवश आरक्षण की पेशकश स्वीकार करनी पड़ी
24 सितंबर 1932 को पूना में बाबा साहब अंबेडकर और गांधीजी ने एक समझौते पर हस्ताक्षर किए जिसे पूना पैक्ट के नाम से जाना जाता है। हस्ताक्षर करने के बाद बाबा साहब अंबेडकर ने कहा कि मेरे जीवन के इतिहास में आज का दिन काला दिन है आज मैं बहुत दुखी हूँ क्योंकि मेरे समाज के लिए जो अधिकार मैं लेकर आया था उनको आज लकवा मार गया है।
बाबा साहब को मालूम था कि अब विधानसभाओं और संसद में हमारे समाज के जो प्रतिनिधि चुनकर आएंगे वे निकम्मे और चमचे बनकर रह जायेंगे, इसीलिए बाबा साहब अंबेडकर राजनीतिक आरक्षण से खुश नहीं थे लेकिन उन्होंने सोचा कि एक या दो बार परखना भी जरूरी है इसलिए राजनीतिक आरक्षण केवल दस वर्षों के लिए ही किया गया और उसके बाद इसकी समीक्षा की जानी थी यदि हमारे इन प्रतिनिधियों से समाज को कोई लाभ होता दिखाई दे रहा है तो आगे बढ़ा दिया जाये वरना दस वर्ष बाद राजनीतिक आरक्षण को खत्म कर दिया जाये।
बाबा साहेब यह भी अच्छी तरह जानते थे कि गांधीजी ने अश्पृश्यता और जातिवाद खत्म करने का वायदा जरूर किया है लेकिन जातियां इतनी जल्दी खत्म नहीं होंगी इसलिए बाबा साहब अंबेडकर ने संविधान में प्रावधान किया था कि जब तक जातियाँ रहेंगी तब तक शिक्षा व सरकारी नौकरियाँ एवं बजट में आरक्षण बना रहेगा।
जिस राजनीतिक आरक्षण को दस वर्ष के बाद बाबा साहब अंबेडकर खत्म करना चाहते थे उसे तो ये लोग बिना मांगे ही हर दस वर्ष बाद बिना किसी शोर शराबे के चुपचाप बढ़ा देते हैं और जिस आरक्षण को जातियों के रहने तक लिखा गया है उसे मिटाने के लिए हो हल्ला मचा रखा है लेकिन ये लोग यह भी अच्छी तरह जानते हैं कि इस आरक्षण को खत्म करना आसान काम नहीं है इसलिए ये लोग आरक्षण के बारे में बोलते हैं कि हम लोग ऐसा काम करना चाहते हैं कि सांप भी मर जाये और लाठी भी न टूटे।
*अब आप अच्छी तरह समझ गये होंगे कि बाबा साहेब अंबेडकर ने न तो आरक्षण मांगा था और न आरक्षण के लिए संघर्ष किया था बल्कि उन्हें तो आरक्षण लेने के लिए मजबूर किया गया था।*
*विस्तृत जानकारी हेतु गोलमेज परीषद , पूना पैक्ट1932 का अध्ययन करे..!*
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