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Showing posts from May, 2025

मनुष्य का व्यक्तित्व बाहरी दिखावे से परे

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मनुष्य का बाहरी दिखना केवल भौतिकता है,जो समय के साथ धीरे-धीरे समाप्त हो जाती है। लेकिन असली खूबसूरती और स्थायित्व तो हमारे आंतरिक और बाहरी सकारात्मक गुणों के मेल में है। जब ये दोनों साथ मिलते हैं, तभी व्यक्ति का सच्चा व्यक्तित्व विकसित होता है। मुझे अक्सर कुछ लोगों द्वारा कहा जाता है कि कर्मचारी को लंबे बाल रखना ठिक नहीं उसका इसके प्रति उनका क्या दृष्टिकोण है? यह आजतक कोई बात नहीं पाया। लेबे बालों और रहन सहन के प्रति कुछ लोगों का अनोखा अनुभव आइए आपसे इस बारे में अनुभव साझा करता हूँ। हमारे एक मित्र पुलिस विभाग में कार्यरत हैं, जो स्वयं शराबी, भ्रष्टाचारी और अनैतिक हैं। उन्होंने कहा कि कर्मचारियों को लंबे बाल रखना ठीक नहीं। मुझे जवाब देना पड़ा, "जब मैं न्यायालय के विधि सेवा प्राधिकरण में कार्यरत था और कारागृह में ड्यूटी के लिए जाता था, तब मैंने हजारों बंदियों को अच्छे रहन-सहन में देखा। लेकिन उनमें शील और नैतिकता का अभाव था, इसलिए वे इस स्थिति में हैं।" यह अनुभव बताता है कि बाहरी दिखावा कभी-कभी आंतरिक गुणों को नहीं दर्शाता। असली मूल्य नैतिकता, शील और चरित...

जन्मदिन मनाना है तो आंशिक मदत के बदले समस्या को जड से खत्म कर सामाजिक बदलाव का जश्न मनाएं!

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कुछ लोग अपना जन्मदिन मनाना पसंद करते हैं,लेकिन डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था: "मुझे अपना जन्मदिन मनाना पसंद नहीं है। इसलिए मैंने युवाओं से भगवान बुद्ध का जन्मदिन मनाने को कहा..." (नई दिल्ली, 2 मई 1950) आजकल सोशल मीडिया पर जन्मदिन और शादी की सालगिरह को बड़ी धूमधाम से मनाने का फैशन चल रहा है। दुसरो को निजी तौर पर शुभकामनाएं देने से ज्यादा सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किया जाता है ताकि वफादारी प्रदर्शीत हो। जन्मदिन मनाएं, पर सोच भी बदलें! आजकल जन्मदिन और शादी की सालगिरह को बड़ी धूमधाम से मनाने का फैशन चल पड़ा है। क्या जन्मदिन मनाने का असल मकसद सिर्फ अपने लिए खुशियाँ मनाना ही रह गया है? जो बात निजी होती है, उसे जानबूझकर सार्वजनिक बना दिया जाता है। जन्मदिन मनाने का उद्देश्य योग्य होना चाहिए, जो बात निजी होती है उसे जानबूझकर सार्वजनिक बनाया जाता है और उसे सार्वजनिक कर प्रचार चलन बन गया है।आखिर उद्देश्य क्या होता है? अगर हम अपने जन्मदिन को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ दें, तो? जैसे संसाधन रहीत वंचित बच्चों को पढ़ने का मौका देकर पैरों पर खड़ा करना, किसी बेरोजगार को र...

समाज परिवर्तन की मशाल

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 संकल्प, संघर्ष और सफलता की कहानी हर युग में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो खुद के लिए नहीं, समाज के लिए जीते हैं। वे ना तो प्रसिद्धि की तलाश में होते हैं, ना ही सत्ता की। उनका एक ही उद्देश्य होता है – संघर्षरत समाज को दिशा देना, उसे संगठित करना, और उसके भीतर आत्मविश्वास भरना। ऐसे ही कुछ साथियों के साथ हमने एक छोटी सी शुरुआत की थी – बिना संसाधनों के, लेकिन गहरी निष्ठा के साथ। शुरुआत एक विचार से हुई... 6 मई 2012 को, जब हम कुछ युवा प्रतीयोगीता परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, तब हमें महसूस हुआ कि हमारे जैसे और भी कई साथी हैं जो पढ़ना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन उनके पास न तो पुस्तकें हैं, न मार्गदर्शन, और न ही सकारात्मक माहौल। हमने तय किया कि जो कुछ हमारे पास है, उसी से शुरुआत करेंगे। और इस तरह 'राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका' की नींव पड़ी। न सुविधाएँ थीं, न स्थान... लेकिन जज़्बा था! शुरुआत में हमने विद्यार्थियों को वह सुविधाएं दी जो हम न मिली लेकिन जमाने के हिसाब से कुछ कम होगा  पंखे, कुलर, लाइट सेपरेट टेबल कुर्सी  औ र बहुत सी किताबें। माहौल ऐसा था ह...

अभ्यासिका म्हणजे Mission payback to society

 

समाज द्वारा व्यवसाय निर्माण का संकल्प!

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🇸🇨🇪🇺☸️🇪🇺🇸🇨      हम लोग हर वर्ष समारोह मे नाच गाना,मनोरंजन मे लाखों रुपए खर्च करते हैं उत्साह को मनाते है परंतु इसका अतिरेक न हो समारोह करना ही हो तो वह मध्यम मार्ग से करना चाहिए। समारोह का पैसा याने समाज द्वारा निर्माण किया गया पैसा। अगर समाज का पैसा समाज द्वारा संसाधन का निर्माण कर समाज की अर्थव्यवस्था खडी करने के लिये उद्योग खडा करने मे मदत कि गई तो समाज की प्रगति होने मे मदत कि जा सकती है ऐसा करने से समाज में एक नई शुरुआत कि जा सकती है जिसकी शुरुआत सामाजिक गोलमेज परिषद अमरावती के माध्यम उसका आगाज हुआ है।       अमरावती महाराष्ट्र मे डाँ.प्रशांत रोकडे सर IRS (Additional Commission  Delhi) और टीम की सहायता से WE माने (Well faire Economy) व्यवसाय का निर्माण किया है। WE माने हम, हम याने समाज, समाज ने समाज के लिए संसाधनों का निर्माण कर, WE MALL,WE MART, WE FOOD और WE COSMETIC, इन व्यवसायो का निर्माण किया है और वह चलाने का प्रयास किया जा रहा है।       दि.14 जनवरी 2024 को समाजिक गोलमेज परिषद का आयोजन मा डाँ.प्रशांत रोकडे स...

Mission payback to society

 https://youtu.be/toIEjg6_Dck?si=czLUcMFzW7q0HtOr

Buddha

 

"विहार जहाँ अभ्यासिका वहाँ"

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"विहार जहाँ अभ्यासिका वहाँ" 🛣🛣🛣🛣🛣 "राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका" का निशुल्क सामाजिक उपक्रम... ☸☸☸☸☸ *२४ नोव्हेंबर १९५६ को सारनाथ मे डॉ.बाबासाहब आंबेडकर ने कहाँ था की, “हर बौध्दो का आद्यकर्तव्य है के वे जानकर समझकर हर रविवार को बुध्द विहार मे जाऐ तथा वहाँ उपदेश ग्रहण करे, वैसे ही प्रत्येक गावमें बुध्द विहार का निर्माण कर वहाँ सभा हेतु सभागृह बनाये.”* *डॉ. बाबासाहब के आदेश अनुसार बौध्द समाजने देहांतो बस्तियों, गांव, झुग्गी झोपडी एवं शहरो मुहल्ले मे छोटे बडे बुध्द विहार बनाने का प्रयास किया, (जिस जगह पर सामाजिक भवन/सभागृह है उसका उपयोग बुध्द विहार तथा अभ्यासिका के रूप मे इस्तेमाल किये जाने की जरुरत है) परंतू “बुध्द विहार मे हर रविवार को प्रत्येक बौध्द ने अपना अद्यकर्तव्य समझकर विहार मे जाकर वहाँ उपदेश धम्मदेसना ग्रहण करनी चाहीऐ,” ईस आदेश अनुसार डॉ. बाबासाहब को वंदनीय,पुजनीय माननेवाले बौध्द समाजाने दुर्लक्षीत कर आज्ञा की अवहेलना कर रखी है। जिस जगह बुध्द विहार है उस जगह कुछ विशिष्ट लोगों द्वारा विषेश:महीलाये और वृद्ध पुरुषो को विहारो म...

मूकनायक_का_लेख_हमारा_आंदोलन

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MUKNAYAK KA LEKH     आंदोलन में सक्रिय रुप से कार्य करने वाले अनुयायियों ने अपना इतिहास जानना जरूरी है डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अनुभूति करते हैं कि, बहिष्कृतोंकी उन्नति के लिए विभिन्न लोगों ने सेकडो वर्षोंसे प्रयास करते आए हैं। डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर लिखते हैं कि,हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए कितना प्रयास किया है उनका त्याग समर्पण यह समाज उद्धार के खातिर अपने आप को समर्पित किया इसी तरह हमें भी आंदोलन की विरासत को और इमानदारी से आगे बढ़ाना जरूरी है।       नदी का उदगम स्थल और उस का मार्ग बहुत छोटा होता है; लेकिन बाद में वह बडा होते जाते हैं, अंततः वे इतना बडा हो जाते हैं कि बड़े-बड़े जहाज भी उनके बीच से गुजरने लगते हैं। अर्थात इनकी शुरुआत बहुत छोटी होती है; लेकिन आगे चलकर उनका विस्तार इतना हो जाता है कि उनके बाद के वैभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर पाता है कि उनका पूर्व स्वरूप इतना सूक्ष्म होगा यह कल्पना कोई नहीं कर पायेगा इसी तरह हमारे बहिष्कृतों के आंदोलन का इतिहास हैं।अन्यान्य,अत्याचार, ऊंच-नीच,जातीयता और विषमता के चक्र में फँसा कोई भी देश या समाज कभी न...

मातंग_महारों_के_कष्ट

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#मुक्ता_सालवे_कक्षा #तिसरी_का_निबंध  ‼️‼️‼️  🔥🔥🔥🔥          लहूजी वस्ताद साल्वे मांतंग महारों के बच्चों को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में जाने के लिए प्रेरित करते थे। उस स्कूल में पढने वाली एक लड़की जिसका का जन्म 5 जनवरी 1843 को हुआ, नाम मुक्ता सालवे था। मुक्ता साल्वे नाम की मांतंग जाति की यह लड़की राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में पढ़ती थी। उस स्कूल के एक कार्यक्रम में उनसे निबंध लिखने को कहा गया उस वक्त मुक्ता साल्वे तीसरी क्लास में पढ़ती थीं। उसने एक निबंध लिखा उस समय उनकी उम्र 12 साल रही होगी।   यह निबंध 15 फरवरी 1855 को लिखा गया था। उनके उत्कृष्ट निबंध के लिए उन्हें सर मेजर कैंडी द्वारा पुरस्कृत किया गया था, अर्थात उनका निबंध इतना सराहनीय था कि उन्हें पुरस्कृत किया गया। इस निबंध को पढ़ने के बाद हमें तत्कालीन समाज के बारे में बहुत सी बातें पता चलेंगी साथ ही राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले उस समय स्कूल में किस तरह की शिक्षा दे रहे थे, उस समय के बच्चों को किस तरह का इतिहास पढ़ाया जाता था यह पता चलेगा यानी राष्ट्रप...

रमाई_चे_अर्थशास्त्र

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     रमाईचे व्यक्तीमत्व रेखाटताना साहितीकांनी आपल्या समवेत दिन दुबळी,गरीब, दारिद्र्यात असलेली रमाई रेखाटली या पलीकडची रमाई समाजाने शोधणे गरजेचे आहे. डॉ बाबासाहेब आंबेडकर आणि त्यांचा संसार सांभाळताना रमाईला करावी लागणारी धळपळ म्हणजे आर्थिक जुळवाजूळव.     आर्थिक दृष्टीकोनातून रमाई बद्दल केलेला विचार हा वेगळ्या पद्धतीने केलेला विचार होय त्यांनी सर्वाहून वेगळ्या पद्धतीने रमाईचा आर्थिक दृष्टीकोन मांडणे म्हणजे महापुरषांचे उदार पैलूंचे सकारात्मक प्रक्षेपण करणे होय. गोव-यातून आर्थिक उत्पन्नाचा विचार शंभर वर्षांपूर्वी रमाईने केला मात्र आज गोवऱ्या चे रुपांतर आज शेनाचे गट्टू जे औद्योगिक व्यवसायीकरण झाले आहे ज्यातून मोठ्या प्रमाणात नफा मिळवला जात आहे. आज गोव-या जाळण्या करीता औद्योगीक कारखाने व भट्टी,शव गृह ईत्यादी ठिकाणी उपयोग केला जात आहे अर्थातच आज व्यवसायाचे रुपांतर कारखाण्यात झाले आहे शंभर वर्षांपूर्वी रमाई ने हा व्यवसाय केला आज अर्थशास्त्रीय दृष्टीकोनातून रमाई मांडणे व अनुकरण करणे ही आजची वास्तवीकता झाली आहे.*     *साहित्यीक,लेखक, कवी यांनी केवळ ...

बौद्ध_गया_ऐतिहासिक_एवं_पुरातात्विक_प्रमाणों_के_आधार_पर_बौद्धों_को_लौटाया_जाय

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 ANDOLAN  ⛩️🇸🇨☸️🇸🇨⛩️     बौद्ध गया वह पवित्र स्थान जहाँ गौतम बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ, बौद्ध धर्म का सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक श्रद्धास्थल है। ऐतिहासिक और पुरातात्विक दृष्टि से यह सिद्ध हो चुका है कि बौद्ध गया गया का मूल स्वरूप बौद्ध धर्म से संबंधित है। हालाँकि, समय के साथ इस स्थल पर ब्राह्मणो का धार्मिक प्रभाव भी दिखाई देने लगे। विशेष रूप से, यहाँ स्तूपों को शिवलिंग और पांडवों से जुड़ी केवल कथाओं के कोई ठोस पुरातात्विक प्रमाण नहीं मिले हैं, जबकि बौद्ध धर्म से जुड़े अवशेष और अभिलेख बड़ी संख्या में पाए गए हैं। इसलिए, बोधगया का प्रशासन पूरी तरह से भारतीय बौद्ध भिक्षुओं को सौंपा जाना चाहिए, ताकि इसका मूल स्वरूप पुनःस्थापित किया जा सके। बौद्ध गया में बौद्ध धर्म के पुरातात्विक प्रमाण:- ⛩️⛩️☸️⛩️⛩️ चक्रवर्ती सम्राट असोक के अभिलेख और स्तंभ (3री शताब्दी ईसा पूर्व) चक्रवर्ती सम्राट असोक ने बोधगया में एक विशाल स्तंभ और सुरक्षा रैलिंग (रत्नाचक्र) का निर्माण करवाया, जो इस स्थल के बौद्ध महत्व को प्रमाणित करता है। हालाँकि, समय के साथ यह स्तंभ क्षतिग्रस्...

महाबोधि_महाविहार_को_मुक्त_न_करने_का_कारण_आर्थिक_स्वार्थ

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⛩️🇸🇨☸️🇸🇨⛩️       महाबोधि महाविहार बुद्ध गया न केवल बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र श्रद्धा स्थल है, बल्कि यह विश्व धरोहर स्थल भी है। यह वही स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस महाविहार की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता असंदिग्ध है। परंतु, विडंबना यह है कि यह पवित्र स्थल बौद्धों के बजाय ब्राह्मणवादी प्रशासन के नियंत्रण में रहा है इस विवाद के ऐतिहासिक,धार्मिक और आर्थिक पहलुओं को उजागर करने से यह प्रतीत होता है कि ब्राह्मणवादी नियंत्रकों ने आर्थिक लाभ के लिए अपने धर्मग्रंथों में लिखीं बातों को भी दरकिनार कर दिया है। #महाबोधि_महाविहार_को मिलने वाला दान और आर्थिक हित     महाबोधि महाविहार को देश-विदेश से बड़े पैमाने पर दान प्राप्त होता है। बौद्ध श्रद्धालु थाईलैंड, श्रीलंका, जापान, चीन, म्यांमार, भूटान और अन्य देशों से बड़ी संख्या में बुद्ध गया आते हैं और मंदिर को दान देते हैं। यहां पर आर्थिक प्रभाव तब देखा गया जब कोरोना महामारी के दौरान महाबोधि मंदिर में पर्यटन और दान में भारी गिरावट आई, जिससे बुद्ध गया को लगभग 50...

संस्कारशील_पीढी_ही_समाज_की_समस्या_का_समाधान_है

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🔥🔥🔥🔥     समाज की सबसे अहम समस्या व्यक्ति युवाओं का गुनहगार मनोवृत्ति का होना,नशे के आदी होना, क्रृरता, यह समाज द्वारा ही बोया गया बिज होता है। इस समस्या का समाधान भी जरूरी है। संस्कार केवल शिष्टाचार सिखाना नहीं है, बल्कि समाज की प्रमुख समस्याओं का एकमात्र समाधान भी है। महापुरुषों की विचारधारा और धम्माचरण का पालन करना ही चरित्रवान बनना है, जिससे व्यक्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जीवन जीने की अनुशासन, सामाजिक चेतना, आदर, प्रेम, सहयोग और जिम्मेदारी का बोध होता है। इसके साथ ही, मानसिक स्वास्थ्य और संपूर्ण व्यक्तित्व विकास भी होता है। हर मां-बाप परिवार ही संस्कारों की पहली पाठशाला होता है। यदि बच्चों को घर में ही सही मार्गदर्शन मिले, तो उन्हें बाहरी आकर्षणों और गलत चीजों से बचाया जा सकता है। लेकिन यदि माता-पिता और परिवार इस विषय में संदिग्ध है उनमें ही व्यक्ति को शिलवान और नैतिक बनाना और उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण निर्माण करने का अभाव हो तो वह व्यक्ति दिशाहीन होता है। योग्य संस्कार जो समाज और देश निर्माण में महत्वपूर्ण है वह व्यक्ति को शिलवान याने जिव हिंसा न...

डॉ_बाबासाहब_अंबेडकर_ने_धम्म_दिक्षा_के_कई_वर्ष_पहले_ही_बुद्ध_जयंती_मनाई_थी

🇸🇨🇪🇺☸️🇪🇺🇸🇨       *भारतीय बौद्ध महा सोसायटी औऱ शेड्यूल कास्ट वेलफेयर एसोसिएशन इनकी संयुक्तता से १९, २० एवं २१मई १९५१ को दिल्ली में बुद्ध जयंती का आयोजन किया था १९ को बड़ी रैली निकाली गई और २० तारीख को एक बहुत बड़ी सभा का आयोजन हुआ सभा के अध्यक्ष फ्रांस में रहने वाले भारत के वकील थे. डॉ.बाबासाब अपने भाषण में कहते हैं "मेरी ऐसी मनोकामना है कि भारत के अछूतोंने बुद्ध की शिक्षा काआत्मसात कर आचरण करें" पिछले वर्ष हम बुद्ध जयंती के लिए यहां एकत्रित हुए थे उस समय आज के इतना बड़ा समुदाय नहीं था लोगों में बुद्ध धम्म के बारे में लगाव देखकर मुझे अच्छा लग रहा है.*    *हम लोग इसीलिए बुद्ध जयंती मनाते हैं क्योंकि भारतीय समाज का अध:पतन दूर होगा.लोगों को बुद्ध की शिक्षा का अंगीकार करना बताने से पहले बुद्ध धम्म और हिन्दू धर्म का फर्क समझाना जरूरी है. चातुर्वर्ण मूर्ति पूजा एवं आध्यात्मिक तत्वों पर सामाजिक भेदभाव हिन्दू धर्म मे आधारित है* सामाजिक अधपतऩ एवं राष्ट्र का -हास ब्राह्मण शाही यह अभी का हिन्दू धर्म इनमे फर्क नही दिखता चातुवर्ण पर आधारभूत हिंदू धर्म की इमारत के कारण...