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The Buddha and his Dhamma Post 66 to 78

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पोस्ट 66 **राजा बिम्बिसार की धम्मदीक्षा**  *1) राजगृह मगधराज बिम्बिसार की राजधानी थी।*   *2) इतनी बड़ी संख्या में जटिलों (जटाधारी संन्यासियों) का दीक्षान्तर होने की सुनकर शहर का हर व्यक्ति तथागत बुद्ध के विषय में चर्चा करने लगा।*   *3) इस प्रकार राजा बिम्बिसार को पता चला कि तथागत बुद्ध शहर में आ गए हैं।*   *4) राजा बिम्बिसार ने मन में विचार किया: "अत्यंत सनातनी और दुराग्रही जटिलों का दीक्षान्तर करवाना साधारण बात नहीं है। निश्चित ही वे अर्हत और सम्यक सम्बुद्ध होंगे। वे विद्वान, सदाचारी, जगत का संपूर्ण ज्ञान रखने वाले, मानवों को मार्गदर्शन करने वाले सर्वश्रेष्ठ पुरुष और मानवजाति के गुरु होंगे। जो सत्य उन्हें स्वयं समझ में आया है, उसी सत्य का उपदेश वे करते होंगे।"*   *5) "जिसका आदि, मध्य और अंत कल्याणकारक है, जिसका आशय और शब्द दोनों अत्यंत सुंदर हैं, ऐसे धम्म को वे शिक्षा देते होंगे। संपूर्ण निर्दोष, शुद्ध और पवित्र जीवन का ही वे प्रसार करते होंगे। ऐसे महापुरुष का दर्शन लेना उचित है।"*   *6) इसलिए राजा बिम्बिसार मगध के बारह ...

The Buddha and his Dhamma Post 54 to 65

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पोस्ट 54 बुद्ध का पहला प्रवचन *1) एक-दूसरे का अभिवादन कर और कुशलक्षेम पूछने के बाद, उन पाँच परिव्राजकों ने बुद्ध से पूछा: "क्या आपका तपश्चर्या पर अभी भी विश्वास है?" बुद्ध ने नकारात्मक उत्तर दिया।* *2) बुद्ध ने कहा: "जीवन के दो अत्यंत छोर हैं - एक सुखोपभोग का और दूसरा आत्मक्लेश का।"* *3) एक कहता है: 'खाओ-पीओ, आनंद मनाओ, क्योंकि कल हम मरने वाले हैं।' दूसरा कहता है: 'सभी वासनाओं को मार डालो, क्योंकि वे पुनर्जन्म की जड़ हैं।' ये दोनों ही मार्ग मनुष्य के लिए अनुचित हैं, इसलिए उन्होंने उन्हें अस्वीकार किया।* *4) बुद्ध मध्यम मार्ग को मानने वाले थे - 'मज्झिम पतिपद' यानी बीच का वह मार्ग जो न तो उपभोग का मार्ग है और न ही आत्मक्लेश का।* *5) बुद्ध ने परिव्राजकों से कहा: "मेरे इस प्रश्न का उत्तर दो: जब तक तुम्हारा स्वत्व कार्यरत रहता है और उसे ऐहिक व पारलौकिक भोग की इच्छा रहती है, तब तक सारा आत्मक्लेश व्यर्थ ही नहीं है क्या?" उन्होंने उत्तर दिया: "आप जो कहते हैं, वह सही है।"* *6) "यदि तुम आत्मक्लेश के मार्ग से अपनी का...