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Showing posts from November, 2025

घर वापसी याने बौद्ध धम्म की दिक्षा

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      डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘Annihilation of Caste’ (जाति का विनाश) में कहा, “जब मैं धर्म बदलूँगा, तब मैं आपके बीच का नहीं रहूँगा”, इसका अर्थ था कि, मैं उस समाज का हिस्सा नहीं रहूँगा, जिसकी व्यवस्था ही मनुष्य को ऊँच-नीच में बाँटने पर आधारित है। डॉ बाबासाहेब आंबेडकर क्यों जाति-व्यवस्था के धार्मिक और सामाजिक मूल पर गहरा प्रहार कर रहे थे? ‘Annihilation of Caste’ मूल रूप से 1936 में जात-पात तोडक मंडल (लाहौर) द्वारा आयोजित सम्मेलन के लिए तैयार भाषण था। लेकिन जब आयोजकों ने देखा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का भाषण हिंदू धर्मशास्त्रों की जड़ पर प्रहार करता है, तो उन्होंने भाषण रद्द कर दिया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह भाषण स्वयं प्रकाशित किया और इसी कारण इसका ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ गया।       डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने महसूस किया था कि जाति का उन्मूलन केवल सामाजिक सुधार से नहीं होगा, क्योंकि जाति की जड़ें धर्मग्रंथों और श्रुति-स्मृतियों में हैं। जब तक लोग उसी धर्म में रहेंगे जो जाति को “दैवी आदेश” बताता है, तब तक समानता सम्भव नहीं।     इसलिए व...

विहार बनाने के उद्देश

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  🇪🇺🇸🇨☸️🇸🇨🇪🇺       राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका यह अभ्यासिका कम और विहार ज्यादा है। विहार बनानेके जो उद्देश बताएं गये है उन उद्देश्यों की पुर्तु करने का प्रयास करना जरूरी है। हमारे विहारों में अभ्यासिका अध्ययन तथा धम्म शिक्षा और आचरण के साथ साथ समय समय पर दुर दराजों से आएं मिशन और धम्म कार्य करने वाले कार्यकर्ता,अनुयायी गांव देहात के विद्यार्थियों तथा जरुरतमंद लोगों के लिए विश्राम तथा आश्रय की व्यवस्था अभ्यासिका द्वारा की जाती है। अन्य विहारों में भी ऐसी मदत समाज को होनी चाहिए तभी समाज को हमारे विहारों, वास्तूओं के निर्माण का उद्देश्य सफल होगा।       केरळ, तामिळनाडू, कर्नाटक, आंध्रा इन राज्यों से दिक्षाभूमी को चली बिस लोग की, असोका आंबेडकर धम्म यात्रा रॅली की व्यवस्था राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका शेगांव रहाटगाव जी.अमरावती अभ्यासिका ने की, धम्म यात्रा के साथ शहर के  विविध विहारों में जागृती अभियान कार्यक्रम भी चलाया गया।         18 मार्च 1956 को आगरा मे एक बुद्धविहार के उद्घाटन के मौ...

राजसत्ता के उद्देश्यों पूर्तीके लिये क्या कष्ट लेने जरुरी है। 🇸🇨🇪🇺☸🇪🇺🇸🇨

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कार्य नियोजन और परीणाम(Results) का आधार है!           समाजिक समानता मतलब सर्वसामान्य जिवन मुल्य जो जिवन के हर क्षेत्र मे सभी को समानता से लागु हो जिसे सामाजिक लोकतंत्र कहा जाता है यह एक ऐसी जीवन शैली जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को जीवन का मूल सिद्धांत मानती हो जो सहजीवन है; लेकिन समाजिक वास्तव विपरीत है सामाजिक और आर्थिक जीवन में हम असमानता से ग्रस्त है. हर बडे क्षेत्रों मे व्यक्ति को व्यक्तिगत स्वतंत्रता और विवेक से निर्णय लेनेकी अनुमति नही है अनके क्षेत्र का आका हुक्म देता है वही करना होता है मतलब व्यक्तिगत और माणसिक गुलामगी मे रहना स्वतंत्रता है? समानता वह भेदभाव रहीत केवल निसर्ग प्रदान करता है वह सभीको पंच तत्व समानता से प्रदान करता है ऐसी समानता समाज मे प्रस्तापित है? बंधुत्व भ्रातृत्व भाईचारा सभी भारतीयों के बीच भाईचारे की भावना; हम एक जनसमुदाय को समाज मानते है जो सामाजिक जीवन को एकता और एकजुटता प्रदान करता है? व्यक्ति के सामाजिक जिवन मुल्य स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व को हासिल करना आसान है?   समाज का पिडीत,शोषित वर्ग एसी स्थीती म...

भारतीय भाषाओं की जननी धम्म लिपी पाली भाषा है जिसकाअध्ययन दुनिया में जारी है।

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     जम्बूदीप के लोग पाली पाकुत जिसे धम्म लिपी कहा जाता है जो जनसामान्य भाषा थी बौद्ध और जैन तत्वज्ञान पाली पाकुत साहित्य में मिलते है। बौद्धों के बड़े पैमाने पर पुरातात्विक प्रमाण शिलालेखों पर बौद्ध साहित्य में उपलब्ध है। 1894 में लेखक गौरीशंकर हिराचंद ओझा की किताब भारतीय प्राचीन लिपि माला में लिखा है कि भारत की सबसे प्राचीन भाषा संस्कृत न होकर पाली है।     धम्म लीपी पाली भाषा से भारत की सारी भाषाओं की उत्पत्ति मानी जाती है। बौद्ध विद्वानों सबसे पहले (शब्द विद्या) व्याकरण का निर्माण किया। सातवीं सदी में नालंदा विश्वविद्यालय में पाली धम्म लिपी से जो भाषा बनी उसे हायब्रिड बुद्धीष्ट संस्कृत बनी इस पर पाली पाकुत का प्रभाव दिखता है इसलिए इसे संस्कृत समझ लिया जाता है यह आगे 11 व 12 वी सदी में क्लासिकल संस्कृत का आकार लेती है।      #धम्म_लीपी_पाली_भाषा का अध्ययन आज भी पूरी दुनिया में जारी है। ★ बुद्ध के धम्म से संबंधित सभी जानकारी का भंडार पाली भाषा में भरा हुआ है। ★ केवल भिखू ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी भी इस भाषा को सीख रही है। ★ पाली भाषा में...

अंधेरे में काली बिल्ली The Black Cat in the Dark

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     समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक शोषण, जातिव्यवस्था, गरीबी, अन्याय, अत्याचार, और अंधविश्वास पर प्रहार किए बिना केवल राजनीतिक परिवर्तन लाना याने "अंधेरे में काली बिल्ली खोजने जैसा" व्यर्थ प्रयास है।   यदि किसी अंधेरे कमरे में काली बिल्ली हो, तो वह दिखाई नहीं देगी। सच यह है कि कमरे में बिल्ली मौजूद होते हुए भी, अंधेरे के कारण वह दिखाई नहीं देती। यथार्थ यह है कि बिल्ली भी है और अंधकार भी है।     यदि कमरे में काली बिल्ली हो ही नहीं, लेकिन कहा जाए कि वहाँ काली बिल्ली है, तो बिल्ली के अस्तित्व के बिना भी ऐसा प्रतीत होगा जैसे वह वहाँ है। सत्य यह है कि अंधकार तो है परन्तु बिल्ली नहीं है। वास्तव में, गलत ढंग से और गलत दिशा में किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करना "अंधेरे में काली बिल्ली खोजने" के समान है।      समस्या का मूल ढूंढना आवश्यक है। जैसे अंधेरे में काली बिल्ली खोजने की बजाय अगर प्रकाश कर लिया जाए, तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि बिल्ली है या नहीं। एक बार प्रकाश होने पर बिल्ली को देखना संभव है। इसलिए समस्या के मूल स्रोत...