I cant breathe और आंदोलन

“I can’t breathe”, "मैं सांस नहीं ले सकता” मारता क्या न करता! उसने गुहार लगाई, गिड़गिड़ाया मरने वाले व्यक्ति ने सारी कोशिशें की लेकिन कृर संस्कृति का शिकंजे का पैमाना इतना अधिक था, के इन्सानीयत की आवाज को समझती कृरता गुंगी, बहरी और अंधी हो जाने से इंसान का मानवता के प्रति नैतिकता के व्यवहार की अपेक्षा शुन्य हो जाती है। USA अमेरिका की यह घटना, मिनेपोलिस शहर में 25 मई 2020 को पुलिस द्वारा एक अश्वेत अमेरिकी जॉर्ज फ्लायड की गला घोंटकर हत्या के पश्चात अमेरिका का श्वेत और अश्वेत समुदाय सड़कों पर उतर कर मानवीय अत्याचार के खिलाफ आंदोलन खड़ा करते है। सत्ताधारी श्वेत मानसिकता द्वारा अश्वेतों पर अत्याचार से कृर हत्या के खिलाफ अश्वेतो के आंदोलन का नेतृत्व श्वेतो द्वारा बढ़-चढ़कर आगे आकर आंदोलन का नेतृत्व श्वेत अश्वेत से उपर उठकर केवल मानवीय दृष्टिकोण अंकित करता है जो भारत के सामाजिक दृष्टिकोण से पुरी तरह विपरीत है। वहां अश्वेतों के कारण केवल भेदभाव होता है लेकिन भारत में अनुसुचीत जाती जनजिती होने के कारण भेदभाव अत्याचार के साथ हत्याएं भी होती है।
       2014 न्यूयॉर्क में इसी तरह की परिस्थितियों में एरिक गार्नर की हत्या कर दी गई थी। अपराधी का अपराध जो भी हो लेकिन पुलिस द्वारा जाॅर्ज और एरिक पर जो भी तरीके आजमाए वो विभागीय नियमों का उल्लंघन है सजा देने का कार्य न्याय व्यवस्था का है भारत में इस तरह की घटनाएं आम हैं भारत देश में हजारों जॉर्ज फ्लायड और एरिक गार्नर कुचले जा चुके है।
     किलवेनमनी तामिळनाडु मे 44 शेड्यूल कांसर्ट को जिंदा जलाया था जिसमें 23 बालक थे, विल्लूपुरम में शेड्यूल कास्ट महिलाओं द्वारा विनय भंग के विरोध मे 12 लोगों को मारा गया,बथानीटोला में 20 शेड्यूल कास्ट में 1 पुरुष और 19 बच्चों और महिलाएं मारे गये, लक्षमणपूर बाथे 58 लोगों की हत्या, त्सुडर आंध्र प्रदेश मे 8 लोगों की हत्या, मंजोलाई ओरिसा 17 लोग मारे गए, महाराष्ट्र रमाबाईनगर मुंबई 11 लोग गोलीबारी में शहीद, खैरलांजी 3 लोग, खर्डा ,पंजाब मे ट्रॅक्टरसे कुचलकर मारना,मोबाईल में रिंगटोन बजाने पर जान से मारा, गुजरात मे अमानुष अत्याचार कर लघुशंका कर बहिष्कार करना;
जॉर्ज फ्लायड की आवाज“I can’t breathe”,को उजागर करने के लिये USA का मिडिया और बुद्धीजीवी लोगों ने धैर्यताका परीचय दिया है लेकिन भारत में अत्याचार पिढीत लोगों को “I can’t breathe” कहने का अवसर भी नहीं दिया गया ना ही मिडिया ने इंसानियत दिखाई यहां की पत्रकारीता, मिडीया केवल मात्र पेट भरने का जरिया है जो चापलूसी से प्राप्ती का नतीजा है। ऊपरी घटनाएं यह दो देशों में मानवता के प्रति वैचारिक और नैतिक पारदर्शिता का फर्क उजागर करता है।
    भारत और USA के घटनाक्रम को जानने के बाद भारत देश मे घटी सारी घटनाओं के खिलाफ आवाज उठाने, न्याय दिलाने हेतु कितने स्पृशोने आंदोलन किये? जिस तरह अमेरिका में श्वेतो ने अश्वेतों के लिये आंदोलन किये उस तरह भारत के स्पृशोंने अस्पृशों के लिये कितने आंदोलन किये? ऐसा एकभी उदाहरण दिखाई नहीं देता है जातीवादीय अत्याचार के खिलाफ जब तक समाज का स्पृश वर्ग अस्पृशों कीं लड़ाई नहीं लड़ता तब तक सही मायने में भारत राष्ट्र निर्माण में बाधा है स्वतंत्र,समता,बंधुता और न्याय स्थापीत करने का सपना मात्र सपना ही रह जाती है!!!

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