महाबोधि_महाविहार_को_मुक्त_न_करने_का_कारण_आर्थिक_स्वार्थ


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      महाबोधि महाविहार बुद्ध गया न केवल बौद्ध धर्म का सबसे पवित्र श्रद्धा स्थल है, बल्कि यह विश्व धरोहर स्थल भी है। यह वही स्थान है जहाँ भगवान बुद्ध को बोधि वृक्ष के नीचे ज्ञान प्राप्त हुआ था। इस महाविहार की धार्मिक, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता असंदिग्ध है। परंतु, विडंबना यह है कि यह पवित्र स्थल बौद्धों के बजाय ब्राह्मणवादी प्रशासन के नियंत्रण में रहा है इस विवाद के ऐतिहासिक,धार्मिक और आर्थिक पहलुओं को उजागर करने से यह प्रतीत होता है कि ब्राह्मणवादी नियंत्रकों ने आर्थिक लाभ के लिए अपने धर्मग्रंथों में लिखीं बातों को भी दरकिनार कर दिया है।

#महाबोधि_महाविहार_को मिलने वाला दान और आर्थिक हित
    महाबोधि महाविहार को देश-विदेश से बड़े पैमाने पर दान प्राप्त होता है। बौद्ध श्रद्धालु थाईलैंड, श्रीलंका, जापान, चीन, म्यांमार, भूटान और अन्य देशों से बड़ी संख्या में बुद्ध गया आते हैं और मंदिर को दान देते हैं। यहां पर आर्थिक प्रभाव तब देखा गया जब कोरोना महामारी के दौरान महाबोधि मंदिर में पर्यटन और दान में भारी गिरावट आई, जिससे बुद्ध गया को लगभग 500 करोड़ रुपये के वार्षिक व्यवसाय पर प्रभाव पडा था।
      महाबोधि महाविहार को देश-विदेश से भारी मात्रा में दान मिलता है, जिससे मंदिर प्रशासन और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बड़ा लाभ होता है। ब्राह्मण ग्रंथों में बुद्ध और बौद्ध धर्म को अपवित्र और निंदनीय बताया गया, लेकिन जब आर्थिक लाभ की बात आती है, तो वही वर्ग धर्म शास्त्रों कों दरकिनार कर बौद्ध मंदिरों के प्रशासन पर नियंत्रण बनाए रखना चाहता है।

#धर्म_ग्रंथ_और_धर्म शास्त्रों को दरकिनार क्यों किया गया?
    वैदिक और स्मृति ग्रंथों में मगध प्रांत की निंदा की गई मगध प्रांत जिसमें बुद्ध गया भी शामिल है प्राचीन काल से श्रमण परंपरा (बौद्ध और जैन धर्म) का केंद्र रहा है। वैदिक ग्रंथों में इस क्षेत्र को"अपवित्र" कहा गया है।

   मनुस्मृति (10.43-44): मगध को अपवित्र घोषित किया गया है और ब्राह्मणों को वहाँ रहने से मना किया गया है।
   वसिष्ठ धर्मसूत्र (1.35): इसमें कहा गया है कि यदि कोई ब्राह्मण मगध में निवास करता है, तो उसके लिए कोई प्रायश्चित संभव नहीं है।

   बौद्ध धर्म के प्रभाव को कम करने के लिए कई ब्राह्मण ग्रंथों में भगवान बुद्ध और उनकी शिक्षाओं की निंदा की गई है।
   पद्मपुराण (उत्तरखंड, अध्याय 236) बुद्ध को "मायावी अवतार" कहा गया है, जिनका उद्देश्य असुरों और दुष्टों को मोहित करके नष्ट करना था।
    बुद्ध के अनुयायियों को "म्लेच्छ" और "नास्तिक" कहकर संबोधित किया गया है।
   "बुद्ध का चेहरा देखना भी पाप" बताया गया है।
   विष्णु पुराण (3.18.2-3) बुद्ध को विष्णु का छलपूर्ण अवतार बताया गया है।
  भागवत पुराण (1.3.24, 2.7.37, 5.6.9, 7.15.24-25)
बुद्ध को "धर्म के मार्ग को भ्रष्ट करने वाला" बताया गया है। कहा गया है कि बुद्ध ने नास्तिकता को बढ़ावा दिया है।
 मनुस्मृति (12.95-96) जो वेदों को अस्वीकार करता है (जैसे बौद्ध धर्म), उसे अधर्मी और निंदनीय बताया गया है।
   शंकराचार्य ने बौद्ध दर्शन की कठोर आलोचना की और इसे "वेदनाशक" बताया। कुमारिल भट्ट ने बौद्ध धर्म को नष्ट करने के लिए वैदिक कर्मकांडों की पुनर्स्थापना की। बौद्ध धर्म ने भेदभाव को चुनौती दी, तो ब्राह्मण ग्रंथों में इसे अधर्म,नास्तिकता और पाप घोषित कर दिया गया।

#महाबोधि_महाविहार_पर ब्राह्मणवादी नियंत्रण और बौद्धों के अधिकारों का हनन
     महाबोधि महाविहार मूलतः बौद्धों का पवित्र स्थल है, फिर भी इसका प्रशासन बौद्धों के हाथों में नहीं है। ब्रिटिश शासन के दौरान महाबोधि महाविहार का नियंत्रण हिंदू महंतों के पास चला गया। 1895 में आनंद कौसल्यायन, अनागारी धर्मपाल जैसे बौद्ध पुनरुद्धारकों ने इसे बौद्धों को वापस देने की मांग की, लेकिन सफलता नहीं मिली। महाबोधि मंदिर प्रबंधन समिति"(BTMC)Act को लाकर और बौद्धों को सौंपने का मार्ग और पेचीदा किया। नैसर्गिक न्याय के तत्वावधान को देखा जाए तो क्या यह अन्याय नहीं है,कि बुद्ध की भूमि पर बौद्धों को ही उनके मंदिर का स्वामित्व नहीं मिल पा रहा है।
    
#आर्थिक_स्वार्थ_और_धार्मिक_राजनीति
    प्रश्न यह उठता है कि जब वैदिक ग्रंथों में मगध और बुद्ध की निंदा की गई है, तो फिर ब्राह्मणवादी संस्थाएँ महाबोधि महाविहार के नियंत्रण में क्यों रुचि रखती हैं?
क्या यह आर्थिक स्वार्थ के कारण है?
क्या यह बौद्ध धर्म के पुनरुत्थान को रोकने का एक षड्यंत्र है?
   चाहे कारण जो भी हो महाबोधि महाविहार का पूरा प्रशासन बौद्धों को सौंपा जाए।
बौद्ध संगठनों को इस अन्याय के खिलाफ संगठित होकर संघर्ष करना जरूरी है।
बौद्ध धर्म को पुनः उसके गौरवशाली स्थान पर पहुँचाने के लिए वैश्विक स्तर पर आंदोलन खडा कर बुद्ध की भूमि पर बुद्ध का शासन निर्माण करने के लिए सभी ने समर्पित होकर कार्य करना जरूरी है।

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