समाज परिवर्तन की मशाल



 संकल्प, संघर्ष और सफलता की कहानी

हर युग में कुछ लोग ऐसे होते हैं जो खुद के लिए नहीं, समाज के लिए जीते हैं। वे ना तो प्रसिद्धि की तलाश में होते हैं, ना ही सत्ता की। उनका एक ही उद्देश्य होता है – संघर्षरत समाज को दिशा देना, उसे संगठित करना, और उसके भीतर आत्मविश्वास भरना। ऐसे ही कुछ साथियों के साथ हमने एक छोटी सी शुरुआत की थी – बिना संसाधनों के, लेकिन गहरी निष्ठा के साथ।

शुरुआत एक विचार से हुई...

6 मई 2012 को, जब हम कुछ युवा प्रतीयोगीता परीक्षा की तैयारी कर रहे थे, तब हमें महसूस हुआ कि हमारे जैसे और भी कई साथी हैं जो पढ़ना चाहते हैं, आगे बढ़ना चाहते हैं, लेकिन उनके पास न तो पुस्तकें हैं, न मार्गदर्शन, और न ही सकारात्मक माहौल। हमने तय किया कि जो कुछ हमारे पास है, उसी से शुरुआत करेंगे। और इस तरह 'राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका' की नींव पड़ी।

न सुविधाएँ थीं, न स्थान... लेकिन जज़्बा था!

शुरुआत में हमने विद्यार्थियों को वह सुविधाएं दी जो हम न मिली लेकिन जमाने के हिसाब से कुछ कम होगा पंखे, कुलर, लाइट सेपरेट टेबल कुर्सी  और बहुत सी किताबें। माहौल ऐसा था हमारे कोआर्डिनेट हर विद्कोयार्थियों को प्रोत्साहित करता,पढ़ाने आता था, सीखने आता था, और दूसरों को सिखाने के लिए रुकता भी था। यह सिर्फ एक अध्ययन केंद्र नहीं, बल्कि एक विचारधारा का केंद्र बन गया – जहाँ फुले, शाहू, आंबेडकर, पेरियार, बिरसा मुंडा और बुद्ध के विचारों से नई चेतना जागती थी।

सहयोगियों की भूमिका: नाम नहीं, काम महत्वपूर्ण था

यह कार्य किसी एक व्यक्ति का नहीं था। समाज के हितचिंतक और दानी कई साथी बिना प्रचार के, बिना मंच पर आए, बस समाज के लिए कार्यरत रहे। किसी ने फर्नीचर का इंतजाम किया, किसी ने पुस्तकें दान कीं, तो किसी ने बच्चों को मार्गदर्शन दिया। सहयोग की यह श्रृंखला ही हमारी सबसे बड़ी ताकत बनी।

रुकावटें आईं... लेकिन हम रुके नहीं

सामाजिक उपेक्षा, स्थान परिवर्तन, संसाधनों की कमी, और कभी-कभी आंतरिक चुनौतियाँ भी आईं। लेकिन हमने कभी हार नहीं मानी। पहले जब लाइब्रेरी को जबरन बंद किया गया, तब हमने मंत्रालय के सामने धरना दिया। जब किसी जगह से हटाया गया, तो नए ठिकाने की तलाश की। हमारा संकल्प अडिग रहा – चाहे जो हो, समाज के बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकेगी।

सफलता की गूंज

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो गर्व होता है कि इसी राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका से पढ़कर कई साथी UPSC, MPSC, बैंकिंग, रेलवे, शिक्षक और अन्य सरकारी सेवाओं में चयनित हुए हैं। लेकिन उससे भी ज्यादा संतोष इस बात का है कि ये सभी साथी आज समाज को कुछ लौटाने के लिए तत्पर हैं।

अभी बहुत कुछ करना बाकी है...

हमारा यह कार्य केवल एक शुरुआत है। असली परिवर्तन तब आएगा जब हर गाँव, हर बस्ती में ऐसी अभ्यासिकायें अध्ययन केंद्र खुलें, जहाँ संविधान, मानवता और न्याय की शिक्षा दी जाए। और यह कार्य किसी संस्था, सरकार या फंडिंग पर निर्भर नहीं – यह समाज की आंतरिक शक्ति तथा दान पर आधारित है।

हमारा संकल्प आज भी वही है –
"जो जहां है, वहीं से समाज के लिए एक दिया जलाए।"

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