मूकनायक_का_लेख_हमारा_आंदोलन


MUKNAYAK KA LEKH
    आंदोलन में सक्रिय रुप से कार्य करने वाले अनुयायियों ने अपना इतिहास जानना जरूरी है डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर अनुभूति करते हैं कि, बहिष्कृतोंकी उन्नति के लिए विभिन्न लोगों ने सेकडो वर्षोंसे प्रयास करते आए हैं। डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर लिखते हैं कि,हमारे पूर्वजों ने हमारे लिए कितना प्रयास किया है उनका त्याग समर्पण यह समाज उद्धार के खातिर अपने आप को समर्पित किया इसी तरह हमें भी आंदोलन की विरासत को और इमानदारी से आगे बढ़ाना जरूरी है।
      नदी का उदगम स्थल और उस का मार्ग बहुत छोटा होता है; लेकिन बाद में वह बडा होते जाते हैं, अंततः वे इतना बडा हो जाते हैं कि बड़े-बड़े जहाज भी उनके बीच से गुजरने लगते हैं। अर्थात इनकी शुरुआत बहुत छोटी होती है; लेकिन आगे चलकर उनका विस्तार इतना हो जाता है कि उनके बाद के वैभव को देखकर कोई कल्पना भी नहीं कर पाता है कि उनका पूर्व स्वरूप इतना सूक्ष्म होगा यह कल्पना कोई नहीं कर पायेगा इसी तरह हमारे बहिष्कृतों के आंदोलन का इतिहास हैं।अन्यान्य,अत्याचार, ऊंच-नीच,जातीयता और विषमता के चक्र में फँसा कोई भी देश या समाज कभी ना कभी उभरे बिना नहीं रह पायेगा। महायुद्ध के कारण उभरे पोलैंड जैसे देशों यह उदाहरण से सिद्ध होती है। उसी प्रकार हमारे बहिष्कृतों की उन्नति होकर रहेगी। यह उन्नति होंने के लिए बहिष्कृतों के विभिन्न लोगों ने निरंतर प्रयास किये हैं कई लोगों ने समाज के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया है।
     कई लोगों ने समाजिक जागरूकता का कार्य करते समय उन्हें उच्च वर्गों द्वारा परेशान किया जिन्होंने ये प्रयास किया,अपने शरीर का त्याग किया तथा अत्याचार सहे उन महात्माओं की पहचान कर उनसे प्रेरणा लेकर हमारा समाज भी समाज जागरूकता और जोरों से उद्देश्य पुर्ण करेगा एसी आशा है।
      #लगभग एक हजार वर्ष पहले पाटन गुजरात की राजधानी थी। वहां के राजा ने सहस्त्र लिंग नामक एक तालाब बनाने का निर्णय लिया। लेकिन चाहे कुछ भी करने पर तालाब का पानी कम नहीं होता था। तब धर्माचार्य की सलाह पर राजा ने किसी की बलि देने का निर्णय लिया। मायो नामके अस्पृश्य को बलि देने के लिए लाया गया और सिर काटते समय यह पूछने का आदेश दिया गया कि आखिरी इच्छा क्या होगी? तब मायो ने उम्मीद भरे स्वर में कहा, "महाराज मेरे यह नश्वर शरीर सार्वजनिक हितों के लिए काम आ रहा है इस का आनंद मुझे हों रहा है लेकिन मेरे जाती के भाईयों को आजतक शहर से दूर अंतराल पर जंगल में दुर रहना पड़ता है और उनके निचता का प्रतीक अलग तरह के कपड़े पहने पडते है। इसके बाद उनके साथ उस तरह का व्यवहार न किया जाए उन्हें शहर के पास रहने की अनुमति दी जाये। राजा ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और मेयो ने अपनी जान स्वजन उद्धार के लिए समर्पित किया।
     #इसी प्रकार पेशवाई में सिदनाक नाम का सरदार उसे भी अपनी जाति के उद्धार करन के कारण अपमान और कष्ट सहना पड़ा। हमारे सिदनाक भाई ने खर्डा के युद्ध में आती पराक्रम कर पटवर्धन सरदार के प्राण बचाए।
      कोंकण के रायगड क़िला के किल्लेदार रायनाक को अपने जातीकी उन्नति करने के लिए जि-जान लगा देते हैं परिणाम स्वरूप उन्हें वर्ण-व्यवस्थावादीयोने किले से ढकेल दिया।
      #अस्पृश्य समुदाय के गुरु हरिभक्तपरायण गोपालबाबा वलंगकर कोंकण के साधु ने सभी बहिष्कृत समाज के कलंक को दूर करने के लिए पूरे महाराष्ट्र में प्रचार किया अनार्यदोषपरिहारक समाज की स्थापना किए। सुधारक और दीनबंधु पत्रों में लेख लिखे। इतना ही नहीं वर्ष 1888 में विजयादशमी को 50 पेज की बिनती पत्र प्रश्नरुप छापकर जातिगत भेदभाव पर वाद-विवाद करने के लिए तत्कालीन शंकराचार्य और इत्यादि धर्मवीरो को खुली चुनौती दी।
    इस तरह बीसवीं सदी की शुरुआत तक हमारे आंदोलन का यह बहुत संक्षिप्त इतिहास है। हमारे समाज द्वारा चलाया जा रहा जो यह आंदोलन हमारे प्रयास का ही परिणाम है। आप समाजिक सुधार के लिए निरंतर प्रयास करते रहो आपसी झगडे, गलत प्रथाओं आदि को दूर कर, शिक्षा के क्षेत्र में आनेवाली बाधाएं दूर कर रास्ते को साफ कर अपने ध्येय उद्देश्य अपने लक्ष्य के शिखर पर जल्द पहुंचे यह हमारा अनुरोध है।
डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर 
#संदर्भ:-
#मुकनायक
25 सितंबर 1920

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