जन्मदिन मनाना है तो आंशिक मदत के बदले समस्या को जड से खत्म कर सामाजिक बदलाव का जश्न मनाएं!

कुछ लोग अपना जन्मदिन मनाना पसंद करते हैं,लेकिन डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने कहा था:
"मुझे अपना जन्मदिन मनाना पसंद नहीं है। इसलिए मैंने युवाओं से भगवान बुद्ध का जन्मदिन मनाने को कहा..."
(नई दिल्ली, 2 मई 1950)

आजकल सोशल मीडिया पर जन्मदिन और शादी की सालगिरह को बड़ी धूमधाम से मनाने का फैशन चल रहा है। दुसरो को निजी तौर पर शुभकामनाएं देने से ज्यादा सोशल मीडिया पर सार्वजनिक किया जाता है ताकि वफादारी प्रदर्शीत हो।

जन्मदिन मनाएं, पर सोच भी बदलें!

आजकल जन्मदिन और शादी की सालगिरह को बड़ी धूमधाम से मनाने का फैशन चल पड़ा है। क्या जन्मदिन मनाने का असल मकसद सिर्फ अपने लिए खुशियाँ मनाना ही रह गया है? जो बात निजी होती है, उसे जानबूझकर सार्वजनिक बना दिया जाता है।

जन्मदिन मनाने का उद्देश्य योग्य होना चाहिए, जो बात निजी होती है उसे जानबूझकर सार्वजनिक बनाया जाता है और उसे सार्वजनिक कर प्रचार चलन बन गया है।आखिर उद्देश्य क्या होता है?

अगर हम अपने जन्मदिन को सामाजिक उद्देश्य से जोड़ दें, तो?
जैसे संसाधन रहीत वंचित बच्चों को पढ़ने का मौका देकर पैरों पर खड़ा करना, किसी बेरोजगार को रोजगार दिलाना, समाज की मुलत: समस्या को जड से खत्म करना, या ऐसी मदद करना जिन्हें दुसरो को मांगने की नौबत ही न आए।

आये दिन हम देखते हैं जन्मदिन पर कपड़े, फल, किताबें या खाना खिलाना, वृद्धाश्रम में मदत ये सब आंशिक मदद है। 
लेकिन असली मदद उस समस्या को जड से खत्म करना, किसी व्यक्ति को इतना सशक्त बना दें कि उसे कभी किसी के सामने हाथ फैलाने की नौबत ही न आए।
यही है सच्ची सेवा, यही है सच्चा सामाजिक उद्देश्य! बाकी सब तो सिर्फ प्रचार-प्रसार और दिखावा है।

आइए, अपने जन्मदिन को सिर्फ खुशियों का दिन नहीं, बल्की समस्या को जड से खत्म करने के लिए भी संकल्प लें।
बदलाव की शुरुआत हमारी सोच से होती है!

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