बहिष्कृत_हितकारिणी_सभा के मेमोरेंडम में अस्पृश्यों की उद्योग-धंधों में सहभागिता


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      सामाजिक गोलमेज परिषद द्वारा समाज की आर्थिक स्थिति सुधार में प्रयास यह बहिष्कृत हितकारिणी सभा के मेमोरेंडम में अस्पृश्यों की उद्योग-धंधों में सहभागिता यह बुनियादी आधार है जो ऐतिहासिक संदर्भों, प्रमाणों और विचारों पर आधारित है।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा 1924 में स्थापित बहिष्कृत हितकारिणी सभा (Depressed Classes Institute) न केवल अस्पृश्यों की शिक्षा और सामाजिक अधिकारों के लिए कार्यरत रही, बल्कि उन्होंने आर्थिक क्षेत्र में भी बराबरी का अवसर दिलाने के लिए गंभीर प्रयास किए। इस संस्था ने ब्रिटिश सरकार को जो मेमोरेंडम प्रस्तुत किए, उनमें उद्योग-धंधों में अस्पृश्यों की सहभागिता एक महत्वपूर्ण विषय था।

परंपरागत पेशों से मुक्ति की माँग
    डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने स्पष्ट रूप से कहा कि अस्पृश्य समाज को केवल उन जातिगत पेशों तक सीमित रखना अन्यायपूर्ण है, जो उन्हें सदियों से थोपी गई सामाजिक व्यवस्था के कारण करने पड़े। उन्होंने सरकार से आग्रह किया कि अस्पृश्यों को आधुनिक उद्योगों और तकनीकी क्षेत्रों में भी अवसर मिलना चाहिए।

तकनीकी और व्यावसायिक प्रशिक्षण की माँग
    यदि अस्पृश्यों को आर्थिक रूप से सक्षम बनाना है, तो उन्हें केवल साधारण मजदूरी तक सीमित न रखकर, उन्हें हुनरमंद और तकनीकी रूप से दक्ष बनाया जाना चाहिए।

सरकारी नौकरियों और कॉन्ट्रैक्ट्स में प्राथमिकता
    बाबासाहेब आंबेडकर ने यह सुझाव भी दिया कि सरकार के सभी सार्वजनिक निर्माण कार्यों, उद्योगों, कारखानों और ठेकों में अस्पृश्यों को नियोजन और सहभागिता का अवसर मिलना चाहिए। इससे न केवल उनका आर्थिक स्तर ऊपर उठेगा, बल्कि उन्हें सम्मानजनक स्थान भी प्राप्त होगा।

आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम

डॉ. आंबेडकर का मानना था कि सामाजिक स्वतंत्रता तब तक अधूरी है जब तक आर्थिक स्वतंत्रता प्राप्त न हो। इसलिए उन्होंने अस्पृश्य समाज के लिए लघु उद्योग, कुटीर उद्योग और अन्य उत्पादन आधारित कार्यों में भागीदारी सुनिश्चित करने की माँग की।

संवैधानिक दृष्टिकोण की नींव

यह दृष्टिकोण बाद में 'States and Minorities' (1947) में अधिक स्पष्टता से दिखाई देता है, जहाँ बाबासाहेब लिखते हैं:
इस विचारधारा की जड़ें बहिष्कृत हितकारिणी सभा के कार्यों और मेमोरेंडम में ही दिखाई देती हैं, जो आगे चलकर भारतीय संविधान के समाजवाद आधारित आर्थिक अधिकारों की नींव बनीं।
     डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने बहिष्कृत हितकारिणी सभा में अस्पृश्य समुदाय को केवल शिक्षा और सामाजिक सम्मान तक सीमित न रखकर, उन्हें उद्योग-धंधों में भागीदारी, तकनीकी कौशल, और आर्थिक आत्मनिर्भरता की दिशा में प्रेरित किया। यह दृष्टिकोण आज भी उतना ही प्रासंगिक है।
इसी विचारधारा को आगे बढ़ाते हुए सामाजिक गोलमेज परिषद आज यह प्रयास कर रहे हैं कि हमारा समुदाय केवल सामाजिक अधिकारों तक सीमित न रहे, बल्कि वह आर्थिक दृष्टि से भी सक्षम और स्वाभिमानी बने। SGP का यह मानना है कि जब समाज आर्थिक दृष्टिकोण बदलेगा तब हमारा समाज सक्षमता से मजबूत होगा 
संदर्भ:-
(BAWS Vol. 2 – Memorandum to Simon Commission, 1928)
(BAWS Vol. 1)
      

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