डॉ_बाबासाहब_अंबेडकर_ने_धम्म_दिक्षा_के_कई_वर्ष_पहले_ही_बुद्ध_जयंती_मनाई_थी


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      *भारतीय बौद्ध महा सोसायटी औऱ शेड्यूल कास्ट वेलफेयर एसोसिएशन इनकी संयुक्तता से १९, २० एवं २१मई १९५१ को दिल्ली में बुद्ध जयंती का आयोजन किया था १९ को बड़ी रैली निकाली गई और २० तारीख को एक बहुत बड़ी सभा का आयोजन हुआ सभा के अध्यक्ष फ्रांस में रहने वाले भारत के वकील थे. डॉ.बाबासाब अपने भाषण में कहते हैं "मेरी ऐसी मनोकामना है कि भारत के अछूतोंने बुद्ध की शिक्षा काआत्मसात कर आचरण करें" पिछले वर्ष हम बुद्ध जयंती के लिए यहां एकत्रित हुए थे उस समय आज के इतना बड़ा समुदाय नहीं था लोगों में बुद्ध धम्म के बारे में लगाव देखकर मुझे अच्छा लग रहा है.*

   *हम लोग इसीलिए बुद्ध जयंती मनाते हैं क्योंकि भारतीय समाज का अध:पतन दूर होगा.लोगों को बुद्ध की शिक्षा का अंगीकार करना बताने से पहले बुद्ध धम्म और हिन्दू धर्म का फर्क समझाना जरूरी है. चातुर्वर्ण मूर्ति पूजा एवं आध्यात्मिक तत्वों पर सामाजिक भेदभाव हिन्दू धर्म मे आधारित है*

सामाजिक अधपतऩ एवं राष्ट्र का -हास ब्राह्मण शाही यह अभी का हिन्दू धर्म इनमे फर्क नही दिखता चातुवर्ण पर आधारभूत हिंदू धर्म की इमारत के कारण शांती और एकता नही है इसपर उपाय, योग्य आयोग का विचार कर अयोग्यता को न त्यागना, अयोग्य चातुर्वर्ण्य मे हिन्दूओ का दर्शनी फायदा दिखाई देत है सभी हिन्दू होने, वर्णाश्रम पद्धति को त्याग कर वेदों को प्रमाण और वेदो की आज्ञापर वर्णाश्रम पद्धति बनी है. धर्म में सुधार होना चाहिए यह बोल कर नहीं होगा यह आचार विचार कृर्ती में लाना जरूरी है. बुद्ध धम्म का द्वेश करने वाले ब्राहमणों से पूछना है, शुरू में बुद्धों को जो पांच भीक्षु मिले वह कौन थे? संघ में नब्बे प्रतिशत लोग ब्राह्मण थे कुछ हिन्दुओं का कहना है के आप बुद्ध धम्म का स्वीकार करना है तो करें परंतु ब्राह्मणशाही को गालियां क्यों? इसका जवाब सरल है वर्णाश्रम पर आधारीत हिन्दू धर्मके असली चेहरे को समाज के सामने उजागर करना जरूरी है यह बाते बुद्ध धम्म के प्रचार और प्रसार के मार्ग का रोड़ा बना हुआ है, स्वच्छ पानी और गंदा पानी या दो प्रवाह एक साथ बहे तो स्वच्छ पानी भी गंदा पानी हो जाएगा, हिन्दू धर्म के गंदे पानी को बुद्ध धम्म के शुद्ध तत्वों के साथ बहने देना नही चाहिए.!*

   *वर्नाश्रम पद्धति हिन्दू धर्म की निव है यह बात धर्म को धिक्कारने के लिए काफी है मंदिर मे पुजारी भक्ती के लिऐ न रहकर ऐशोआराम जीवन जीने और भोजन करने के लिए होता है. दैनिक गुजारे के बारे मे पुछने पर बताया गया की मुद्रास सरकार देड लाख रुपये की ग्रांट देती है मंदिर मे सोने की मुर्तीया जिनकी किमत कोटि की है. एकतरफ अन्न की कमी लोग पैसों को मोहताज और दुसरी तरफ अन्न और पैसों की बरबादी.*

    *धर्म शुद्ध तत्वो पर आधारित होना चाहिए बुद्ध वर्नाश्रम को नहीं मानते थे, सब सामान है, मानव मानव में भेद भाव नहीं, जन्म से ऊंच और नीच कोई हो नहीं सकता उचता निश्चीत कर्म से प्राप्त होती है यह बातें बुद्ध ने बताई. अगर भारत मे लोगों द्वारा पुनः बुद्ध धम्म का अंगीकार किया गया तो पुनः देश वैभव को प्राप्त होगा. दूसरे किसी भी मार्ग या माध्यम से जतीभेद को मिटाना संभव नहीं है सही मायने में अगर किसी को जाति भेद को मिटाना है उन्होंने बुद्ध धम्म को स्वीकारना यही एक मात्र उपाय है. जिनके रग रग में हिन्दू धर्मा बसा है उन्होंने वह तुरंत छोड़ना चाहिए ऐसा हमने कहना और उन्हें यह जमेगा भी नहीं और मैं भी उन्हें कुछ ऐसा कहूँगा नहीं. परन्तु युवको के बारे में पूरा आत्मविश्वास है के वे योग्य,सत्य के मार्ग से जाकर अपने समाज और राष्ट्र के उत्कर्ष को साध्य करेंगे.*

संदर्भ:-डॉ.बाबासाहब अंबेडकर Vol.18 Writing and Speeches


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