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मातंग महारों के कष्ट

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मुक्ता सालवे कक्षा तिसरी का निबंध  ‼️‼️‼️ मातंग महारों के कष्ट 🔥🔥🔥🔥          लहूजी वस्ताद साल्वे मांतंग महारों के बच्चों को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में जाने के लिए प्रेरित करते थे। उस स्कूल में पढने वाली एक लड़की का नाम मुक्ता सालवे था। मुक्ता साल्वे नाम की मांतंग जाति की यह लड़की राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में पढ़ती थी। उस स्कूल के एक कार्यक्रम में उनसे निबंध लिखने को कहा गया उस वक्त मुक्ता साल्वे तीसरी क्लास में पढ़ती थीं। उसने एक निबंध लिखा उस समय उनकी उम्र 12 साल रही होगी।   यह निबंध 15 फरवरी 1855 को लिखा गया था। उनके उत्कृष्ट निबंध के लिए उन्हें सर मेजर कैंडी द्वारा पुरस्कृत किया गया था, अर्थात उनका निबंध इतना सराहनीय था कि उन्हें पुरस्कृत किया गया। इस निबंध को पढ़ने के बाद हमें तत्कालीन समाज के बारे में बहुत सी बातें पता चलेंगी साथ ही राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले उस समय स्कूल में किस तरह की शिक्षा दे रहे थे, उस समय के बच्चों को किस तरह का इतिहास पढ़ाया जाता था यह पता चलेगा यानी राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले ...

दामोदर घाटी परीयोजना के जन्मदाता डॉ.बाबासाहब आंबेडकर

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दामोदर घाटी परीयोजना के जन्मदाता डॉ.बाबासाहब आंबेडकर         दामोदर घाटी परीयोजना के जन्म की कल्पना डॉ.बाबासाहब की देन है। उन्होंने इसे लागू करने के लिए दिन-रात मेहनत की जाहां बिहार, उड़ीसा,बंगाल इन राज्यों को नया जीवन दिया यह डाँ.बाबासाहब आंबेडकर कि देन है। जॉर्ज डब्ल्यू नॉरिस ने 1922 से पहले अमेरिका में क्षेत्रीय जल परीयोजना की नींव रखी थी इसी कारण वहां के लोगों ने उनकी याद में एक बांध को उनका नाम दिया। लेकिन भारत के लोगों ने,सरकार ने दामोदर घाटी परीयोजना कि निव रखने वाले शिल्पकार डाँ.बाबासाहब आंबेडकर को यह सम्मान नहीं दिया। इस परीयोजना के लिए डाँ.बाबासाहब ने दिन रात एक कर तकलीफ सहकर इस विषय पर कार्य किया लेकिन आज ऊनकी याद और उनके कार्य को लोगों ने ही नहीं सरकार ने भी पर्ण रुपसे भुला दिया है।           डॉ.बाबासाहब चाहते थे कि दामोदर घाटी परीयोजना गरीबों के कल्याण के लिए एक स्थायी योजना बने।अमेरिका में टेनेसी नदी कई प्रांतों से होकर बहती है। एक समय उनके बाढ से लोग हताशा होकर रह गए थे जिसतरह अमेरीकन जनता ने उसका उपयोग मानवीय सेवा ...

निस्वार्थ मदत और उसका परिणाम

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🔥🔥🔥🔥     समाज में कुछ लोग पूरी तरह से स्वयं होकर निर्पेक्ष मदद करने की पहल करते हैं क्योंकि ऐसे लोगों को मदत, सहायता करने के कुशल कर्म के महत्व का एहसास हो गया होता है। व्यक्तिगत,संगठनात्मक या संघीय, कुछ लोग बहुसंख्यक लोगों को पूर्णरुपसे निर्पेक्ष सहायता कर उनके कार्य में हाथ बँटाना और सामाजिक सहायताका कार्य कर इस शृंखला को सक्रिय कर अधीकांश लोगों तक समाज मे आगे बढ़ाने की जरूरत है। समाज के विभिन्न घटकों ने हमे विभिन्न तरह से  हमारी मदद की है, जिसका परीणाम उनके फल कि मिठास आज चख रहे है अनुभव कर रहे है। मदत के कुशल कर्म और सहायता के कर्मों से अवगत होकर हमने जरूरत और आवश्यकता के समय जरुरतमंदो को सहायता करना याने समाज द्वारा हमें प्राप्त हुआ ऋण समाज को लौटाना होता है।       मदय और सहायता का स्वरूप यह समय, बुद्धि, धन, प्रयास, आत्मविश्वास, मार्गदर्शन जैसे विभिन्न रूपों में होता है जो सम्यक और विधायकतापुर्ण कुशल कर्म है। कुशल कर्म एक गतिमान क्रिया है जो उद्देश्यपूर्ण और सचेत रूप से की जाती है। कुशल कर्म हमारी स्थिति को निर्धारित करता है।  ...

अन्याय अत्याचार गरीब,बेबस पर क्यो होता है?

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        समाज मे अन्याय अत्याचार पर उच्च स्तरीय व्यक्ति ने आवाज उठाई या लिखा तो उसे लेखक कहलाते हैं और इसके विपरीत  पिढीत पिछडे व्यक्ती ने आवाज उठाई तो उसे जातीवादी काहा जाता है अन्याय अत्याचार के विरुद्ध समाज में समस्या रखकर उसपर उपाय निकालना जरूरी है । समाज मे अन्याय अत्याचार गरीब,बेबस,मजलूम पर होता है अक्सर देखा गया है कि बलि भेड बकरियों कि दी जाती हैं शोरों कि नहीं! आज के दौर में शेर बनना मतलब खुन खराबा करना या असंवैधानिक मार्ग का अवलम्बन करना न होकर, बुद्धिजीवी और आर्थिक संपन्न बनकर समाज में सशक्त परीणाम देनेवाले संघटनात्मक तरीके से व्यक्ति और सामाजिकहितों के लिए कार्य करनेवाला कार्यकर्ता,अनुयायी का निर्माण करना और होनेवाले अन्याय अत्याचार का संविधानिक तरीके से सामुदायिक तौर पर मुकाबला करना है।        संघ को मजबूती प्रदान करना यह संघटन के बुद्धिजीवी, विद्वान और समान्य प्रचारक, प्रसारक और अभ्यासको की जिम्मेदारी होती है। किसी भी संघ या संघटन मे उसके ध्येय और उद्देश्य को पुर्ण करने के लिए समाज मे सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ परीणाम...

भारत रत्न राजर्षि शाहु महाराज

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🙏🏻💐💐🙏🏻         भारत के इतिहास में गौतम बुद्ध ने राज्य त्याग करकर विश्व के कल्याण का विचार किया। चक्रवर्ती सम्राट अशोक ने मानव कल्याण के किया कार्य किया ज्योतिबा फुले, शाहू जी महाराज ने भी इन्हीं महापुरुषों के कदमों पर चलकर समाज में समता, बंधुत्व,स्वतंत्रता का आंदोलन निरंतर चलाया।छत्रपति शाहूजी महाराज का समाज के लिए किया गया अद्भुत कार्य को देखकर कानपुर के कुर्मी समाज ने उनको राजर्षी यह उपाधि प्रदान की। उनके नाम से देशमे समाजीक न्याय दिवस मनाया जाता है। छत्रपति शाहूजी महाराज कि शिक्षा राजकोट के राजकुमार कॉलेज में हुई अपने उम्र के 20 वे साल मे वे कोल्हापुर संस्थान के राजा बने 1902 में इंग्लैंड के केंब्रिज विद्यापीठ ने उन्हें LLD यह पदवी दी। छत्रपति शाहूजी महाराज का समुचे समाज के प्रति समाजीक दृष्टिकोण का कारण यह है कि उनको शैक्षणिक और उदारीकरण का दृष्टिकोण विदेशी शैक्षणिक दृष्टिकोण के कारण हुई। उन्हें फितुझ राँल्ड नामके बुद्धिमान अंग्रेज शिक्षक को शिक्षा के लिए नियुक्त किया। वे राजकोट के राजकुमार काँलेज मे पढे उनको आगे पढाने के लिए फ्रेझर नामक शिक्षक ...