मातंग महारों के कष्ट

मुक्ता सालवे कक्षा
तिसरी का निबंध
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मातंग महारों के कष्ट
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     लहूजी वस्ताद साल्वे मांतंग महारों के बच्चों को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में जाने के लिए प्रेरित करते थे। उस स्कूल में पढने वाली एक लड़की का नाम मुक्ता सालवे था। मुक्ता साल्वे नाम की मांतंग जाति की यह लड़की राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में पढ़ती थी। उस स्कूल के एक कार्यक्रम में उनसे निबंध लिखने को कहा गया उस वक्त मुक्ता साल्वे तीसरी क्लास में पढ़ती थीं। उसने एक निबंध लिखा उस समय उनकी उम्र 12 साल रही होगी।  
यह निबंध 15 फरवरी 1855 को लिखा गया था। उनके उत्कृष्ट निबंध के लिए उन्हें सर मेजर कैंडी द्वारा पुरस्कृत किया गया था, अर्थात उनका निबंध इतना सराहनीय था कि उन्हें पुरस्कृत किया गया। इस निबंध को पढ़ने के बाद हमें तत्कालीन समाज के बारे में बहुत सी बातें पता चलेंगी साथ ही राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले उस समय स्कूल में किस तरह की शिक्षा दे रहे थे, उस समय के बच्चों को किस तरह का इतिहास पढ़ाया जाता था यह पता चलेगा यानी राष्ट्रपिता ज्योतिराव फुले की दी हुई शिक्षा के आधार पर तीसरी कक्षा में पढ़ने वाली छात्रा ने सामाजिक व्यवस्था का विश्लेषण करते हुए निबंध लिखा था, यह इतिहास मे सदैव याद रखा जाएगा।       
        15 फरवरी,1855 को राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले के स्कूल में पढ़ने वाली तीसरी कक्षा की छात्रा मुक्ता साल्वे ने मातंग-महार की पीड़ा के बारे में यह निबंध लिखा था। ब्राह्मण धर्म की गुलामगिरी के कारण यह दुख का निर्माण हुई है और इसे रोकने के लिए, ब्राह्मण धर्म  पृथ्वी से नष्ट होने की बात लिखी है। मुक्ता साल्वे ने लगभग डेढ़ सौ वर्ष पूर्व उस वक्त की सामाजिक विषमता, अस्पृश्यता, धर्माचरण पर प्रतिबंध का भयानक चित्रण किया है तथा इसके लिए उन्होंने इस समस्या का  समाधान भी सुझाये हैं। 
     *निबंध का महत्वपूर्ण भाग*    
       श्रीमान, अब यदि हमसे नफरत करने वाले लोग वेदों के आधार पर अपने विचारों का खंडन करते हैं, तो जो लोग अपने आप को हमसे ऊंचा कहते हैं, विशेषकर लड्डू खाने वाले ब्राह्मण कहते हैं कि वेद हमारी सत्ता हैं। हमें उनका पालन करना चाहिए तो इससे स्पष्ट होता है कि हमारे पास कोई धार्मिक पुस्तक नहीं है। यदि वेद ब्राह्मणों के लिए हैं तो वेदों के समान आचरण करना ब्राह्मणों का धर्म है। हम इस धर्मग्रंथों को देखने के लिए स्वतंत्र नहीं हैं तो स्पष्ट है कि हम धर्मरहीत हैं ऐसा नजर आता है! है न? 
    हर वेद, जिसे देखने से (बहुजनों को) बहुत महापाप होता है, फिर उनके आधार पर आचरण करने से हमें मे कितनी मूर्खता आयेगी? 
मुसलमान लोग कुरान के आधार पर, अंग्रेज लोग बाइबिल के आधार पर और ब्राह्मण वेदों के आधार पर अपने धर्म का पालन करते हैं।  इसलिए, यदि वे सोचते हैं कि वे अपने सच्चे झूठे धर्म के अनुसार हमसे कम या ज्यादा खुश हैं, तो हे भगवान, हमें बताएं कि तुझ से आया यह कौन सा धर्म है यह बताना ताकि हम सभी उनके समान आचरण का अनुभव कर सके, परंतु जिस धर्म का अनुभव केवल एक व्यक्ति के द्वारा लेना और बाकी लोगों ने मतलबी मुफ्त का खान खानेवाले पेटू व्यक्ति के मुंह को ताकतें रहना है ऐसे व्यक्ति और उनके जैसे अन्य धर्म पृथ्वी से नष्ट हो जाएँ और ऐसे धर्म पर हमने गर्व करने की सोच भी हमारे दिमाग में भी नहीं आना चाहिए. 
         मुक्ता साल्वे, कक्षा ३ री
(15 फरवरी, 1855) 
पत्रिका 'मुक्ता का ज्ञानोदय' (1 मार्च, 1855 को प्रकाशित)

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