दामोदर घाटी परीयोजना के जन्मदाता डॉ.बाबासाहब आंबेडकर

दामोदर घाटी परीयोजना के जन्मदाता डॉ.बाबासाहब आंबेडकर
        दामोदर घाटी परीयोजना के जन्म की कल्पना डॉ.बाबासाहब की देन है। उन्होंने इसे लागू करने के लिए दिन-रात मेहनत की जाहां बिहार, उड़ीसा,बंगाल इन राज्यों को नया जीवन दिया यह डाँ.बाबासाहब आंबेडकर कि देन है।
जॉर्ज डब्ल्यू नॉरिस ने 1922 से पहले अमेरिका में क्षेत्रीय जल परीयोजना की नींव रखी थी इसी कारण वहां के लोगों ने उनकी याद में एक बांध को उनका नाम दिया। लेकिन भारत के लोगों ने,सरकार ने दामोदर घाटी परीयोजना कि निव रखने वाले शिल्पकार डाँ.बाबासाहब आंबेडकर को यह सम्मान नहीं दिया। इस परीयोजना के लिए डाँ.बाबासाहब ने दिन रात एक कर तकलीफ सहकर इस विषय पर कार्य किया लेकिन आज ऊनकी याद और उनके कार्य को लोगों ने ही नहीं सरकार ने भी पर्ण रुपसे भुला दिया है।
          डॉ.बाबासाहब चाहते थे कि दामोदर घाटी परीयोजना गरीबों के कल्याण के लिए एक स्थायी योजना बने।अमेरिका में टेनेसी नदी कई प्रांतों से होकर बहती है। एक समय उनके बाढ से लोग हताशा होकर रह गए थे जिसतरह अमेरीकन जनता ने उसका उपयोग मानवीय सेवा के लिए किया उसी तर्ज पर दामोदर नदी का उपयोग किया जा सकता है इस विषय पर अपने विचार रखे।
इस कार्य के लिए उन्होंने टेनेसी घाटी की योजना पर के कई ग्रंथ मगवाये थे क्यों की उन्हें अपने विभाग में नौकरशाहों पर निर्भर रहना पसंद नहीं था।
टेनेसी परीयोजना समान भारुत मे म्हैसूर कि तुंगभद्रा तथा पंजाब में छोटे और बड़े बांधों का भी अध्ययन किया गया। उसके बाद श्रम विभाग के अंतर्गत सेंट्रल पावर बोर्ड नामक मंडल की स्थापना की गई डाँ.बाबासाहेब स्वयं इसके अध्यक्ष थे। नदियाँ, बाँध, बिजली परियोजनाएँ सभी इसी विभाग को सौंपी गईं। तीन महीने तक लगातार दामोदर नदी बांध परियोजना पर राजनीतिक मंथन चला अंतः डाँ.बाबासाहब की मजबूत नीतियोन के कारण यह राजनीतिक निर्णय लिया गया और दामोदर बांध योजना डॉ.बाबासाहेब द्वारा कार्यान्वित की गई।  
          दामोदर बांध परियोजना कार्य से भारत का चेहरा ही बदल गया। दामोदर नदी को बिहार का संकट माना जाता है हर दो-चार साल में इस नदी में बाढ़ आती और लाखों लोगों की आजीविका नष्ट हो जाती थी।1859 से अब तक लोगों ने इस नदी की 12 बार बाढ़ देखी है।  लेकिन 17 जुलाई 1943 को आई बाढ़ ने पिछली सभी ऊँचाइयों को तोड़ दिया। 70 गाँव नष्ट हो गये, 11 हजार घर बह गये। लाखों लोग बेघर हो गए।
       दामोदर नदी की बाढ़ से भारत का संपर्क बंगाल से टूट गया।  खाद्यान्न पहुंचना कठिन हो गया। इसी समय जापानी सेना कलकत्ता पर बमबारी कर रही थी। हर तरफ अफरा-तफरी मच गई थी। लगभग इसी समय बंगाल में सूखे ने कहर बरपाया। लगभग 25 हजार लोग मारे गये और लाखों लोग अपंग हो गये। ऐसे समय में भारत सरकार ने दामोदर नदी को नियंत्रित करने के लिए एक स्थायी योजना तैयार करने के बारे में सोचा गया जिसकी जिम्मेदारी भारत में डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर को सौंप दि गयी। उस समय डाँ.बाबासाहब आंबेडकर कोयला खदानें, मुद्रण और स्टेशनरी संस्थान में प्रशिक्षण केंद्र से सेना और नागरिक अधिकारियों को तकनीकी शिक्षा प्रदान करना, प्रचार और सेना भर्ती, गृह निर्माण और सार्वजनिक बांधकाम, पिलानी में प्रशिक्षण केंद्र, सभी खातों का काम श्रम विभाग के अतिरिक्त भार डाँ.बाबासाहब पर सौंपा गया था।1943 के अंत में सिविल पायोनियर फ़ोर्स का कार्य लेखा-जोखा भी उन्हें सौंप दिया गया था।     
        1935 का भारत सरकार कायदा द्वारा जलमार्ग यह विषय प्रांत का था यह बात उन्हे खटकती थी उन्होंने संविधानीक निर्माण के दौरान यह विषय केंद्रीय सुची मे डाल दिया।
जलमार्ग कार्य के लिए तज्ञ व्यक्ति की नियुक्ति करना जरूरी है ऐसा ब्रिटिश सरकार को यह विषय समझाकर बताने पर इस कार्य के लिए अमेरिका के टेनेसी व्हाँली अथॉरिटी के वूरदुइन नामक इंजीनियर पर यह कार्य सौपा गया।
अमेरिकी तंत्रज्ञ का काम पूरा होने के बाद सेंट्रल पावर बोर्ड या सेंट्रल वॉटर इरिगेशन एंड नेविगेशन कमीशन का काम देखने के लिए एक सक्षम भारतीय इंजीनियर व्यक्ति को नियुक्त करना आवश्यक था। डाँ.बाबासाहब इस कार्य के लिए केवल एक भारतीय व्यक्ति चाहते थे। उस समय पंजाब के चिफ इंजीनियर रायबहादुर ए.एन.खोसला थे उनके विचार डाँ.बाबासाहब आंबेडकर के प्रति दूषित थे। उन्होंने सबसे पहले बाबासाहब के अधीन काम करने से इंकार कर दिया। लेकिन बाबासाहब ने उन्हें मिलने के लिए बुलाया और कहा "मेरे लिए किसी अंग्रेज या अमेरिकी इंजीनियर को नियुक्त करना कठिन नहीं है, लेकिन मुझे एक भारतीय इंजीनियर चाहिए"। खोसाल की आंखें खुल गईं और उन्होंने तुरंत पद स्वीकार कर लिया।
          लगभग इसी समय,उड़ीसा के एक प्रमुख नेता हरेकृष्ण मेहताब (जो बाद में मुख्यमंत्री बने) डॉ.बाबासाहब को कारागृह से पत्र भेजकर 'महानदी' पर भी ध्यान देने कि सूचना कि। डॉ.बाबासाहब ने
नवंबर 1945 में कटक में एक बैठक बुलाकर राज्यों के अधिकारियों को जलमार्ग के महत्व को समझाया।आगे उन्हें अरब सागर और बंगाल की खाड़ी को जोड़ने का संकल्प किया था परंतु वह मनोकामना अधूरी रह गई। 
दामोदर बांध परियोजना की कल्पना डॉ.बाबासाहब अंबेडकर ने की थी। उन्होंने इसे लागू करने के लिए दिन-रात मेहनत की और इसके पूरा होने से पहले ही देश में विभाजन का सामना करना पडा। फिर आजादी के बाद काकासाहेब गाडगिल से यह योजना पूरी कराई गई।
भारत की प्रथम बहुउद्देशीय दामोदर नदी घाटी परियोजना के रूप में इसके प्राथमिक उद्देश्यों कि पुर्ती हुई जिनमें बाढ़ नियंत्रण व सिचाई, विद्युत का उत्पादन, पारेषण व वितरण,पर्यावरण संरक्षण तथा वनीकरण,दामोदर घाटी के निवासियों का सामाजिक-आर्थिक कल्याण,औद्योगिक और घरेलू उपयोग हेतु जलापूर्ति इत्यादि कार्य किया जाता है।
संदर्भ
डाँ.बाबासाहब आंबेडकर
वसंत मून

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