महापुरुषों की मृत्यु और किर्ति प्रबुद्ध भारत में प्रसिद्ध साहित्यकार का लेख
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के अवसर पर महाराष्ट्र के प्रसिद्ध साहित्यकार आचार्य अत्रे ने प्रबुद्ध भारत के महापरिनिर्वाण विशेषांक में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर अंतिम विदाई पर जनमानस में क्या भावनाएं थी और जिन्होंने द्वेष और इर्शा रखने वालों पर बेहद कड़ी टिप्पणी की है। जिसमें प्रमुख कांग्रेस और राज्य मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण और गालगील को उल्लू संबंधित कर अपनी भावनाएं व्यक्त किए।
कहते हैं कि किसी महापुरुष की मृत्यु नहीं देखनी चाहिए। कौन जाने। हम सोचते हैं कि किसी महापुरुष की मृत्यु देखना सौभाग्य की बात है। यह एक ऐसी घटना है जो हर युग में घटती है। जब किसी महापुरुष का जिवन समाप्त होता है, तो इतिहास का एक काल पूरा होता है।
साधारण लोग जब मर जाते हैं तब संसार इस बात पर ध्यान नहीं देता कि वे कब जन्म लेते हैं और कब मरते हैं। लेकिन डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जैसे पुरुषों का जीवन संसार से परे होता है, वैसे ही उनकी मृत्यु भी संसार से परे होती है। वास्तव में, उनकी मृत्यु किसी महापुरुष के जन्म से भी बड़ी होती है। नदी का उद्गम कितना छोटा होता है। लेकिन जब वह अपने अनंत मुखों वाले सागर से मिलती है, तो उसके विस्तार और वैभव को देखने के लिए दो आँखें भी पर्याप्त नहीं होतीं।
क्या जीवन एक नाटक नहीं है? नाटक के शुरू होने की अपेक्षा उसके आरंभिक शब्दों में अधिक नाटकीयता दिखाई देती है। पैंसठ वर्ष पूर्व, डॉ बाबासाहेब आंबेडकर जब वह सेना में एक सूबेदार के घर पैदा हुए थे, तो उनके पड़ोस के चार-पाँच लोगों से ज़्यादा कौन जानता था? लेकिन परसों, जब भारत की राजधानी में उनकी जीवनी पूरी हुई, तो पूरी दुनिया ने उनके लिए आँसू बहाए।
वास्तव में, एक व्यक्ति की महानता उसकी मृत्यु में सिद्ध होती है हमने गोखले की मृत्यु देखी उन्हें अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए लोकमान्य तिलक सिंहगढ़ से उतरकर पुणे आए। जब लोकमान्य के पार्थिव शरीर को मुंबई शहर में दफनाया गया, तब हम भी मुंबई में थे। लाखों लोगों ने लोकमान्य को सिर पर उठा-उठाकर ले जाते हुए हमने अपनी आँखों से देखा कि कैसे लोकमान्य कैसे लोगों के दिलों पर राज करते थे।
तात्या केलकर ने मज़ाक में कहा था कि जिस व्यक्ति की शवयात्रा में सबसे ज़्यादा लोग इकट्ठा होते हैं, वह एक बडा व्यक्ति होता है। इस परिभाषा में बहुत अर्थ है। लोग बिना किसी कारण के एक व्यक्ति की मृत्यु पर इकट्ठा नहीं होते। महापुरुषों की शवयात्रा को जो लोग आते हैं वह केवल औपचारिकता के लिए नहीं आते बल्कि उनके दिल पर बडा आघात हो जाता हैं इसलिए श्रद्धा सुमन अर्पित करने आते हैं। लोगों का अंतःकरण खून से भर जाता हैं। डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का जीवन महान बडा महान था इसमें कोई शक है? उनकी मृत्यु इतनी बड़ी थी कि महापुरुषों को भी उनसे ईर्ष्या होती।
भारत के सात करोड़ अछूतों ने डॉ बाबासाहेब आंबेकर की मृत्यु का समाचार सुनकर खूब रोये होगे। कल मुंबई में उनके महापरीनिर्वाण के अवसर पर दस लाख लोग उपस्थित थे।
भारत में आज तक अनेक महान व्यक्तियों का निधन हुआ होगा लेकिन डॉ बाबासाहेब अंबेडकर का निधन एक ऐसे व्यक्ति का निधन है, जिनके निधन से लाखों हृदय द्रवित हो गए और लाखों नेत्रों से आँसू बह निकले ऐसा निधन केवल डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का ही!
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के महापरिनिर्वाण के कारण लोगों का दुःखी होना स्वाभाविक है। लेकिन डॉ बाबासाहेब अंबेडकर के निधन से अछूत समुदाय को जो दुःख हुआ, उसे शब्दों में बयां करना असंभव है। हमने अपनी आँखों से हजारों पुरुषों और महिलाओं को 'बाबा' के लिए विलाप करते हमने देखा। "बाबा के निधन के बाद अब हम अपना जीवन जीकर क्या करें?" इस प्रकार विलाप करते हुए, कितनों को बेहोशी आ गई।
जिन लोगों को अब तक डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की महानता पर संदेह था, उन्हें कल उनकी महानता का भव्य दृश्य देखना चाहिए था। यह दृश्य देखकर, उनके जन्म-जन्मांतर के शत्रु भी उनके भक्त बन जाते। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि हमारे बीच अभी भी ऐसे लोग हैं जो इतने अंधे हैं कि सूर्य के प्रकाश की तरह स्पष्ट दिखने वाले इस व्यक्ति की महानता को नहीं देख पाने वाले अंधे मौजूद हैं।
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर का अंतिम संस्कार सुनसान चौपाटी के रेगिस्तान पर करने की अनुमति लाखों अनुयाइयों द्वारा मुंबई राज्य के मुख्यमंत्री यशवंतराव चव्हाण से मांगी गई। अगर अनुमति देते तो लोकमान्य तिलक और विट्ठलभाई पटेल इनकी मुर्ति की कतार में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की मुर्ति चौपाटी के रेगिस्तान पर खडी होती, तो हर रोज समुद्र के पिछे अस्त होने वाला सूर्य प्रतिदिन कम से कम दो-चार मिनट और रुकता। लेकिन महापुरुषों की सेवा करने का यह महान अवसर कर्म से दरिद्री यशवंतराव चव्हाण ने गंवाया।
भारतीय संविधान के एक महान शिल्पकार और मध्यवर्ती सरकार के मंत्रीमंडल के पुर्व मंत्री के निधन से उसकी स्मृति में सरकारी कार्यालय अगर बंद रहते तो कांग्रेस की प्रतिष्ठा को कोई नुकसान नहीं होता। अपने जीवन काल में डॉ बाबासाहेब आंबेडकर ने कांग्रेस से दुश्मनी रखी उस कांग्रेस के राज में इतना सम्मान मिलना गलत है ऐसा यशवंतराव को लगा होगा कहावत है कि जब आदमी मरता है, तो दुश्मनी खत्म हो जाती है। लेकिन डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की मृत्यु के बाद भी यशवंतराव ने उनसे बदला लिया। लोकमान्य के लेखक गाडगिल ने भी डॉ बाबासाहेब आंबेडकर की समाधि पर "विकृत" और 'गाँवर जैसी' टिप्पणी करके सिद्ध कर दिया कि, वह भी यशवंतराव के अनुयायी हैं।
किसी महापुरुष की मृत्यु से साधारण लोगों का भी हृदय विशाल हो जाता है। लेकिन जब सूर्य अस्त होने पर उल्लू भी जोर-जोर से चिल्लाते रहते हैं दुनिया में ऐसे उल्लू हैं हम उनका क्या करें?
आचार्य अत्रे
संदर्भ
प्रबुद्ध भारत
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