डाँ.बाबासाह आंबेडकर कि पढाई और pHD
डाँ.बाबासाह आंबेडकर कि पढाई और pHD
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डाँ. बाबासाहब आंबेडकर ने अपने उमर के 25 वे साल मे याने 1916 मे कोलंबिया विश्वविद्यालय मे National dividend of India and a analytical study इस विषय में pHD का संशोधन सादर किया आगे उन्हें कोलंबिया विश्वविद्यालय ने उन्हें pHD प्रदान की।
यह प्रबंध1925 मे लंदन के पी.एस. किंग अँन्ड कंपनी ने The evolution of provincial Finance in British India इस नाम से प्रसिद्ध किया।
साथ साथ 1916 मे डॉक्टर गोल्डनवेयर इनके आयोजन से मानववंश शास्त्र परिसंवाद, Cast in India,their mechanism, genesis and development.
उन्होंने Administration and Finance of the East India Company इस विषय पर शोध प्रबंधलिखकर MA की डिग्री प्राप्त की।
सन 1921 मे Provincial decentralizatio of Imperial Finance in British India इस निबंध के लिए MSC पद्ववी दी गई।
1923 मे उन्हें The problem of rupee इस प्रबंध के लिए(DSC)
Doctor of science प्रदान की गई इस प्रबंध को किंग कंपनी ने प्रकाशित किया। यह ग्रंथ उन्होंने अपने मातापिता को उनके त्याग और शिक्षा के महत्व के लिए कृतज्ञता वर्ष उन्हें समर्पित किया।
पद्ववी प्राप्त कि केवल ढाई साल में उन्होंने यह दो डिग्रियां प्राप्त कि।
इसी के पूर्व उन्होंने विद्यार्थि संघटना के आगे Responsibility
of a responsible government in india यह आंदोलनात्मक लेख पढा इसे पढकर प्रसिद्ध राजनीतिक प्रो.हेराँल्ड जे लाँस्की ने कहा कि यह विचार क्रांतिकारी स्वरूप के है। इस तरह वे अमेरिकी से pHD लंदन से DSC, Barriester इत्यादि विषयों का अभ्यास किया।
कुल मिलाकर 3 सालो मे उन्होंने विशाल अभ्यासक्रम पुर्ण किया।
pHD के लिए मदत करने के लिए विशेष कृतज्ञता दर्शाते हुए उन्होंने महाराजा सयाजीराव गायकवाड बडैदा इनको ग्रंथ समर्पित किया है।
इस प्रस्तावना में डाँ.बाबासाहब ने अपने शिक्षक मिस्टर एडविन आर.ए.सेलिग्मन इन्होंने पब्लिक फाइनेंस के मूल सिद्धांतों को पढाने के लिए उनका कृतज्ञता व्यक्त करते उल्लेख किया है।
सेलिग्मन इन्होंने भी किताब की प्रस्तावना मैं लिखा है इस विषय के मूलभूत तत्वों का विस्तृत अभ्यास अन्य कहीं और हुआ होगा ऐसा मुझे लगता नहीं है।
ग्रंथ तैयार करते वक्त डाँ.बाबासाहब ने "मोंटफोर्ट सुधार" का उसमें अंतर भाव कर प्रबंधका विस्तार किया है।
ब्रिटिश सरकार उद्योगपतियों के फायदे के लिए भारत की नोकरशाही ने याँहा की अर्थव्यवस्था का इस्तेमाल किया है ऐसी टिप्पणी ग्रंथ मे करते हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर यह ग्रंथ केंद्रीय विधिमंडल के सदस्यों को अंदाजपत्र पर चर्चा के समय संदर्भ ग्रंथ हेतु सदस्य लेकर बैठते थे।
पुस्तक के अंत में डाँ. बाबासाहब के पसंदीदा सामाजिक प्रश्नों को लेकर सभारोप किया है। वे कहते है, 'राजकीय स्वतंत्रता के दो मार्ग होते हैं लश्कर का सामर्थ्य यह सेनी का सामर्थ्य होता है अथवा नैतिक सामर्थ्य। जिस देश के पास यह लश्कर सामर्थ नहीं होगी उस देश ने नैतिक सामर्थ्य को उच्च कोटि तक ले जाना चाहिए।
भारतमे राजनीतिक प्रश्न यह पूर्णत: सामाजिक प्रश्न है और सामाजिक प्रश्न आगे ढकेलना माने संपूर्ण भारतीय जनता के जनमत से स्वतंत्र सरकार निर्माण होगी इस दिन का इंतजार करना है।
ग्रंथ की भाषा विचार और जानकारी इससे 25 वर्ष उम्र के डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर की विद्वत्ता बहुत ज्यादा प्रगल्भ थी ऐसा प्रतीत होता है।
1926 मे इस ग्रंथ पर सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्री किन्स इनके
संपादकीय मे Journal of the royal economic society मैं निकलने वाला अंक डब्यू. एस.थँचर ने मार्मिकता से परीक्षण किया है।
संदर्भ:-वसंत मून
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