गुनाहगार जमात को मुख्य प्रवाह मे लानेवाले एकमात्र राजा


      कोल्हापुर संस्थान मे छत्रपती शाहु महाराज के कार्यकाल में अपने संस्थान में फांसे पारदी यह गुन्हेगारी जमात थी जो खुद को महाराणा प्रताप के वंशज समझते थे इस जमाती को जानबूझकर कई सुविधाओं से बेदखल,वंचित कर रखा था। फांसे पारधी यह जमाती जो पिछड़ी  जमात जिनकी रोजीरोटी पक्षोंयो को फांसे मे पकडना शिकार करना उन्हे बेचना था यह लोग उस पर अपना गुजर बसर करते थे।
      एक बार शाहू महाराज कटकोळा गाव आये वहाँ उन्हें फासे पारधी लोगों की अनेकों शिकायते मिली के गांव के फांसे पारधी जाती के लोग महाराज के छावनी पर डकैती डालते थे यह बात महाराज के सुनने में आई उन्हें सैनिकों द्वारा पकडकर कारागृह में रखा। उन्हें किसी बात की तकलीफ न देकर उनके खाने की व्यवस्था की शाहु महाराज का यह मानना था कि कोई भी लोग मुलत: गुनहगार प्रवृत्ति का नहीं होता। उनका गलत मार्ग पर चलने के अनेकों कारण हो सकते हैं जरूरी होता है उस बात को समझने की यही बात छत्रपति शाहू महाराज ने उन लोगों को उस जमात को समझा और उन्होंने इस बात को समझने की कोशिश की वह लोग चोरियां क्यों करते है। कोई भी व्यक्ति कारागृह में अपनी मर्जी से नहीं जाता है। शाहूजी महाराज ने उन लोगों को पुछा के वे लोग कोई उद्योग क्यों नहीं करते? सवाल पर उसी समाज के लोगों ने जवाब दिया कि हमें यह करने की कोई इच्छा नहीं होती यह सब हमारे पेट के लिए करते हैं जो परंपरागत करते आए हैं। काम नहीं मिलता क्यों की, हम लोग नाम से ही बदनाम होने के कारण कोई हमें काम नहीं देता और कोई हमे अपने पास खड़ा भी नहीं करता अगर किसी का पेट भरा हो तो यह सब क्या करता? पेट भूखा हो तो उस वक्त सर घूम जाता है और मजबूरन इस तरह के काम किए जाते हैं यह सब महाराज को बताने के बाद महाराज ने गुनहगार जाती को गुनहगार बनाने की वजह जानने की कोशिश की।     
     महाराज इस समाज के लिए द्रवित हुए और उन्हें पूरा विश्वास था कि यह लोग कभी विश्वासघात नहीं करेंगे उन्हें इस जाती को इंसानियत का जीवन यापन करने के लिए भरपूर प्रयास किया और उसके बाद इस जमात के लिए सोनतड़ी गांव मे उनके रहने का बंदोबस्त कराया और प्रत्येक व्यक्ति के घर मे अनाज पहुंचाने का कार्य किया और महाराज ने एक इतिहास पूर्ण निर्णय जो अनोखी तरीके से लिया उन्होंने अपनी छावनी मे चोरोंको पहरेदारी करने की नौकरी का कम दिया।लाल्या और आरवा जो चोरो के मुखीया थे उन्हीं को पहरेदारों का सरदार नियुक्त किया।
सोनतळी गांव के लोगों के बच्चों के लिए शिक्षा की व्यवस्था की जो बच्चे स्कूल जाएंगे उन्हें दो भाग रोटी देने की व्यवस्था की। इस जमात को शिक्षा मिलने से उनमें बदलाव दिखाई दिया। महाराज ने उनकी समस्याओं को सुलझाने का धिरे धिरे प्रयास किया और अंत मे इस जमात के लोगों को पुलिस, शिकारी, संदेश वाहक और अंगरक्षक के पदों पर नियुक्त भी किया।
1918 में हाजरी देने वाली पद्धति को बंद कराया। महाराज ने इस जमाती के गुजर बसर कि व्यवस्था हेतु उनको 288 एकड़ 3 गुंठा जमीन इनाम मे देकर परिवार के गुजर बसर की व्यवस्था हमेशा के लिए महाराज ने करवाई।
लोक कल्याण का ऐसा कार्य करने वाले संसार के पहले राजा बने छत्रपती शाहूजी महाराज को विनभ्र अभीवादन!

Comments

Popular posts from this blog

सॉची मोहोत्सव

संस्कारशील_पीढी_ही_समाज_की_समस्या_का_समाधान_है

अधिवक्ताओं ने डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम के प्रति भारी आलोचना क्यों की?