दृढ़संकल्प विस्तृत है।

दृढ़संकल्प विस्तृत है।
      समाज में बहुसंख्यक लोग सुनी-सुनाई बातों पर आंखें मूंदकर  विश्वास करने वाले ज्यादातर लोग मौजूद है। इसके विपरीत खुली आंखों से उस विषय की वास्तविक जानकारी तथा कारण की वजह जानने वाले थोड़े लोगों होते हैं। ऐसे बहुसंख्य लोग आपना अलग विश्र्व का निर्माण करते हैं जो एक पुश्तों से रुढ़ी परंपरा एवं संस्कारों की बैसाखी लेकर बड़े होते-होते बुढ़ापे में जाकर मर जाते हैं।
  ऐसे लोगों को अपने जीवन में काल्पनिक, मरीचिका एवं आभासी
 माणसीकता की आदत पड़ने से उन्हें काल्पनिक व मित्था बातों ज्यादा समर्पक और अच्छी लगती हैं। विषय और उसकी कारणों की वजह जानने की जरूरत महसूस नहीं होती। रेगिस्तान के मरीचिका को पानी समझना,पाणी भरे काचके ग्लास में डाली गई लकड़ी का तिरछा दिखाई देना परंतु सत्य मात्र कुछ और होता है ऐसे लोगों का आभासी जग इस तरह का विश्व  होता है और अन्य लोगों भी अपने इस राह पर चले ऐसा उन्हें अपेक्षित होता है।
     वर्तमान में इस तरह के बहुसंख्य लोग दिखाई देते हैं जो समाज को नकारात्मक पथ से मार्ग क्रमन करवाते हैं इन्हें सत्य असत्य,अच्छा बुरा यह महत्त्वपूर्ण नहीं होता बल्कि विशीष्ट व्यक्ती तथा समुदाय महत्त्वापुर्ण होता है लोक कल्याण नाममात्र रह जाता है मतलब व्यक्ती तथा समुदाय के हिसाब से उनका पसंदीदा क्रम बनता रहता है। एक कृत्य के लिए एक खास व्यवहार और उसी कृत्य के लिए दुसऱे व्यक्ती को दुसरी तरह का व्यवहार एसे असमानता का व्यवहार वें करते रहते हैं अन्याय को न्याय समझते हैं और इस तरह का आधा-अधूरा ज्ञान और वर्तन को वे सत्य मानते हैं।
    व्यक्ती एवं समुदाय यह ग़लत, दुराग्रही,अनैतिक रहा फिर भी दोस्ती, रिश्ते संभालना,गलतीया न निकालना, गलती को नजरंदाज करना, गलती को प्रोत्साहित करना, कृत्य नापसंद होन पर लाचारी को स्विकारना एसी नकारात्मक मानसिकता के लोग क्या व्यक्तीपरीवर्तन व समाज परीवर्तन कर पियोगे?
जिवन के ध्येय निरपेक्ष हो जो स्वाभीमान एवं सत्य को उपकृत करे, दुसरों को मदत करने वाले,समाज परीवर्तन करने वाले, समाज का एसा वर्ग हमेशा सत्य को हरदम निरंतरता से कसोटी पर तराशते रहते हैं।
  विषय कार्य और उसके कारणों की वज़ह ज्ञात कर के वह सत्य को सत्य और झुठ को झुठ कर अपनाते हैं तथा निर्णयात्मक कृत्य करते हैं।समाज में परीवर्तन का मुख्य आधार मानें विषय की चिकित्सा करना होता है। तथागत बुद्ध ने चिकित्सा की,संत कबीर ने चिकित्सा की, व्हाल्टेयर ने धर्मचिकित्सा की, छत्रपती शिवाजी महाराज ने चिकित्सा की, राष्ट्रीपिता ज्योतिबा फुलेंजी ने चिकित्सा की, छत्रपती शाहुजी महाराजने चिकित्सा की, प्रबोधनकार ठाकरे ने चिकित्सा की,श्रीधरपंत टीळक ने चिकित्सा की,दाभोळकर,पानसरे,कुलबर्गी,गौरीलंकेश इन सारे लोगों ने चिकित्सा कर अपने प्राण की आहुती दी।
   परीवर्तन करने वाले यह चिकित्सक थे उन्होंने स्थापित  व्यवस्था को प्रश्र्न पुछे?प्रश्र्न रखे?क्यो?कैसा? किसलिए? पुछ कर विषय की चिकित्सा की सत्य को सत्य समझे तथा समाज को न्याय दिया, हम कब आवाज बुलंद करेंगेे कब बोलेंगे?कब सवाल पुछेंगे?सत्य को सत्य एवं झुठ को झुठ कब कहेंगे?
 अन्याया अत्याचारक्षके  विरुद्ध कब बोलेंगे, लिखेंगे? कितने लोग बोलते हैं? मैंने व्यक्तीगत स्तर पर बोलने, लिखने एवं चिकित्सा के कारण समंध,मित्र,रिश्ते नाते गवांये है और यह निरंतरता से चालने वाला है क्योंकि जो चिकित्सा जो की जाती है वह किसको अच्छा बुरा लगे,पसंद नापसंद लगे यह मायने नहीं रखता कर्मों की, मेरा दृढ़संकल्प सत्य को उजागर करना है ऐसा दृढ़संकल्प रखनेवाला व्यक्ती समाज आज नही तो कल जन्म लेगा क्यो की काल अनंत है और पृथ्वी विस्तीर्ण है।

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