दुष्ट न्यायी सज्जनऔर सर्वोत्तम पुरुष के बारे में तथागत बुद्ध और मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स के विचार
दुष्ट न्यायी सज्जनऔर सर्वोत्तम पुरुष के बारे में तथागत बुद्ध और मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स के विचार
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समाजिक तथा व्यक्तीगत जिवन में विविध प्रवृत्ती के व्यक्तीत्व दिखाई देते हैं जो व्यक्तीगत गुण वैशिष्ट्य द्वारा समाज में अक्सर दिखाई देते हैं जो योग्य अयोग्य,स्वार्थी निस्वार्थी,दुष्ट न्यायी,सज्जन और सर्वोत्तम पुरुष को पहचानने वाले लक्षन दिखाई देते हैं। तथागत बुद्ध ने पहली बार इन्सान के मन में उत्पन्न होने वाले विकार तथा मन पर कार्यरत करने के उपरान्त दोनों परिस्थिति में व्यक्ती विशेष के गुण दोष दिखाई देते हैं इसी मानसिक गुणों की बात विश्व के प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स बुद्ध की बुनियादी शिक्षा अपने सिद्धांत में वर्णित करते हैं।
मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स ने संघटन तथा व्यक्तिनिष्ठा पर जागतिक सर्वेक्षण से अपना मत प्रर्दशित किया है। समाज का नेतृत्व करने के लिए सदाचरण,स्वार्थत्याग और समाजनिष्ठा इनकी विद्वत्तासे अधिक जरुरत होती है क्योंकि समाज में कोई भी सत्कार्या से प्रवृत्त होणा यह शुद्ध मन का गुणधर्म होता है इस सर्वेक्षण से ऐसा दिखाई दिया के पद पैसा और सत्ता के प्रभाव में जीवन जिने वाले लोग यह व्यक्तीनिष्ठ होते हैं किसी के प्रभाव में आकर उनकी मर्जी को संभालने के लिए चापलूसी और हां मैं हां मिलाने वाली बातें करने को तैयार रहते हैं।
इस तरह के लोग खुद के अस्तित्व हेतू नैतिकता को दरकिनार करना इनका स्थायीभाव होता है समाज के लिए अथवा किसी भी सामाजिक परिवर्तनवादी संघटन के लिए कभी भी हितकारक नहीं रह सकता ऐसे व्यक्तित्व के इंसान अवसरवादी होते हैं तथा इनका वस्तूनिष्ठ मुल्यांकन बेहद संकुचित होता है। ऐसे व्यक्तीत्व से प्रभावित होकर जो काम करते हैं ऐसे लोगों का उपयोग कर उन्हें खत्म कर दिया जाता हैं। ऐसे लोगों के पास स्वयं की बुद्धी का अभाव रहता है ऐसे लोग बड़े लोगों के प्रभाव में आने पर मदारी के बन्दर समान नाचने लगते हैं। ऐसे प्रभाव में जिने वाले सभी आदमी लाचारी में जिना पसंद करते हैं। योग्य अयोग्य विचार न कर जिनके प्रभाव में कार्य करते हैं उनकी केवल मर्जी संभालकर कार्य को पुरा करना यही मात्र प्रयास होता है।
स्वार्थ,इर्षा,अहंकार, अव्यवहार झुठ,फरेबी,कामचोरी विध्वंसकता यह स्वयं को प्रर्दशित करने का माध्यम होता हैैं जहां यह व्यक्ती प्रतिभासंपन्न व्यक्ति के सहारे से बड़े हो कर,स्वयं द्वारा कोई कार्य न करते हुए कार्य करने का श्रेय लेना इस तरह का निरंतर प्रयास करना यह विचारधारा समाज में अक्सर दिखाई देती है। नकारात्मक विचार अपना कर स्वार्थ युक्त कार्य कर सामाजिक हित से ज्यादा ख़ुद का हित करना, पद के ग़लत उपयोग से दुसरों का नुकसान करना, समाज और समुदाय में सांप्रदायिक तनाव का माहौल बनाना, किसी भी अच्छे कार्य मे बाधा निर्माण करना, दुसरो को बदनाम कर चुगली करना इस तरह का कार्य करने वाले अकसर समाज में पाये जाते हैं। समाज में उपर दाये व्यक्ती विशेष के गुण जो स्वार्थी पुरुष,दुष्ट पुरुष,अयोग्य पुरुष को मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स ने परीभाषीत किया है।
समाज में मनुष्य के स्वभाव गुणों से ही व्यक्ती दुसरो के साथ योग्य व्यवहार की पहचान हेतु तथागत बुद्ध ने ढ़ाई हजार साल पहले समाज में मैजूद व्यक्ती के स्वभाव गुणों के बारे में अपने शिष्यों को प्रवचन के माध्यम से बताया है। जिस में दुष्ट पुरुष,सर्वोत्तम पुरुष,न्यायी पुरुष तथा सज्जन पुरुष के बारे में बताया है।
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दुष्ट पुरुष
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दुष्ट मनुष्य को कैसे पहचानें दुष्ट व्यक्ति के लक्षण यह होते हैं।
1)दुष्ट मनुष्य न पुछने पर भी दुसरो के दोष बताये जाता है और उसे दुसऱो के विषय में पुछा जाय तो क्या कहने वह दुसऱों के दोष तथा व्यंगे को न छिपाते और चाव से पुरे ब्यैरे के साथ बताने लगता है ऐसा मनुष्य दुष्ट होता है।
2)जिस मनुष्य को पुछने पर भी दुसऱों के सद्गुणो को बयां नहीं करता,बार बार पुछने पर ही वह दुसरो के गुण बताता है ऐसा मनुष्य दुष्ट होता है।
3)जिस मनुष्य को पुछने पर भी अपने दोष के बारे में बताता नहीं है पर न पुछने पर क्या कहने बार बार पुछने पर ही वह अपने दोष बताता है परंतु तफ्सील से सत्य को छुपाता है ऐसा मनुष्य दुष्ट होता है।
4)ऐसे भी मनुष्य होते हैं,जो न पुछने पर भी अपनी अच्छी बातें उजागर करतें रहता है और पुछने पर क्या कहने वह अपनी सभी बातें तपशील से अपने गुणों का बहुत ज्यादा गुणगान करता है ऐसा मनुष्य दुष्ट होता है।
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सर्वोत्तम पुरुष
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सर्वोत्तम पुरुष को कैसे पहचानें हैं इस व्यक्ति के लक्षण यह होते हैं।दुनीया में चार तरह के पुरुष होते हैं
*1)प्रथमा तरह का मनुष्य वह है जो स्वयं के साथ साथ दुसरो के कल्याण हेतु संघर्ष करता हैं।
2)दुसरे तरह का मनुष्य वह होता है जो स्व हित को छोड़कर दुसरो के हित के लिए जिता है।
3)तिसऱी तरह का मनुष्य स्व हित के लिए संघर्षरत रहता है परंतु दुसरों के लिए नहीं।
4)चौथे तरह का मनुष्य स्व हित के लिए संघर्षरत रहता है उसी तरह दुसरो के हितों के लिए भी संघर्षरत रहता है।
जो खुद के अथवा दुसऱो के हित के लिए संघर्षरत नहीं रहता वह मनुष्य दो बाजुओं में जलाई गई और बिच में गोबर से भरी चिता पर जलती मशाल के समान है। इसका गांव में या बन में इसका उपयोग इंधन की तरह नहीं होता उसी तरह वह मनुष्य दुनिया को तथा स्वयं के लिए भी उपयुक्त नहीं होता।
जो खुद के कल्याण का त्याग कर दुसरो के कल्याण के लिए संघर्षरत रहता है। वह तिसरे तरहां के मनुष्य से भी अधिक अच्छा पुरुष होता है।
जो खुद के लिए और दुसरो के कल्याण हेतु संघर्षरत रहता है इस तरह के पुरुष को सर्वोत्तम पुरुष समझा जाता है।
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न्यायी और सज्जन पुरुष
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मनुष्य चार तरह के होते हैं अगर आपको सज्जन पुरुष,न्यायी पुरुष को जानना है तो यह चार तरह के भेद को जानना चाहीए
1)प्रथम प्रकार के इंसान स्वकल्याण के लिए संघर्षरत रहते हैं। परंतु अन्य लोगों के कल्याण के बारे में सोचते भी नहीं इस तरह के लोग खुद में उत्पन्न विषय वासना का नाश करते हैं परन्तु दुसरो ने विषय वासना का त्याग करना चाहिए इस लिए उन्हें कभी भी आग्रह कर बताते नहीं है वह अपने मन में उत्पन्न क्रोध का त्याग करते हैं परन्तु दुसरो ने क्रोध का त्याग करने के बारे में बताते नहीं है। वह खुद में उत्पन्न अवीद्या को त्याग ने पर कार्य करतें हैं परंतु दुसरो की अवीद्या को त्याग करने के बारे में बताते नहीं है ऐसे पुरुष खुद के कल्याण का मार्ग बनाते रहते हैं परंतु दुसरों के कल्याण हेतु संघर्षरत नहीं रहते।
2)दुसऱी तरह के मनुष्य दुसरो के हित के लिए संघर्षरत रहते हैं वह स्वयं हित के लिए संघर्षरत नहीं रहते ऐसे इन्सान अपने में विषय वासना, क्रोध और अविद्या के नाश करने का प्रयास न कर दुसरो को मात्र ऐसा करने का आग्रह करते हैं। इस तरह के इंसान दुसरो के हित के लिए संघर्षरत रहते हैं परंतु खुद के लिए नहीं रहते।
3)तिसऱे तरह के मनुष्य स्वयं हित के लिए अथवा दुसरो के हित के लिए संघर्षरत नहीं रहते ऐसे मनुष्य खुद की विषय वासना क्रोध और अविद्या का नाश नहीं कर पाते उसी तरह दुसरो को भी ऐसा करने के लिए बताते नहीं है यह मनुष्य खुद का हित तथा दुसरो का हित करने का प्रयत्न नहीं करते।
4)चौथे वर्ग के मनुष्य स्वयं कल्याण और दुसरो के कल्याण हेतु संघर्षरत रहते हैं। ऐसे मनुष्य खुद की विषय वासना, क्रोध और अविद्या के नाश हेतु संघर्षरत रहते हैं उसी तरह दुसरो को भी विषय वासना, क्रोध और अविद्या के नाश करने के लिए आग्रह पूर्वक बताते हैं ऐसे मनुष्य स्वयं हित तथा दुसरो के हित के लिए संघर्षरत रहते हैं इस तरह के लोगों को न्यायी और सज्जन पुरुष माना जाता है।
हम हमारे स्वभाव गुणों जो योग्य अयोग्य,स्वार्थी निस्वार्थी,दुष्ट न्यायी,सज्जन और सर्वोत्तम पुरुष के गुणों की पहचान कर स्वयं को सर्वोत्तम व्यक्तीत्व निर्माण करने का जरुर प्रयास करें।
संदर्भ:-
1)बुद्ध और उनका धम्म
2)मनोवैज्ञानिक एरीक एरीसन्स
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