Posts

भारत कि पहली अभ्यास यात्रा का उद्देश्य

Image
🇸🇨🇸🇨☸️🇸🇨🇸🇨      सांस्कृतीक तथा धार्मिक स्थलोकी यात्रा किसी विशेष विषय को लेकर यात्रा की जाती है या किसी विशिष्ट विषय को लेकर अभ्यास गट यात्रा जरूर करते हमने देखा है।ऐसी कोई यात्राएं देखी गई है मगर अभ्यास करने के लिए ग्यान को पाने के लिए अभ्यास यात्रा का आयोजन भारत मे पहली बार किया जाना यह जक अद्भुत घटना है। डाँ. बाबासाहेब आंबेडकरजी का मुलमंत्र है ग्यान संपादन करना और नैतिकता का अनुसरण करना यह मात्र अभ्यास से ही प्राप्त किया जा सकता है ग्यान का महत्व समाज के रोम रोम में बसाने के लिए मा.डाँ.प्रशांत रोकडे सर IRS (Joint Commission Airport Delhi) इनकी संकल्पना से साकार होकर वह जनमानस में छानें का संकल्प "राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले अभ्यासिका" आंदोलन के माध्यम से अंमल मे लाकर वह जनमानस में आचरण करने के लिए चलने वाली निरंतर प्रक्रिया है।     समाजीक घटकोंमे मानव मुल्यों को जमीन स्तर पर अंमल मे लाने के लिए हमारे महापुरुष ज्योतिबा फुलेजी,छत्रपति शाहूजी महाराज , डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर इन्हें ने अपने जीवन को समाज के प्रति समर्पित किया परंतु आज भी समाज मे संव...

महाराष्ट्र के सहीत्यीक आचार्य अत्रे का लेख:- ऐसा प्रेम ऐसा शोक

Image
महाराष्ट्र_के_सहीत्यीक_आचार्य_अत्रे का लेख:- #ऐसा_प्रेम_ऐसा_शोक महापरीणीर्वान दिन 6 डिसेंबर 1956 🌷🌹🙏🏻🌹🌷       हमने अपने जीवन में आजतक  कभी नहीं देखीं। छत्तीस वर्ष पहले लोकमान्य तिलक का निधन हुआ तब सारे भारत को दुख हुआ लाखों लोग उनके महायात्रा के लिए ऐकत्रित हुए इतना जनसमूह किसीने देखा नहीं था। लोकमान्य कि भारतीय लोग पूजा करते थे। जब लोकमान्य का देहांत हुआ तब लोगोंको दुख होना इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। परंतु उस दुख का स्वरूप सामुदायिक था वैयक्तिक नही था। लोकमान्य कि मृत्यु राष्ट्रीय आपत्ति यह सर्वसामान्य कि भावना थीं।इसलिये लोगोंको उस समय दुख हुआ वह वैचारिक स्वरूप का दुख था वह भावनात्मक नहीं था।लोकमान्य के लिए हजारों लोग रो रहे है ऐसा दृश्य हमें देखने को नहीं मिला।      जब महात्मा गांधी जैसे सांसारिक व्यक्ति की अमानवीय तरीके से हत्या कर दी गई तब लोगों को सबसे ज्यादा दुख हुआ और अनेकों लोगों की आखों से अशृ कि धारा बहने लगी। यह घटना स्वाभाविक थी। लेकिन जैसे ही लोगों को महसूस हुआ कि गांधी की मृत्यु एक अपरिहार्य घटना है इसका...

आचार्य_अत्रे_यांचे_भाषण व बौद्ध_धर्म_दीक्षा

Image
#6_डिसेंबर_1956_महापरिनिर्वाण_दिवशी 🔥#आचार्य_अत्रे_यांचे_भाषण व 🔥#बौद्ध_धर्म_दीक्षा  💐🌷🌷🌷💐       मुंबई शुक्रवार दि.7/12/1956 सायंकाळी सात वा. दादर चौपाटीच्या समुद्र किनारी 10 ते 12 लाख लोकांच्या साक्षीने डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर यांच्या पार्थिव देहाला अग्नीसंस्कार देण्यात आला. अग्नीसंस्कारा पुर्वी लंका, मलाया, ब्रम्हदेश येथून आलेल्या भिख्खूंची प्रवचने झाली.   #बौद्ध_धर्म_दीक्षा      दादासाहेब गायकवाड यांनी शोकाकुल बांधवांना उद्देशन भाषण केले ते म्हणाले की, "दि.१६ रोजी लक्षावधि अस्पृश्यांना बौद्ध धर्माची दीक्षा देण्यासाठी बाबासाहेब येणार होते. पण दुर्देवाची गोष्ट की ते अशा त-हेने आज आपल्या येथे आलेले आहेत. म्हणून ते येऊन जे कार्य करणार होते ते याच ठिकाणी त्यांच्या पवित्र देहाला साक्ष ठेऊन आपण करूं या. म्हणून मिख्खु आनंद कौशल्यायन योनी धर्मान्तरांचे काम आतां सुरु करावे अशी विनंती करतो".      "ज्यांना बौद्ध धर्माचा स्वीकार करायचा असेल त्यांनी हातवर करावे!" त्याबरोबर पाच लक्ष हात वर झाले. मग बौद्ध भिख्खुंनी सांधिक प्रार्...

वर्षावास क्यों?

Image
🇸🇨🇸🇨☸️🇸🇨🇸🇨 आषाढ़ पूर्णिमा का अर्थ है गुरु पूर्णिमा। बुद्ध धम्म में इस पूर्णिमा का क्या विशेष महत्व है❓ 🇸🇨🇸🇨☸️🇸🇨🇸🇨           भगवान बुध्दने उनका पहला वर्षावास इ.स. पूर्व ५२७ को ऋषीपतन सारनाथ मे व्यतीत किया था और इ.स.पूर्वी ४८३ मे अंतिम ४५ वा वर्षावास किया था।* *उन्होंने खुद श्रावस्ती, जेतवन, वैशाली, राजगृह इत्यादी विहारोमे वर्षावास किये इस तरह सद्धम्म का प्रचार प्रसार भगवान बुध्द द्वारा कर मानव कल्याण के लिए  धम्मपथ के राजमार्ग पर आरूढ किया। वर्षावास का समंध भगवान गौतम बुध्द के जीवन की अनेको संस्मरणीय घटनाओसे जुड़ी है।आषाढ पौर्णिमा को वर्षावास आरंभ होता है और अश्विन पौर्णिमा को संपन्न होता है।* *भगवान गौतम बुध्द के जीवन मे आषाढ़ पौर्णिमा कि कुछ प्रमुख संस्मरणीय घटनाएं*     *1)आषाढ़ पौर्णिमा के दिन महामाता महामाया को गर्भधारणा हुई थी।* *2)इसी दिन सिद्धार्थ गौतमने गृहत्याग किया था।* *3)इसी दिन सारनाथ मे भगवान बुध्दने पंचवर्गीय भिक्खूं को प्रथम धम्मचक्क पवत्तन सुत्त का उपदेश किया था और उन पंचवर्गीय भिक्खूं  ने भगवान गौतम बुध्द को गुरु...

14अप्रेल_डॉ_बाबासाहब_की_जयंती_के_उपलक्ष_मे_हमारी_जिम्मेदारी_और_सम्यक_संकल्प_क्या_हो

Image
🇸🇨🇸🇨☸️🇸🇨🇸🇨         डॉ.बाबासाहब के जयंती अवसर पर केवल महाराष्ट्रा राज्य मे जयंती उत्सव पर 280 करोड ₹ से अधीक खर्च किया जाता हैं. महापुरुषों कि विचारधारा को फलफुलनेके लिये खाद्य और पानी देने के लिए उत्सव का आयोजन किया जाना बेहद जरूरी है उत्सव प्रियता हमारी संस्कृति और स्वाभीमाण है उत्सव तो होना ही चाहिए परंतु वह मध्यम मार्ग पर चलकर मनाना जरुरी है, तभी हम सब मिलकर सामाजिक कार्य को अधीक गतीमन कर सकते है.      डॉ.बाबासाहब समाज के प्रती गंभीर चिंता व्यक्त करते थे उनके द्वारा दी गई जिम्मेदारी; जन समूह के लिये, उनके समर्थकों के लिये, भूमिहीन मजदूर जो आज स्लम झुग्गी मे रह रहे है उनके लिये, बौद्ध भिक्षुओं (अब यह अनुयायियों की भी जिम्मेदारी है),शासकीय कर्मचारियों (सोए कर्मचारियों को जगाकर) छात्रों एवं युवाओं से (सही समय पर सम्यक ग्यान लेकर IAS,IPS,IRS बडे ओहदे के नैतिक अधिकारी बनाने के लिये कार्य) इन सब के लिये चिंतित थे. हमारे जयंती के बजट मे दि गई जिम्मेदारी, समस्याओं पर गंभीरता से कार्य के लिये नियोजन करना जरुरी है, जिससे हमारे समाज को बनान...