महाराष्ट्र के सहीत्यीक आचार्य अत्रे का लेख:- ऐसा प्रेम ऐसा शोक
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#ऐसा_प्रेम_ऐसा_शोक
महापरीणीर्वान दिन 6 डिसेंबर 1956
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हमने अपने जीवन में आजतक कभी नहीं देखीं। छत्तीस वर्ष पहले लोकमान्य तिलक का निधन हुआ तब सारे भारत को दुख हुआ लाखों लोग उनके महायात्रा के लिए ऐकत्रित हुए इतना जनसमूह किसीने देखा नहीं था। लोकमान्य कि भारतीय लोग पूजा करते थे। जब लोकमान्य का देहांत हुआ तब लोगोंको दुख होना इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। परंतु उस दुख का स्वरूप सामुदायिक था वैयक्तिक नही था। लोकमान्य कि मृत्यु राष्ट्रीय आपत्ति यह सर्वसामान्य कि भावना थीं।इसलिये लोगोंको उस समय दुख हुआ वह वैचारिक स्वरूप का दुख था वह भावनात्मक नहीं था।लोकमान्य के लिए हजारों लोग रो रहे है ऐसा दृश्य हमें देखने को नहीं मिला।
जब महात्मा गांधी जैसे सांसारिक व्यक्ति की अमानवीय तरीके से हत्या कर दी गई तब लोगों को सबसे ज्यादा दुख हुआ और अनेकों लोगों की आखों से अशृ कि धारा बहने लगी। यह घटना स्वाभाविक थी। लेकिन जैसे ही लोगों को महसूस हुआ कि गांधी की मृत्यु एक अपरिहार्य घटना है इसका ग्यान होते ही लोगों का दुख कम हो गया। हालाँकि, गांधी की मृत्यु के पश्चात हजारों लोग रो रहे है ऐसा दृश्य कहीं देखने को नहीं मिला।
लेकिन अम्बेडकर की मृत्यु के बाद उनके लाखों अनुयायियों का असीम प्यार और उनकी आकस्मिक मृत्यु के कारण लोगों को अचानक हुआ शोक के कारण लगातार दो दिनों के लिए हमें जो दिल दहलाने वाला प्रदर्शन देखने को मिला, वह वास्तव में अतुलनीय है। इसलिए शुरुआत में कहा है के ऐसा प्रेम ऐसा शोक हमने आजतक नहीं देखा।
डाँ.अम्बेडकर की मृत्यु हर अस्पृश्य को अपने जन्मदाता पिता की मृत्यु के समान महसूस होती है। मेरा सबसे प्रिय व्यक्ति चला गया है। मेरा परिवार को आसिम हानि हुई वह सोचते हैं कि मेरे जीवन का अनमोल खजाना चला गया। ऐसा दिलोदिमाग से लोगों को लगता था।
डाँ.अम्बेडकर की मृत्यु का समाचार सुनकर बहुतायत लोगों दुख महसूस होने से मुर्छित हूए थे। कई लोग दिवाली पर सर पटककर अपना शोक प्रकट कर रहे थे सर्वसामान्य लोगों कि यह स्थिति होना स्वाभाविक था परन्तु केन्द्रीय मंत्रीमंडल मे रहे मंत्री जगजीवनराम सरीखे मंत्री दिल्ली मे जब बाबासाहबा के दर्शन हेतु गये तब अपना शोक व्यक्त करत रोते हुए कहा के "बाब आज मै मध्यवर्ती सरकार मे मंत्रीपद पर हूं वह केवल आपकी कृपा से ही हु"।
डाँ.बाबासाहेबा का शव जब सांताक्रूज विमानतल पर लिया गया तब असंख्य अनुयायियों ने कहा कि "बाबा हमे छोडकर कैसे चले गये हो"।लोगों के इस दुखद आक्रोश के कारण पत्थर के कलेजे का दिल भी पिघल गया होगा।
'राजगृह मे अन्त्यदर्शन के लिए रखें पार्थिव शरीर के चारों ओर एक मिल परीसर मे उनके चाहने वाले का प्रचंड महासागर जमा हुआ था। यह दृश्य जिन्होंने अपनी आँखों से देखा वे औरो को किस तरह बयान करें!
हिंदु कालोनी में रहने स्पृश्य हिन्दू रहीवासी वह अभूतपूर्व नजारा देख कर अचरज मे पडे डाँ.बाबासाहेबा को भगवान समान माननेवाले लाखों लोग मुंबई शहर मे रहते है इस बाबत कि आजतक हमें खबर नहीं थी ऐसे अनेकों लोगों के द्वारा वार्तालाप हमने हमारे कानों से सुना है।
मास्को में लेनिन के मकबरे के सामने हर दिन हजारों स्त्री पुरुषों की कतारें होती हैं, उनसे कई गुना लंबी, दूसरे दिन अंतिम संस्कार के इंतजार में लोगों की कतारें थीं। और अंतसंस्कार के वक्त तो लोगों के शोक की बाढ को बहते देखा गया है।
डाँ.बाबासाहेबा के गुणों और कार्यों का वर्णन करने हम करने लगे तो लोग जोर जोर से रोने लगे उस समय भगवान भी उनका सांत्वना करने मे नाकाम रहे होते।
सारे कब्रिस्तान में आंसुओं की बारिश हो गई। हमने कभी एक आदमी के लिए हजारों लोगों को इस तरह आंसू बहाते और शोक करते नहीं देखा। और हमें नहीं लगता कि किसी ने इस तरह का दृश्य देखा है।
हिंदू समुदाय के लोगों को वास्तव में सोचना चाहिए कि अंबेडकर को लाखों अनुयायियों द्वारा इतना प्यार क्यों किया जाता है। हिंदू समाज ने पांच हजार साल से करोड़ों लोगों के साथ मरे हुए जानवरों से भी ज्यादा हीन व्यवहार किया है। अम्बेडकर ने उन्हें पुनर्जीवित किया और उन्हें वापस मनुष्यत्व प्रदान किया। अंबेडकर ने सात करोड़ अछूतों को नया जन्म दिया और उनका उद्धार किया। जब तक अम्बेडकर जीवित थे, अछूतों को कोई भय नहीं था। सरकार का न तो स्पृश्य हिन्दू लोगों का।
अम्बेडकर एक शेर की तरह थे। आंबेडकर के सामने किसी को खडे रहने की हिम्मत नहीं थी।
जब एक शेर कि आवाज लगाते तो तो दुश्मन का सीना भर जाता था। विरोधी को हिला देते थे। वह कितना भी बड़ा विद्वान या कूटनीतिज्ञ क्यों न हो, वह अंबेडकर के सामने दाल नहीं पका सकता था। बाबासाहेबा बुद्धिमत्ता,चरित्र और कर्तुत्व के हिमाचल थे।
अस्पृश्य समाज को कितना आधार था उनका? वह आधार आज ढह गया है इसी कारण आज जनसमूह रो रहा है। उनके पास पाँच हज़ार वर्षों में इतना बड़ा नेता नहीं मिला था। उन्हें फिर से ऐसा नेता कौनसे जन्म में मिलेगा? इस एक विचार से उनका हृदय फट रहा था!
संदर्भ:-
प्रबुद्ध भारत 29/12/1956
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