घर वापसी याने बौद्ध धम्म की दिक्षा
डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने ‘Annihilation of Caste’ (जाति का विनाश) में कहा, “जब मैं धर्म बदलूँगा, तब मैं आपके बीच का नहीं रहूँगा”, इसका अर्थ था कि, मैं उस समाज का हिस्सा नहीं रहूँगा, जिसकी व्यवस्था ही मनुष्य को ऊँच-नीच में बाँटने पर आधारित है।
डॉ बाबासाहेब आंबेडकर क्यों जाति-व्यवस्था के धार्मिक और सामाजिक मूल पर गहरा प्रहार कर रहे थे?
‘Annihilation of Caste’ मूल रूप से 1936 में जात-पात तोडक मंडल (लाहौर) द्वारा आयोजित सम्मेलन के लिए तैयार भाषण था। लेकिन जब आयोजकों ने देखा कि डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर का भाषण हिंदू धर्मशास्त्रों की जड़ पर प्रहार करता है, तो उन्होंने भाषण रद्द कर दिया। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने यह भाषण स्वयं प्रकाशित किया और इसी कारण इसका ऐतिहासिक महत्त्व बढ़ गया।
डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर ने महसूस किया था कि जाति का उन्मूलन केवल सामाजिक सुधार से नहीं होगा, क्योंकि जाति की जड़ें धर्मग्रंथों और श्रुति-स्मृतियों में हैं।
जब तक लोग उसी धर्म में रहेंगे जो जाति को “दैवी आदेश” बताता है, तब तक समानता सम्भव नहीं।
इसलिए वे कहते हैं कि,“हिंदू समाज तब तक समानता नहीं देगा जब तक उसकी धार्मिक नींव नहीं बदली जाती। ”अर्थात् जब मैं धर्म बदलूँगा यानी ऐसी जीवनदृष्टि अपनाऊँगा जहाँ मनुष्य को मनुष्य माना जाए, तब मैं इस असमान समाज का हिस्सा नहीं रहूँगा"।
उनका धर्म परिवर्तन एक क्रांति की पहल थी मनुष्य की गरिमा,समानता और स्वाभिमान के लिए उठाया गया महत्वपूर्ण कदम था। तात्पर्य यह कि वे उस धार्मिक ढांचे से मुक्त होना चाहते थे
जो जाति-व्यवस्था को वैधता देता है। वे यह भी कहते थे कि, “यदि समाज जाति को नहीं छोड़ता, तो मैं उस धर्म को छोड़ दूँगा जो जाति को जन्म देता है।” इस समस्या पर कारगर एकमात्र उपाय धर्मांतरण याने बौद्ध धम्म की दिक्षा!
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