अंधेरे में काली बिल्ली The Black Cat in the Dark
समाज में व्याप्त सामाजिक और आर्थिक शोषण, जातिव्यवस्था, गरीबी, अन्याय, अत्याचार, और अंधविश्वास पर प्रहार किए बिना केवल राजनीतिक परिवर्तन लाना याने "अंधेरे में काली बिल्ली खोजने जैसा" व्यर्थ प्रयास है।
यदि किसी अंधेरे कमरे में काली बिल्ली हो, तो वह दिखाई नहीं देगी। सच यह है कि कमरे में बिल्ली मौजूद होते हुए भी, अंधेरे के कारण वह दिखाई नहीं देती। यथार्थ यह है कि बिल्ली भी है और अंधकार भी है।
यदि कमरे में काली बिल्ली हो ही नहीं, लेकिन कहा जाए कि वहाँ काली बिल्ली है, तो बिल्ली के अस्तित्व के बिना भी ऐसा प्रतीत होगा जैसे वह वहाँ है। सत्य यह है कि अंधकार तो है परन्तु बिल्ली नहीं है। वास्तव में, गलत ढंग से और गलत दिशा में किसी समस्या का समाधान खोजने का प्रयास करना "अंधेरे में काली बिल्ली खोजने" के समान है।
समस्या का मूल ढूंढना आवश्यक है। जैसे अंधेरे में काली बिल्ली खोजने की बजाय अगर प्रकाश कर लिया जाए, तो यह स्वतः स्पष्ट हो जाएगा कि बिल्ली है या नहीं। एक बार प्रकाश होने पर बिल्ली को देखना संभव है। इसलिए समस्या के मूल स्रोत का पता लगाना महत्वपूर्ण है।
समाज में सामाजिक और आर्थिक असमानता, जातिव्यवस्था, गरीबी, अन्याय, अत्याचार, बेरोजगारी जैसी समस्याओं को समाप्त करने के लिए सबसे पहले इनके मूल कारणों को पहचानना जरूरी है। सच्चे परिवर्तन के लिए समाज की संरचना में मौलिक बदलाव आवश्यक हैं। केवल बाहरी परिवर्तन पर्याप्त नहीं हैं।जातिव्यवस्था, धर्म, और आर्थिक विषमता जैसी जड़ समस्याओं पर प्रहार किए बिना केवल सतही उपाय करना "अंधेरे में काली बिल्ली खोजने" जैसा है।
यदि सच्चे सामाजिक परिवर्तन के लिए मौलिक समस्याओं की उपेक्षा की जाए, तो प्रतिक्रांति(counter-revolution) होती है, यानी पुरानी व्यवस्था किसी और रूप में बनी रहती है। केवल राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त करने से भारत में सामाजिक समानता स्थापित नहीं हो सकती।
समस्याओं के मूल को पहचानकर उनके समाधान हेतु मूलभूत सुधार करना आवश्यक है। आधे-अधूरे उपाय या गलत दिशा में किए गए प्रयास केवल पाखंड हैं। डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर के विचार आज भी भारत सहित विश्व की समस्याओं के समाधान का मार्ग दिखाते हैं।
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