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बहिष्कृत भारत का लेख डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने मनुस्मृती क्यो जलाईं

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★★★★★ 🔥🔥🔥🔥       महाड सत्याग्रह परिषद पर जो लोग बड़ा आरोप लगाते है कि मनुस्मृति जलाईं है उपरोक्त आपत्तियां करने वालों ने या तो मनुस्मृति नहीं पढ़ी होगी या फिर उन्होंने मनुस्मृति में बताए गए नियमों को स्वीकार कर लिया होगा। इस देश में यह परंपरा रही है कि जो लोग राजनीति में उग्र होते हैं, वह सामाजिक मुद्दों पर नरम रुख अपनाते आये है इस परंपरा में अपवाद मात्र स्वराज्य के संपादक है हमें यकीन है कि वह राजनीति के साथ-साथ सामाजकारन स्तरपर उग्र रहेंगे। हम यह नहीं कहते कि ऐसी परिस्थिति में मनुस्मृति में निहित सिद्धांत उन्हें स्वीकार्य होंगे। यह कहना स्वीकार्य है कि उनके द्वारा उठाई गई आपत्ति केवल इसलिए थी क्योंकि उन्होंने मनुस्मृति पढ़ी नहीं।हम अपने मित्रों को विनम्र सलाह देते हैं कि उन्हें एक बार मनुस्मृति अवश्य पढ़नी चाहिए। हमने मनुस्मृति के बारे में जो कुछ पढ़ा है, उससे हमें यह विश्वास हो गया है कि यह ग्रंथ शूद्र जाति की निंदा करने वाले, उन्हें अपने अधीन करने वाले, दुष्ट उत्पत्ति का कलंक लगाने वाले और समाज में उनके प्रति अनादर बढ़ाने वाले श्लोकों से भर...

डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के पिताजी ने कैसे उनके बुनियाद की निव रखी

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      संसार का हर पिता चाहता है कि उनका बेटा या बेटी उससे एक कदम आगे बढ़े वह नैतिक तथा संस्कारित हो जिससे उनका सर्वांगीण विकास होकर उसकी तरक्की हो वह समाज का जिम्मेदार नागरिक बनें। परिवार में ख्वाहिशे बहुत बड़ी होती है लेकिन वह कौन-सा मार्ग है जिससे हर परिवार अपनी समाजिक महत्वाकांक्षा को पुर्ण कर सकता है।         रामजी आंबेडकर के पिता सेना में थे। रामजी आंबेडकर यह सेना में सुबेदार थे सेना की नाॅर्मल स्कूल के चौदह वर्षो तक प्राचार्य थे। वह उम्दा शिक्षक थे उन्हें गणित,अंग्रेजी विशेषतः अंग्रेजी लिख पढ़ने पर पकड थी। उनके मित्र प्राचार्य कृष्णाजी केलुसकर गुरुजी थे। बस्ती के कार्यक्रमो में उनका सक्रिय सहभाग रहता शिक्षा तथा अंग्रेजी शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक थे शिक्षा के अलावा और ज्ञान आत्मसात करने का महत्व उन्हें पता था।        मराठी साहित्य क्षेत्र के आचार्य अत्रे ने डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर के पचपनवें जन्म दिवस पर 'नवयुग' (आंबेडकर विषेश अंक) में साक्षात्कार प्रकाशित किया जिसमें डॉ बाबासाहेब अपने पिताजी के बारे में बताते...

*देवानांप्रिय तथा प्रियदर्शी चक्रवर्ती सम्राट अशोक महान!*🇸🇨🇸🇨☸🇸🇨🇸🇨 मौर्य साम्राज्य के संस्थापक सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य तथा मौर्य वंश के तीसरे सम्राट, सम्राट अशोक महान(ईसापूर्व 268-232)मौर्य वंश" यह शाक्य वंश की शाखा है।मौर्य वंश के तीसरा सम्राट असोक ,पिता बिन्दुसार मौर्य माँ सुभद्रांगी, सम्राट अशोक का राज्याभिषेक 296 ईसा पूर्व मे तथा सिंहासनारूढ़ हुए 273 ईसा पूर्व मे हुवा।* *पुराणों में अशोक को अशोक वर्द्धन कहा गया है देवानांप्रिय प्रियदर्शी अशोक कहा गया है। विदेशी शासक लंका नरेश तिस्स जिसने अशोक का अनुकरण करते हुए देवानांप्रिय की उपाधि धारण की थी।* *सन 1837 में, जेम्स प्रिंसेप ने अशोक के अभिलेख पढ़ने में सबसे पहले सफलता मिली अपने अभिलेखों में ब्राह्मी, खरोष्ठी, ग्रीक, आरमाइक इन लिपियों का प्रयोग किया है अधिकतर अभिलेख ब्राह्मी लिपी में हैं।अशोक के गांधार एवं लद्यमान के लेख आरमाइकलिपि में हैं।अशोक के शिलालेखों के लिए पत्थर नार (मिर्ज़ापुर) से बलुआ पत्थर लाया जाता था अशोक के अभिलेखों को तीन भाग (शिलालेख, स्तंभलेख,गुहालेख)मे बाँटा गया है।**शिलालेख:-* 1)भारत में शिलालेख का प्रचलन सर्वप्रथम अशोक ने किया मास्की व गुर्जरा अभिलेख जिसमें अशोक नाम का उल्लेख मिलता है।2) 13 वाँ अभिलेख जिससे "कलिंग युद्ध" तथा कलिंग युद्ध से हृदय परिवर्तन की बात इस शिलालेख में विस्तृत जानकारी मिलती हैं।3)रूम्मिनदेई अभिलेख जिससे मौर्य कालीन कर नीति की स्पष्ट जानकारी मिलती है।4)हाथी गुम्फा अभिलेख जिससे यह ज्ञात होता है कि कलिंग पर 'नंदराज' का शासन था।5)अशोक के अभिलेखों से यह ज्ञात होता है की वे पाच प्रांतों पर राज्य किया करते थे।6)प्रथम शिलालेख जिसमें पशुबलि की निंदा की गई है।7)प्रथम पृथक शिलालेख मे "सभी मनुष्य मेरे बच्चे हैं" यह घोषणा की है।8)कौशाम्बी अभिलेख मे रानी के बारेमें जानकारी है। 9)भाब्रू शिलालेख, वैरट (राजस्थान) जिसमें "अशोक के धम्म" का उल्लेख है।10)निग्लीवा,नेपाल जहाँ अशोक द्वारा सम्वर्द्धित 'कनकमुनि बुद्ध' का स्तूप है।11) 7वें एवं 8वें शिलालेख में अशोक की तीर्थ यात्राओं का वर्णन मिलता है।12)लघुस्तंभ लेख से अशोक राजकीय घोषणा किया करते थे।13(हाथी गुम्फा अभिलेख जिससे यह ज्ञात होता है कि कलिंग पर 'नंदराज' का शासन था।14)अशोक का वह अभिलेख जो शार -ए-कुना (कन्दहार) से पाया गया है वह द्विभाषीय (युनानी+आरमाइक) भाषा मे हैं।15)टोपरा अभिलेख को फिरोज तुगलक द्वारा टोपरा से दिल्ली मे लाया गया था। *अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 10वें वर्ष मे बुद्ध के ज्ञान प्राप्ति स्थल बोधगया की यात्रा की थी राज्याभिषेक के 14वें वर्ष अशोक ने निग्लिवा(निगाली सागर)नेपाल की यात्रा कि थी तथा राज्याभिषेक के 20वें वर्ष अशोक ने बुद्ध के जन्म स्थली लुम्बिनी की यात्रा कि थी।**कलिंग युद्ध:-* *कलिंग युद्ध के पश्चात निग्रोध बौद्ध भिक्षु जिनके प्रभाव में आकर अशोक ने बौद्ध धर्म ग्रहण किया, उपगुप्त नामक बौद्ध भिक्षु ने उनको बौद्ध धर्म में दीक्षित किया तथा मोगलिपुत्त तिस्स के प्रभाव से पूर्णरूपेण बौद्ध बन गये।* *अशोक ने कलिंग पर आक्रमण ईसा पूर्व 261 मे किया था।अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 8 वें वर्ष कलिंग पर आक्रमण किया कलिंग की राजधानी तोशली थी जो हाथी के लिये प्रसिद्ध थी कलिंग युद्ध के बाद अशोक ने भेरीघोष को त्यागकर धम्मघोष अपना लिया कलिंग युद्ध" की विस्तृत जानकारी13 वे अभिलेख मे मिलती है। हाथी गुम्फा अभिलेख से यह ज्ञात होता है कि कलिंग पर 'नंदराज' का शासन था। कलिंग युद्ध का वर्णन व अशोक के हृदय परिवर्तन की बात 13वे शिलालेख में मिली है अभिलेखों में अशोक को "देवानांप्रिय" तथा "प्रियदर्शी"कहा गया है कलिंग युद्ध के बाद उन्होंने बौद्ध धम्म को अपनाया।**महत्वपूर्ण कार्य:-* *शिलालेख, स्तंभलेख तथा गुहालेख कुलमिलाकर 84 हजार स्तूपों का निर्माण किया सारनाथ स्तंभ का निर्माण तथा सांची के स्तूप का निर्माण कराया था।नेपाल मे देवपाटन नगर की स्थापना की थी।आजीवकों के लिए अशोक ने बिहार स्थित बराबर पहाड़ी की गुफाओं का निर्माण कराया था। पशुओं पक्षियों के लिये दाना पानी तथा चिकित्सालय शुरू किए।**बौद्ध धर्म का प्रचार:-**"तृतीय बौद्ध संगीति" अशोक के शासनकाल में पाटलिपुत्र स्थित अशोकाराम विहार मे महाथेर मोगलिपुत्त तिस्स की अध्यक्षता मे हुई थी।**"बौद्ध धम्म" के प्रचार के लिए बौद्ध भिक्षु विविध देशों में भेजे गये थे।*• मज्झन्तिक--कश्मीर तथा गंधार • महारक्षित--यवन देश • मज्झिम--हिमालय देश • धर्मरक्षित--अपरांतक • महाधर्मरक्षित--महाराष्ट्र • महादेव--महिषमंडल (मैसूर या मान्धाता)• रक्षित--बनवासी (उत्तरी कन्नड़)• सोन तथा उत्तर--सुवर्णभूमि • महेन्द्र व संघमित्रा--श्रीलंका धम्म महामात्र जिसे अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 13वें वर्ष बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए भेजा था। *इतिहास संशोधक डी. आर. भण्डारकर कहते है, अशोक का बौद्ध धम्म,उपासक के साथ साथ राजधर्म बौद्ध धर्म था, धर्म का मूल श्रोत बौद्ध धम्म को बताया है। भारतीय इतिहास का पहले शासक जिन्होने हिंसा को त्याग का सिद्धांत प्रस्तुत किया।**महान चक्रवर्ती सम्राट अशोक के जयंती की भारतवासीयो को हार्दिक शुभकामनाएं।💐💐💐🙏🙏🙏

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मिशनरी किसे कहते है

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❗ #मिशनरी_किसे_कहते_है?❗            डाँ.बाबासाहब आंबेडकर ने कहा था मिशन का काम करना फांसी के फंदे पर चढ़ने से भी ज्यादा कठिन काम है; क्योंकि फांसी के फंदे पर चढ़ने से व्यक्ति एक बार ही मर जाता है। किंतु मिशन का काम करने वाला रोज  मरता है। उसकी रातो की निंद व दिन का चैन छिन जाता है। उसे कही अपमान तो कही सम्मान,कही गाली तो कही मिठाई, कही भोजन तो कही उपवास, इन सबको जो सह कर आगे बढ़ता है वही मिशनरी कहलाता है !          इंसान जीता है,पैसे कमाता है, खाना खाता है और अंत में मर जाता है! जीता इसलिए है ताकि कमा सके,कमाता इसलिए है ताकि खा सके और खाता इसलिए है ताकि जिंदा रह सके लेकिन फिर भी मर जाता है। अगर सिर्फ मरने के डर से खाते हो तो,अभी मर जाओ, मामला खत्म, मेहनत बच जाएगी मरना तो सबको एक दिन है ही! नही तो,समाज के लिए जीयो, जिंदगी का एक उद्देश्य बनाओ गुलामी की जंजीर में जकड़े समाज को आजाद कराओ.          मेरी नजर में  इंसान वही है,  जो समाज की भी चिंता करे और समाज के लिए कार्य भी करे,अगर जिंद...

लायक कार्यकर्ता कौन है❓

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🔥🔥🔥🔥       समाजीक और धम्म कार्य करने वाले अनुयायी कार्यकर्ता जो शहरों में रहकर भी गांव देहातों मे रहनेवाले लोगों के लिए कार्य करते है वह लोग धन्य है पुजनीय है। पर जो अधिकतर लोग बरसाती मेंढक समान केवल साल मे एक या दो बार अपने स्वार्थ के लिए मनोरंजनात्मक कार्यक्रम के माध्यम से कार्य करने का दिखावा करते हैं और उसे समाजीक और धम्म कार्य समझते है ऐसे कार्य को ही योग्य कार्य को परीभाषीत करते है वह सही मायने में कार्य नहीं हो सकता क्यों की डाँ.बाबासाहब आंबेडकर ने 18 मार्च 1956 के आग्रा के भाषण मे इस बात को योग परिभाषित किया है।        आयेदिन देखने में आता है के समाज का कार्यकर्ता वर्ग जो साल मे एक या दो बार कार्यक्रम जो समाजीक घटकों द्वारा पैसा जमा कर या किसी राजनैतिक व्यक्ति द्वारा रुपिया पैसा लेकर अपना स्वभिमान बेचकर कार्यक्रम के नाम पर खुद को फोकस करते है पर वह लोग कभी भी गांव देहातों मे जाकर कार्य करने कि बजाय केवल शहरों में साल मे एक या दो बार कार्यरत रहते हैं पर उन्हें ग्राम देहातों मे कार्य करने मे परहेज होती है क्योंकि शहरों मे  सु...