बहिष्कृत भारत का लेख डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर ने मनुस्मृती क्यो जलाईं


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      महाड सत्याग्रह परिषद पर जो लोग बड़ा आरोप लगाते है कि मनुस्मृति जलाईं है उपरोक्त आपत्तियां करने वालों ने या तो मनुस्मृति नहीं पढ़ी होगी या फिर उन्होंने मनुस्मृति में बताए गए नियमों को स्वीकार कर लिया होगा। इस देश में यह परंपरा रही है कि जो लोग राजनीति में उग्र होते हैं, वह सामाजिक मुद्दों पर नरम रुख अपनाते आये है इस परंपरा में अपवाद मात्र स्वराज्य के संपादक है हमें यकीन है कि वह राजनीति के साथ-साथ सामाजकारन स्तरपर उग्र रहेंगे। हम यह नहीं कहते कि ऐसी परिस्थिति में मनुस्मृति में निहित सिद्धांत उन्हें स्वीकार्य होंगे। यह कहना स्वीकार्य है कि उनके द्वारा उठाई गई आपत्ति केवल इसलिए थी क्योंकि उन्होंने मनुस्मृति पढ़ी नहीं।हम अपने मित्रों को विनम्र सलाह देते हैं कि उन्हें एक बार मनुस्मृति अवश्य पढ़नी चाहिए। हमने मनुस्मृति के बारे में जो कुछ पढ़ा है, उससे हमें यह विश्वास हो गया है कि यह ग्रंथ शूद्र जाति की निंदा करने वाले, उन्हें अपने अधीन करने वाले, दुष्ट उत्पत्ति का कलंक लगाने वाले और समाज में उनके प्रति अनादर बढ़ाने वाले श्लोकों से भरे हुए हैं। यह धर्म की धारणा नहीं है, बल्कि धर्म की विकृति है और समानता का नामोनिशान नहीं है, बल्कि असमानता की धूल है। यह पुस्तक उन सुधारवादियों द्वारा कभी स्वीकार नहीं की जा सकती। जो लोग स्वयं निर्णय के तत्व को प्रस्तुत करने वाले सुधारवादीयों को यह ग्रंथ कभी भी मान्य होना असम्भव है और यह अस्पृश्य वर्ग को भी स्वीकार्य नहीं है यह दर्शाने के लिए  महाड में मनुस्मृति जलाईं गई।*

*एक आक्षेप है कि*
      मनुस्मृति यह प्राचीन काल में अवलंब करने वाली नियमों का संग्रह है। उसके नियम आज किसी पर लागू नहीं होते तो उन पुराने जंत्री को जलाने का क्या मतलब है?  
हमें बहुत ख़ुशी होती अगर हम अपने दोस्त की तरह कह पाते कि मनुस्मृति एक पुरानी जंत्री है लेकिन दुर्भाग्य से हम ऐसा नहीं कह सकते  और हमें यकीन है कि भविष्य के स्वराज्य का चंद्रोदय कब होगा यह देखने के लिए हमारे मित्र की आँखें आसमान की ओर होने से वह यह स्पष्ट रूप से नहीं देख पाते कि उनके पैरों के नीचे क्या जल रहा है। हम उन गृहस्थों को पुरजोर सुझाव देते हैं जो यह तर्क देते हैं कि मनुस्मृति एक पुरानी जंत्री है, अगर यह बनी रहे तो कोई समस्या नहीं है, लेकिन वे मध्य भारत में बलहायी नाम की अछूत जातियों के लोगों पर शक्तिशाली लोगों द्वारा किए गए अत्याचार की हाल ही में प्रकाशित कहानी पर ध्यान देना चाहिए। उपरोक्त उदाहरण हमारी राय में यह दर्शाते हैं कि मनुस्मृति कोई पुरानी जंत्री नहीं है बल्कि अमल में लाई जाने वाली प्रक्रिया है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि शूद्रों ने अमंगल रहना चाहिए, भिक्षा मांगनी चाहिए, धन संग्रह नहीं करना चाहिए और मृत पशुओं को उठाना चाहिए।
स्पृष्य लोग अस्पृश्य लोगों को सुधारना करने नहीं देते अछूतों पर इस प्रकार अत्याचार क्यों होता है? यदि अछूत स्वच्छ रहें, रोटी माँगने की दीनता त्याग दें और मृत मांस आहार का उच्चाटन किया तो उच्च वर्ग को क्या नुकसान होने वाला है?कुछ नहीं केवल अस्पृश्य लोगों ने अपनी औकात नहीं भुलानी चाहिए इसलिए सारा ज़ुल्म चल रहा है।
इससे किसी भी हिन्दू को यह पता चल जायेगा कि स्पृश्य लोग अछूतों को सुधरने नहीं देते वह मनुस्मृति के नियमों का पालन करता है और कुछ नहीं ऐसे में हमारे मित्रों को सोचना चाहिए कि यह कहना कितना दुस्साहस है कि मनुस्मृति पुरानी जंत्री है।
जिन लोगों को हमारा युक्ती वाद पसंद नहीं है। हम उन्हें पूछते हैं कि यदि मनुस्मृति एक पुरानी जंत्री है,तो उसे जलाने से क्या उन्हें क्या आपत्ति है?
बनवारी की दुकान में पुड़िया बांधने के लिए पड़ीं रद्दी अगर किसी ने जलाई तो किसी को कोई आपत्ती नही होगी फिर मनुस्मृति यह रद्दी पोथी है, ऐसा कहने वाले लोगों ने उसको जलाने पर आकाश पाताल एक करना यह आश्चर्यजनक नहीं है क्या?
      इससे यह सिद्ध हो गया कि जिन लोगों को इससे जलन हुई है उस अर्थ से वह पोथी रद्दी नहीं उसे लोग मानते हैं यह बात सिद्ध होती है। जो पोथी लोगों को स्वीकार्य है और जो हमें अमान्य है ऐसे पोथी को हमनें क्यों नहीं जलाना चाहिए?
इस पर हमारे मित्र कहेंगे हैं कि मनुस्मृति जलाने से क्या हासिल होगा?
      समाज में रुढीत जाति विषय और छुआछूत विषय कल्पना जिससे प्रचलित धारणाएं नष्ट नहीं होंगी. इसके विपरीत, कुछ स्पृष्य लोग की सहानुभूति खोने कि संभावना है इसपर हमारा उत्तर यह है कि,
   असहयोग आन्दोलन में म.गांधी ने स्वदेशी कपड़ा जलाकर क्या हासिल किया? 
राजनीतिक सुधारों की जाँच के लिए आ रहे साइमन कमीशन का बहिष्कार करने से क्या हासिल होने वाला है? 
मिस मेयो द्वारा लिखी किताब मदर इंडिया किताब को न्यूयॉर्क शहर में जलाया गया उन्हें क्या हासिल करना था?
उपरोक्त घटनाओं में बहिष्कार करने का जो उद्देश्य साध्य होना थ वहीं बात हमें मनुस्मृति को जलाकर साध्य करनी है। मनुस्मृति जलाना यह एक निषेध दर्शाने के अनेकों प्रकारो में से एक प्रकार है और यह प्रकार जाहील है ऐसे कहना फजूल होगा। निषेध करने का मुख्य उद्देश्य याने जिसके खिलाफ निषेध प्रदर्शित किया जाता है उस व्यक्ति को शर्मिंदा कर उसके विचारों को जागरूक कर उनके वर्तन में योग्य बदलाव करने के लिए प्रेरित करना है।
मनुस्मृति जलाकर हमने जो विरोध जताया, उससे ब्राम्हण्यका याने हिंदू समाज में ऊंच-नीच की भावना का खंडन व्यक्त करना था हमारी आशा है कि ब्राह्मण-पीड़ित लोग हमारे इनकार को ध्यान में रखकर अपना व्यवहार बदल देंगे और उसी आशा से ये सारा काम किया गया है। अब हमारे जो मित्र इस बात पर संदेह करते हैं कि मनुस्मृति जलाने से ब्राह्मणवाद नष्ट नहीं होगा, यदि यह संदेह सत्य निकला तो ब्राह्मणवाद के विनाश के लिए ब्राह्मणवाद से पीड़ित लोगों को जलाना अथवा हिंदूधर्म को त्यागना इन दो में से एक काम हमें करना होगा।
*संदर्भ:-*
*बहिष्कृत भारत*

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