डॉ बाबासाहेब आंबेडकर के पिताजी ने कैसे उनके बुनियाद की निव रखी


      संसार का हर पिता चाहता है कि उनका बेटा या बेटी उससे एक कदम आगे बढ़े वह नैतिक तथा संस्कारित हो जिससे उनका सर्वांगीण विकास होकर उसकी तरक्की हो वह समाज का जिम्मेदार नागरिक बनें। परिवार में ख्वाहिशे बहुत बड़ी होती है लेकिन वह कौन-सा मार्ग है जिससे हर परिवार अपनी समाजिक महत्वाकांक्षा को पुर्ण कर सकता है।
        रामजी आंबेडकर के पिता सेना में थे। रामजी आंबेडकर यह सेना में सुबेदार थे सेना की नाॅर्मल स्कूल के चौदह वर्षो तक प्राचार्य थे। वह उम्दा शिक्षक थे उन्हें गणित,अंग्रेजी विशेषतः अंग्रेजी लिख पढ़ने पर पकड थी। उनके मित्र प्राचार्य कृष्णाजी केलुसकर गुरुजी थे। बस्ती के कार्यक्रमो में उनका सक्रिय सहभाग रहता शिक्षा तथा अंग्रेजी शिक्षा के महत्व के बारे में जागरूक थे शिक्षा के अलावा और ज्ञान आत्मसात करने का महत्व उन्हें पता था।
       मराठी साहित्य क्षेत्र के आचार्य अत्रे ने डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर के पचपनवें जन्म दिवस पर 'नवयुग' (आंबेडकर विषेश अंक) में साक्षात्कार प्रकाशित किया जिसमें डॉ बाबासाहेब अपने पिताजी के बारे में बताते हैं, कि,
    "हमारे पिताजी का घर पर अनुशासन सख्त और सैनिक अनुशासन था इसलिए मैं उनकी सख्ती से बहुत थक गया था।"अब मुझे इस बात का अफसोस है कि यदि मैंने अपने पिता की इच्छानुसार पढ़ाई की होती तो मेरे लिए बम्बई विश्वविद्यालय की समग्र परीक्षा में कम से कम द्वितीय श्रेणी प्राप्त करना असंभव नहीं होता। परन्तु उस समय मैं उनकी अनुशासन का अर्थ न समझ सका।मैं अच्छे अंकों से पास हो जाऊँ इसलिए वे मेरा कितना ख़्याल रखते थे उनकी कोई कल्पना नहीं कर सकता। पिताजी को थोड़ी सी पेंशन मिलती थी लेकिन मुंबई में रहने और परिवार में कई लोगों की देखभाल करने के कारण, मेरे लिए आवश्यक किताबें लाना और मुझे अच्छे कपड़े पहनाना मेरे पिता के वश से बाहर था। हालाँकि वह अपनी जरूरत को त्यागकर मेरी जरूरतो को मुहैया कराते ऐसे प्यारे पिता बहुत कम लोगों को मिलते हैं।
बाबासाहब आगे कहते हैं कि उन्हें अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ मराठी भाषा पर भी गर्व था। उन्हें अंग्रेजी पढ़ाने का बड़ा शौक था। वे हमेशा मुझसे कहते हैं, हावर्ड की किताबें याद करें!  
उन्होंने मुझसे तर्खाडकर के अनुवाद की तीन किताबें याद कराईं थीं।मराठी शब्दों के सही अंग्रेजी, समकक्ष सीखना और उन्हें उचित स्थानों पर उपयोग करना सिखाया।इसी तरह, उन्होंने मुझे अंग्रेजी वाक्यांशों और उचित भाषा शैली का उपयोग करना भी सिखाया। यह मेरे पिताजी ही थे जिन्होंने मुझे यह पढ़ाया। जिस तरह मेरे पिता ने मुझे सिखाया किसी अन्य गुरु ने मुझे उस तरह नहीं सिखाया।
    ऐसा कभी नहीं हुआ कि मैंने कोई किताब माँगी हो और मेरे पिता शाम तक कहीं से न लाये हों। चाहे उनकी जेब में पैसे हों या न हों, उनमें से अधिकांश उनकी जेबों में पैसे नहीं होते थे, उस वक्त मेरे पिताजी मेरी दोनों बड़ी बहनें मुंबई में थी वह शादीशुदा थी मेरे पिताजी छोटी बहन से पैसे मांगते,बंदोबस्त न होने पर फिर बड़ी बहन के घर जाते।अगर उसके पास खुल्ले पैसे नहीं होने पर वे उससे आभूषण को लेकर 
वह गिरवी रखकर पेंशन आने पर उसे छुडाकर वापस बहन को देते।मेरे पिताजी चाहते थे कि मैं बी.ए. की डिग्री हासिल करु इसके लिए वे मुझे सुबह दो बजे उठाते, इसलिए मेरे पिताजी दो बजे तक जागते रहते। बि.ए पास करने के बाद पिताजी चाहते थे कि,बड़ौदा जाने के बजाय मैं यही रहूं मुझे लगता है कि मेरे पिता को बड़ौदा जाने के बाद मेरे साथ होने वाले अपमान का अंदाजा था बड़ौदा जाने के बाद ग्यारह दिन के भीतर ही उनका मुंबई में निधन हो गया। 
रामजी पिता द्वारा अपने बच्चे कि ऊचीत परवरिश करने के कारण आज करोड़ों लोगों के जिवन को प्रकाशमान किया है।


 

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