नोटा क्या है
"NOTA" Non Of The Above सकारात्मक या नकारात्मक?*
प्रजातंत्र मे वयस्क व्यक्ति जो १८ वर्षे पुर्ण होने पर हर मतदाता का नाम मतदाता सुची मे होना जरुरी है मतदान का निर्वाह करना हर नागरिक का कर्तव्य और पवित्र हक्क है लोकतंत्र को मजबूत तथा सशक्त बनाने हेतू प्रत्येक व्यक्ति ने नकारात्मकता को छोड सकारात्मक मतदान के हक का निर्वहन करना बहुत जरूरी है. संविधान ने सकारात्मक मतदान का अधिकार सभी को ऐक व्यक्ति ऐक मुल्य के अधार पर दीया है वोट करना सामाजिक जिम्मेदारी का निर्वहन करना है मतदाता द्वारा मतदान का कर्तव्य यह व्यक्ति केन्द्रीय न होकर लोककल्याण का दृष्टिकोन यह केन्द्रबिंदु मानकर समाज द्वारा सभी लोगो ने यह अधीकार अपना नैतिक कर्तव्य के दृष्टिकोन से निर्वाह करना चाहिए यह दृष्टिकोण की भावना मतदान करने के अधिकार में निहित और अधिक पवीत्र होनी चाहिए. वोट देने के अधिकार का मतलब हमेशा किसी एक उम्मीदवार को चुनना ही नहीं होता बल्कि अन्य बचे उम्मीदवारों को ठुकराना भी होता है और एक पर्याय वोट द्वारा चुनना मतलब सभी मौजूद उमेद्वारो को नकारना यह नोटा “इनमे से कोई नहीं”(नोटा) Non Of The Above है.
नोटा ऐसे लोगों को मतदान करने के लिए प्रोत्साहित करता है जो इस कारण वोट देने नहीं जाते थे कि सभी उम्मीदवार उन्हें नापसंद होते थे नोटा नकार का अधिकार तो तब होगा जब उसका मत गिना जाएगा, अगर गिना ही नही जाएगा तो रिजेक्ट केसे होगा? हर जगह यही बात फैलाई जा रही है कि ये नकार का अधिकार है क्या यह ऐसा है?
“इनमे से कोई नहीं” (नोटा) Non Of The Above को उपलब्ध कराने से राजनीतिक चरित्र में कोई बदलाव नही आयेगा जब तक चुनावी प्रक्रिया मे नैतिक सदाचारी लोग की हिस्सेदारी नहीं होगी तब तक ईस बात पर निरंतर कार्य करना पडेगा, जिसे यह समस्या महसूस हो रही है की क्यो न वे किसी दुसरे को कहने से बेहतर खुद जिम्मेदारी ले, अथवा अपना प्रतीनिधी निर्माण कर जिम्मेदारी का निर्वहन करे. मौजूदा खामीया मे “नोटा” कुछ भी नहीं कर सकता है. इसमें तो इतनी भी ताक़त नहीं कि बहुमत के बलबूते वह गलत उम्मीदवार को हरा सके या किसी को नैतिकता का पाठ पढ़ा सके, तो फिर इसका क्या फायदा, क्या केवल दिखावा मात्र है नोटा? समाज की रचना जातीवर्ग आधारीत होने से यह हर कोई ऐक दुसरे को नोटा के लायक समझता है मगर वास्तव कुछ और है! सवाल यह है कि उम्मीदवारों को रिजेक्ट करने वालों की संख्या यदि सबसे ज्यादा वोट वाले के वोट से ज्यादा होगी तो क्या चुनाव रद्द होगा? अब एक और सवाल उठता है कि क्या इससे अराजकता नहीं फैलेगी? नोटा में जब कुछ बदलने की क्षमता ही नहीं होगी तो यह लोगों को वोट करने के लिए कैसे प्रेरित करेगा? क्या सरकार द्वारा नकार के अधिकार को उपयोग करने वालों के लिए यह जानबूझकर कोई विकल्प उपलब्ध कराया जा रहा है.यहा हर कोई अपने आपको सही उम्मीदवार समझता है लोग किसे सही उम्मीदवार मानते है यही तो मतदान का परिणाम होता है.हमारे यहा ६४४३ से भी अधीक जातीगत राजनीतिक समीकरण होता है यहा हर मतदान जाती धर्मों के आधारपर होता है और परिणाम भी सटीक ही होता है फिर किसे सही उम्मीदवार माना जाय? और सही उम्मीदवार का पैमाना क्या होगा? सही उम्मीदवार कौन है? क्या पढ़ा लिखा आदमी सही उम्मीदवार है या अनपढ़? आमिर सही हो सकता है या गरीब? चुनने लायक कौन है? इसका अंदाजा लगाना या अपनी प्रतिक्रिया देना लोकतंत्र की मर्यादाओं का उल्लंघन हो सकता है.संविधान का निर्माण ही यहा की सामाजिक स्थितियों को मद्देनजर रखकर किया गया था दूरदृष्टीता के हिसाबसे जो आजभी बेहद कारगर है बेहतर है के अच्छे और सामाजिक, लोकतांत्रिक नैतिक चीरीत्र का निर्माण होना अधिक महत्वपूर्ण है.
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