The Buddha and his Dhamma Post 133 to143
पोस्ट 133
धम्म धर्म से भिन्न है?
1) तथागत बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं, वह धर्म से मूलतः भिन्न है।
2) तथागत बुद्ध जिसे धम्म कहते हैं, वह यूरोपीय धर्मवेत्ता जिसे Religion कहते हैं, उससे कुछ अंशों में समान है।
3) परंतु उन दोनों में विशेष समानता नहीं है; उन दोनों के बीच भेद भी बड़े हैं।
4) इसी कारण यूरोपीय धर्मवेत्ता बुद्ध के धर्म को Religion मानने को तैयार नहीं हैं।
5) इससे खिन्न होने का कोई कारण नहीं। धम्म को Religion मानने में हानि उन्हीं की है; इससे उनके Religion में निहित दोष स्पष्ट होते हैं।
6) इस विवाद में पड़ने से बेहतर होगा कि धम्म की संकल्पना प्रस्तुत करके यह दिखाया जाए कि वह Religion से कैसे अलग है।
7) कहा जाता है कि Religion व्यक्तिगत होता है और हर किसी को उसे अपने तक सीमित रखना चाहिए; सार्वजनिक जीवन में उसे अवसर नहीं देना चाहिए।
8) इसके विपरीत धम्म सामाजिक है; मूलतः और तत्वतः वह सामाजिक है।
9) धम्म का अर्थ सदाचार है, अर्थात जीवन के सभी क्षेत्रों में मनुष्य-मनुष्य के बीच सभी व्यवहार उचित होना।
10) इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य यदि अकेला हो, तो उसे धम्म की आवश्यकता नहीं है।
11) परंतु जब दो मनुष्य किसी भी संबंध से एकत्र आते हैं, तब उन्हें पसंद हो या न हो, धम्म चाहिए ही; उससे छुटकारा नहीं पाया जा सकता।
12) दूसरे शब्दों में कहें तो समाज धम्म के बिना रह ही नहीं सकता।
13) समाज को निम्न में से कोई एक विकल्प चुनना ही पड़ता है।
14) समाज चाहे तो शासन के साधन के रूप में धम्म का चयन नहीं करेगा। क्योंकि धम्म तो शासन के साधन से अलग नहीं है।
15) ऐसा समाज (जो धम्म को शासन के लिए स्वीकार नहीं करेगा) अराजकता का मार्ग स्वीकार करेगा।
16) दूसरा विकल्प यह है कि समाज पुलिस अर्थात तानाशाही को ही शासन के लिए चुन सकेगा।
17) तीसरा विकल्प यह है कि समाज धम्म के साथ-साथ धम्म का उल्लंघन करने वाले लोगों पर शासन करने वाले मजिस्ट्रेट को स्वीकार कर सकेगा।
18) अराजकता और तानाशाही—इन दो विकल्पों में स्वतंत्रता का नाश होता है।
19) केवल तीसरे विकल्प में स्वतंत्रता टिक सकती है।
20) जिन्हें स्वतंत्रता चाहिए, उन्हें धम्म को स्वीकार करना चाहिए।
21) धम्म क्या है? और धम्म की आवश्यकता क्या है?
22) प्रज्ञा क्या है और उसकी आवश्यकता क्यों होनी चाहिए? प्रज्ञा का अर्थ निर्मल बुद्धि है। मूर्ख धारणाओं को स्थान न रहे, इसलिए तथागत बुद्ध ने प्रज्ञा को अपने धम्म के दो आधारशिलाओं में से एक आधारशिला जितना महत्व दिया है।
24) यह हुई बुद्ध के धम्म की परिभाषा।
25) Religion की परिभाषा से धम्म की परिभाषा कितनी भिन्न है।
26) बुद्ध के धम्म की परिभाषा बहुत प्राचीन होते हुए भी ऐसी है कि वह आधुनिक युग से मेल खाती प्रतीत होती है।
27) वह जितनी पुरातन है, उतनी ही नवीन है।
28) वह किसी से उधार ली हुई नहीं है, और वह कितनी सत्य है।
29) प्रज्ञा और करुणा का अनुपम मिश्रण ही तथागत का धम्म है।
30) Religion, धर्म और धम्म—इनमें अंतर है।
पोस्ट 134
धर्म का प्रयोजन और धम्म का प्रयोजन
1) धर्म का प्रयोजन क्या? धम्म का प्रयोजन क्या? क्या वे प्रयोजन एक ही हैं या भिन्न हैं?
2) इन दोनों प्रश्नों के उत्तर बुद्ध के सुनक्खत और पोट्ठपाद नामक ब्राह्मण के साथ हुए संवाद में मिलते हैं।
3) एक बार तथागत मल्लों के अनुपिय नगर में रहते थे।
4) उस प्रसंग में एक दिन बहुत सुबह चीवर धारण करके हाथ में भिक्षापात्र और दूसरा चीवर लेकर उन्होंने भिक्षाटन के लिए नगर में प्रवेश किया।
5) रास्ते में उन्हें ऐसा लगा कि भिक्षा के लिए इतनी सुबह जाना उचित नहीं है, इसलिए परिव्राजक भग्गवा के आश्रम में उससे मिलने गए।
6) तथागत को देखकर भग्गवा उठा और अभिवादन करके बोला—"तथागत इस आसन पर बैठें।"
7) तथागत के बैठने के बाद भग्गवा एक आसन पर बैठा और तथागत से बोला—
8) "कुछ दिन पहले सुनक्खत लिच्छवी मेरे पास आकर बोला—'मैंने अभी-अभी तथागत का शिष्यत्व छोड़ दिया है और उनके शिष्य के रूप में उनके पास नहीं रहता।' क्या सुनक्खत का यह कथन सत्य है?"
9) तथागत ने उत्तर दिया—"हाँ, सुनक्खत लिच्छवी जो कहता है, वह सत्य है।"
10) "सुनक्खत ने मुझसे यह कहा, इसके बाद मैंने उससे पूछा—'सुनक्खत, तुम मेरे साथ रहो और मेरे शिष्य बनो'—ऐसा मैंने कभी तुमसे कहा था क्या?"
11) सुनक्खत ने मुझे उत्तर दिया—"नहीं, आपने मुझसे ऐसा कभी नहीं कहा।"
12) मैंने उससे पूछा—"और तुमने तो कभी ऐसा कहा था क्या कि 'शिष्य के रूप में मैं तथागत की छत्रछाया में रहूँगा'?"
13) "नहीं, तथागत, नहीं।"
14) फिर मैंने उससे पूछा—"यदि मैंने तुमसे ऐसा नहीं कहा और तुमने भी ऐसा नहीं कहा, तो फिर हे मूर्ख! मुझे छोड़कर जाने की बात करने का अर्थ क्या? इसमें दोष तुम्हारा है या मेरा?"
15) "परंतु तथागत, आप सामान्य मनुष्य की शक्ति के बाहर के चमत्कार नहीं दिखाते"—ऐसा सुनक्खत बोला।
16) "अरे सुनक्खत! मैंने तुमसे कभी ऐसा कहा था क्या कि 'तुम मुझे गुरु मानकर स्वीकार करो और मैं तुम्हारे लिए असामान्य चमत्कार कर दिखाऊँगा'?"
17) "नहीं तथागत, आपने ऐसा कभी आश्वासन नहीं दिया था।"
18) "तुमने कभी अपना यह विचार मेरे सामने व्यक्त किया था क्या कि 'मैं तथागत का शिष्यत्व स्वीकार करूँगा, क्योंकि ऐसा करने पर वे मेरे लिए असामान्य चमत्कार कर दिखाएँगे'?"
19) "नहीं, तथागत, नहीं।"
20) "यदि मैंने ऐसा नहीं कहा और तुमने भी ऐसा नहीं कहा, तो हे मूर्ख मनुष्य! मुझे छोड़कर जाने की तुम्हारी बात का अर्थ क्या? तुम्हें ऐसा लगता है कि मेरे धम्म का प्रयोजन असामान्य चमत्कार कर दिखाना या न दिखाना है? मेरे धम्म का उद्देश्य यह नहीं है कि जो उस धम्म के अनुसार आचरण करता है, वह अपने दुःख का नाश कर सकता है?"
21) "तथागत, असामान्य चमत्कार कर दिखाएँ या न दिखाएँ, तथागत के धम्म का उद्देश्य यह है कि जो धम्म के अनुसार आचरण करता है, उसके दुःख का परिहार हो सकता है।"
22) "सुनक्खत, यदि धम्म के उद्देश्य की दृष्टि से देखा जाए, तो असामान्य चमत्कार किया गया या नहीं, इसका कोई महत्व नहीं है। तो फिर तुम्हें चमत्कार प्रदर्शन का इतना महत्व क्यों लगता है? देखो मूर्ख! इन सबमें दोष तुम्हारी ओर आता है।"
23) "तथागत, परंतु आप मुझे वस्तु-जाति का आरंभ कैसे हुआ, इसका साक्षात्कार नहीं कराते।"
24) "सुनक्खत, मैंने तुमसे कभी ऐसा कहा था क्या कि 'तुम मेरे शिष्य हो जाओ और मैं तुम्हें वस्तु-जाति के आरंभ का साक्षात्कार कराऊँगा'?"
25) "नहीं, तथागत, नहीं।"
26) "या तुमने तो मुझसे कभी ऐसा कहा था क्या कि 'आप मुझे वस्तु-जाति के आरंभ का साक्षात्कार कराएँ, तो मैं आपका शिष्य बनूँगा'?"
27) "नहीं, तथागत, नहीं।"
28) "यदि मैंने तुम्हें ऐसा आश्वासन नहीं दिया और तुमने भी ऐसी माँग नहीं की, तो हे मूर्ख मनुष्य! मुझे छोड़कर जाने की बात करते हो, इसका अर्थ क्या? मनुष्य के पाप को नष्ट करने के लिए वस्तु-जाति के आरंभ का साक्षात्कार कराना या न कराना, यह मेरे धम्म का प्रयोजन है—ऐसा तुम्हें लगता है क्या? मेरे धम्म का उद्देश्य यह नहीं है कि जो उस धम्म के अनुसार आचरण करता है, वह अपने दुःख का परिहार कर सकता है?"
29) "तथागत, वस्तु-जाति के आरंभ का साक्षात्कार कराया या न कराया, वह तथागत के धम्म का उद्देश्य नहीं है। तथागत के धम्म का उद्देश्य यह है कि जो उस धम्म के अनुसार आचरण करेगा, वह अपने दुःख का परिहार कर सकता है।"
30) "सुनक्खत, यदि धर्म के उद्देश्य की दृष्टि से वस्तु-जाति के आरंभ का साक्षात्कार कराया या न कराया, यह महत्वपूर्ण नहीं है, तो फिर तुम्हें उस साक्षात्कार की आवश्यकता क्यों है?"
31) इससे स्पष्ट होता है कि धर्म (Religion) की संकल्पना में वस्तु-जाति के आरंभ के साक्षात्कार को महत्व है, धम्म की संकल्पना में वह नहीं है।
पोस्ट 135
धर्म और धम्म के बीच अन्य भेद तथागत और पोट्ठपद के संवाद में व्यक्त हुए हैं।
1) एक बार तथागत श्रावस्ती में अनाथपिंडिक के जेतवन आश्रम में थे। उसी समय पोट्ठपद नामक परिव्राजक रानी मल्लिका द्वारा तत्वदर्शन पर वाद-विजय के लिए बनाए गए एक प्रासाद में रहता था।
2) उसके साथ उसके तीन सौ अनुयायियों का समूह था। तथागत और पोट्ठपद के बीच एक प्रसंग में निम्नलिखित संवाद हुआ।
3) पोट्ठपद बोला—"जग शाश्वत है क्या? और क्या आप कहते हैं कि यह शाश्वत है और इससे संबंधित शेष सभी मत गलत हैं?"
4) "पोट्ठपद, इस विषय पर मैंने कोई मत व्यक्त नहीं किया है।"
5) इसके बाद पोट्ठपद ने तथागत से निम्नलिखित प्रश्न पूछे—
i) जग शाश्वत नहीं है क्या?
ii) जग सांत है क्या?
iii) जग अनंत है क्या?
iv) आत्मा और शरीर ये दो भिन्न वस्तुएँ हैं क्या?
v) जिसे सत्य मिल गया है, उसे मरणोत्तर अस्तित्व है क्या?
vi) उसे मरणोत्तर अस्तित्व नहीं है क्या?
vii) उसे मरणोत्तर अस्तित्व है और नहीं है—ऐसा है क्या?
viii) उसे मरणोत्तर न अस्तित्व है और न अस्तित्व नहीं है—ऐसा है क्या?
6) इन प्रत्येक प्रश्न का तथागत ने एक ही प्रकार का उत्तर दिया।
7) "पोट्ठपद, इस विषय पर मैंने अपना मत व्यक्त नहीं किया है।"
8) इस विषय पर तथागत ने मत क्यों व्यक्त नहीं किया?
9) क्योंकि इन प्रश्नों के उत्तर से कोई लाभ नहीं है। उसका धम्म से संबंध नहीं है, वह सदाचार के किसी भी घटक के लिए उपकारक नहीं है। उससे अनासक्ति, राग-द्वेष से मुक्ति, शांति, शमन, सत्यज्ञान, अष्टांगिक मार्ग की उच्चतर अवस्थाओं का ज्ञान अथवा निर्वाण साधित नहीं होता। इसीलिए मैंने इस पर अपना मत व्यक्त नहीं किया।
10) फिर तथागत ने निश्चित रूप से क्या कहा है?
11) "पोट्ठपद, मैंने दुःख क्या है, दुःख का कारण क्या है, दुःख का निरोध क्या है, और दुःख का निरोध कैसे साधा जा सकता है—यह स्पष्ट किया है।"
12) तथागत ने यह क्यों स्पष्ट किया है?
13) "पोट्ठपद, क्योंकि उससे लाभ है, सदाचरण, जनशक्ति, राग-द्वेष से मुक्ति, शमन, सत्यज्ञान, अष्टांगिक मार्ग की उच्चतर अवस्थाओं की दृष्टि और निर्वाण साधा जा सकता है। इसीलिए मैंने दुःख, दुःख-कारण और दुःख-निरोध के साधन के संबंध में विधान किया है।"
14) इस संवाद में धर्म के विषय और धम्म के विषय—दोनों का स्वरूप स्पष्ट हो गया है। वे दोनों विषय एक-दूसरे से बिलकुल भिन्न हैं।
15) धर्म का प्रयोजन जगत्-प्रारंभ का स्पष्टीकरण है और धम्म का प्रयोजन जग की पुनर्रचना है।
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नैतिकता और धर्म
1. धर्म में नैतिकता का क्या स्थान है?
2. सत्य यह है कि धर्म में नैतिकता का कोई स्थान नहीं है।
3. धर्म के विषय हैं—ईश्वर, आत्मा, प्रार्थना, पूजा, कर्मकांड, समारोह, रीति-रिवाज और बलिदान।
4. नैतिकता तभी काम आती है जब एक मनुष्य दूसरे मनुष्य के संपर्क में आता है।
5. धर्म में नैतिकता बाहर से आने वाले हवा के झोंके जैसी है, और नैतिकता का उपयोग केवल शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए किया जाता है।
6. धर्म एक त्रिकोण है।
7. अपने पड़ोसी के साथ अच्छा व्यवहार करो; क्योंकि तुम दोनों एक ही ईश्वर की संतान हो।
8. यही धर्म की सोच या तर्क है।
9. प्रत्येक धर्म नैतिकता सिखाता है। किंतु नैतिकता प्रत्येक धर्म का मूल आधार नहीं है।
10. यह एक अस्थायी बक्सा है जो उससे जुड़ा होता है। समय के अनुसार इस बक्से को जोड़ा या हटाया जा सकता है।
11. धर्म के पालन और अभ्यास में नैतिकता की भूमिका आकस्मिक या संयोगिक होती है।
12. इसलिए, धर्म में नैतिकता का कोई प्रभाव नहीं रहा है।
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