The Buddha and his Dhamma Post 101 to 110

पोस्ट 101
सर्व संस्कार अनित्य हैं ऐसा मानना ही धम्म है
1) अनित्यता के सिद्धांत के तीन पहलू हैं।

2) अनेक तत्वों से मिलकर बनी वस्तुएँ अनित्य हैं।

3) व्यक्तिगत रूप में प्राणी अनित्य है।

4) प्रतीत्यसमुत्पन्न वस्तुओं का आत्मतत्व अनित्य है।

5) अनेक तत्वों से मिलकर बनी वस्तुओं की अनित्यता को बौद्ध आचार्य असंग ने अच्छी तरह स्पष्ट किया है।

6) असंग कहते हैं - सभी वस्तुएँ हेतु और प्रत्यय के कारण उत्पन्न होती हैं। उनका अपना कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता। हेतु-प्रत्ययों का उच्छेद हो जाने पर वस्तुओं का अस्तित्व नहीं रहता।

7) सजीव प्राणियों का शरीर पृथ्वी, आप, तेज और वायु - इन चार महाभूतों का परिणाम है। और इन चार भूतों का पृथक्करण हो जाने पर यह प्राणी प्राणी के रूप में नहीं रहता।

8) "अनेक तत्वों से मिलकर बनी वस्तु अनित्य है" - इस वचन का अभिप्राय उपरोक्त प्रकार का है।

9) सजीव प्राणियों की अनित्यता का वर्णन "वह नहीं है, वह नहीं होता" - इन शब्दों में किया जा सकता है।

10) इस अर्थ में देखा जाए तो जो प्राणी भूतकाल में जीवन व्यतीत कर रहा था, वही प्राणी वर्तमानकाल में नहीं रह सकता, और वही प्राणी भविष्यकाल में नहीं रह सकेगा। भविष्यकाल में जो प्राणी होगा, वह पहले नहीं था और वह आज भी नहीं है। वर्तमानकाल में जो प्राणी है, वह पहले नहीं था और आगे भी वह वैसा नहीं रहेगा।

11) अर्थात मनुष्य प्राणी परिवर्तनशील और संवर्धनशील है। अपने जीवन के किन्हीं भी दो क्षणों में वह एक जैसा नहीं रह सकता।

12) अनित्यता के सिद्धांत का तीसरा पहलू सामान्य मनुष्य को समझने में कठिन है।

13) प्रत्येक सजीव प्राणी कभी न कभी मरेगा - यह समझना आसान है।

14) परंतु वह जीवित रहते हुए लगातार बदल रहा है या बन रहा है - यह समझना कठिन है।

15) यह परिवर्तन कैसे संभव है? इसका तथागतों का उत्तर है - "सब कुछ अनित्य होने के कारण ही यह संभव है।"

16) इसी विचारधारा से आगे चलकर शून्यवाद का उदय हुआ।

17) बौद्ध शून्यवाद का अर्थ पूर्ण अस्तित्ववाद नहीं है। इसका अर्थ केवल इतना है कि इस ऐहिक जगत में परिवर्तन प्रतिक्षण चल रहा है।

18) शून्यता के कारण ही सब अस्तित्व संभव है - यह बात बहुत कम लोग समझ पाते हैं। शून्यता के बिना कुछ भी संभव नहीं हो सकता था। सभी वस्तुओं के स्वभाव की अनित्यता पर ही अन्य वस्तुओं का अस्तित्व निर्भर है।

19) यदि वस्तुएँ सतत परिवर्तनशील न होतीं, नित्य और अपरिवर्तनशील होतीं, तो एक प्रकार से दूसरे प्रकार में जीवन का जो उत्क्रमण और सजीव वस्तुओं का जो विकास चल रहा है, उसे अवरोध उत्पन्न हो जाता।

20) यदि मनुष्य प्राणी मृत्यु के अधीन या परिवर्तनशील न होता और एक ही स्थिति में वैसा का वैसा बना रहता, तो क्या परिणाम होता? ऐसा होता तो मानवजाति की प्रगति रुक जाती।

21) शून्य को अभाव मान लिया जाता तो बड़ी अनर्थ स्थिति उत्पन्न हो जाती।

22) परंतु ऐसा नहीं माना गया है। शून्य एक बिंदु के समान पदार्थ है, उसमें आशय है परंतु उसकी लंबाई-चौड़ाई नहीं है।

23) तथागत बुद्ध का उपदेश है कि सभी वस्तुएँ अनित्य हैं।

24) तथागत बुद्ध के इस सिद्धांत से क्या बोध लेना चाहिए - यह अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है।

25) इस अनित्यता के सिद्धांत से यह बोध लेना चाहिए कि किसी भी वस्तु के प्रति आसक्ति न रखो।

26) लोगों को संपत्ति, मित्र आदि के प्रति अनासक्ति का अभ्यास करने के लिए ही तथागत बुद्ध ने कहा कि सभी वस्तुएँ अनित्य हैं।

पोस्ट 102
#कर्म_ही_इस_दुनिया_में_नैतिक_व्यवस्था_का_आधार_है_यह_मानना_ही_धम्म_है
1) इस पार्थिव जगत में एक सुव्यवस्था है। निम्नलिखित घटनाओं से यह सिद्ध होता है:

2) आकाश में ग्रह-नक्षत्रों की गति में एक प्रकार की सुव्यवस्था है।

3) ऋतुचक्र में भी सुव्यवस्था है।

4) एक विशिष्ट व्यवस्था के अनुसार बीज से वृक्ष बनते हैं, वृक्ष से फल उत्पन्न होता है और फल से पुनः बीज निर्माण होता है।

5) बौद्ध परिभाषा में इस व्यवस्था को 'नियम' कहते हैं। एक के बाद एक सुव्यवस्थित निर्मिति दर्शाने वाले नियमों को ऋतुनियम, बीजनियम आदि कहा जाता है।

6) समाज में भी इसी प्रकार का एक नैतिक क्रम है। वह कैसे उत्पन्न होता है? कैसे बनाए रखा जाता है?

7) जो ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, उनके लिए इस प्रश्न का उत्तर देना कठिन नहीं है। उनका उत्तर सीधा है।

8) वे कहते हैं, संसार का नैतिक क्रम ईश्वर की इच्छा का परिणाम है। ईश्वर ने संसार बनाया है, और ईश्वर ही इस संसार का कर्ता-धर्ता है। वही भौतिक और नैतिक नियमों का कर्ता है।

9) उनके अनुसार नैतिक नियम मनुष्यों के भले के लिए हैं, क्योंकि वे ईश्वरीय आज्ञा के रूप में हैं। अपने निर्माता ईश्वर की आज्ञा का पालन करना उनके लिए अनिवार्य है, और ईश्वर की आज्ञा के पालन से ही यह नैतिक क्रम चलता रहता है।

10) जो नैतिक व्यवस्था को ईश्वरीय इच्छा का परिणाम मानते हैं, उनके विचार उपरोक्त प्रकार के होते हैं।

11) यह व्याख्या बिल्कुल संतोषजनक नहीं है। क्योंकि यदि ईश्वर नैतिक नियमों का जनक है, इन नैतिक नियमों का आरंभ और अंत वही है, और मनुष्य को ईश्वर की आज्ञा पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है, तो इस संसार में इतनी नैतिक अव्यवस्था क्यों दिखाई देती है?

12) इन ईश्वरीय नियमों के पीछे ऐसा कौन-सा अधिकार है? ईश्वरीय नियमों का व्यक्ति पर क्या अधिकार है? ये तर्कसंगत प्रश्न हैं, परंतु जो लोग नैतिक व्यवस्था को ईश्वरीय इच्छा का परिणाम मानते हैं, उनके पास इन प्रश्नों का उत्तर नहीं है।

13) इस कठिनाई को दूर करने के लिए इस सिद्धांत में थोड़ा बदलाव किया गया है।

14) ऐसा कहा जाता है कि परमेश्वर की आज्ञा से ही सृष्टि हुई। यह भी सत्य है कि इस सारे विश्व ने परमेश्वर की इच्छा और मार्गदर्शन के अनुसार ही अपने कार्य आरंभ किए। यह भी सच है कि उसने उस सारे विश्व को एक बार ही स्थायी गति शक्ति प्रदान की, और वही उस विश्व की सभी क्रियाशीलता का मूल है।

15) परंतु इसके बाद, ईश्वर ने सृष्टि के आरंभ में जो नियम निर्धारित किए हैं, उन नियमों के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता प्रदान कर दी है।

16) इसलिए यदि नैतिक व्यवस्था ईश्वरीय इच्छा के अनुसार नहीं घटित होती, तो वह दोष सृष्टि (प्रकृति) का है, ईश्वर का नहीं।

17) सिद्धांत में इस प्रकार का बदलाव करने पर भी उपरोक्त कठिनाई हल नहीं होती। इस सिद्धांत में बदलाव के कारण यह प्रश्न उठता है कि ईश्वर ने अपने नियमों का पालन करने की जिम्मेदारी सृष्टि (प्रकृति) पर क्यों सौंप दी?

18) सृष्टि में नैतिक क्रम कैसे बनाए रखा जाता है - इस प्रश्न का तथागत बुद्ध ने जो उत्तर दिया है, वह बिल्कुल भिन्न है।

19) तथागत का उत्तर सीधा है। वे कहते हैं - नैतिक व्यवस्था ईश्वर द्वारा नहीं, बल्कि कर्म के नियम के अनुसार संचालित होती है।

20) सृष्टि की नैतिक व्यवस्था चाहे अच्छी हो या बुरी, परंतु तथागत के अनुसार वह मनुष्य पर ही निर्भर है, किसी और पर नहीं।

पोस्ट 103
#कर्म_ही_इस_दुनिया_में_नैतिक_व्यवस्था_का_आधार_है_यह_मानना_ही_धम्म_है
21) कम्म (कर्म) का अर्थ है - मनुष्य द्वारा किया जाने वाला कार्य, और विपाक का अर्थ है - उसका परिणाम। यदि नैतिक व्यवस्था बुरी है, तो उसका कारण यह है कि मनुष्य अकुशल कर्म करता है। नैतिक व्यवस्था अच्छी है, तो इसका अर्थ केवल यह है कि मनुष्य कुशल कर्म (सत्कर्म) कर रहा है।

22) तथागत बुद्ध केवल कर्म के बारे में ही नहीं बोलते। वे उसे 'कम्म-नियम' के रूप में पहचानते हैं और उन कर्म के नियमों का भी विवेचन करते हैं।

23) कम्म-नियम का बुद्ध-प्रणीत अभिप्राय यह है कि जिस प्रकार दिन के बाद रात आती है, उसी प्रकार कर्म के बाद उसका परिणाम आता है - यह एक नियम है।

24) कुशल कर्म से होने वाला लाभ प्रत्येक कुशल कर्म करने वाले को मिलता है, और अकुशल कर्म के दुष्परिणाम से बचा नहीं जा सकता।

25) इसलिए तथागत बुद्ध का उपदेश है - ऐसा कुशल कर्म करो जिससे मानवता को अच्छी नैतिक व्यवस्था का लाभ मिले। क्योंकि कुशल कर्म से ही नैतिक व्यवस्था बनी रहती है। अकुशल कर्म मत करो, क्योंकि उससे नैतिक व्यवस्था की हानि होती है और मानवता दुःखी होती है।

26) यह संभव है कि कर्म और कर्म के परिणाम के बीच कुछ अंतराल हो। ऐसा प्रायः घटित होता है।

27) इस दृष्टि से कर्म के तीन विभाग किए जा सकते हैं:

1. दिट्ठु धम्म वेदनीय कम्म (तत्काल फल देने वाला कर्म)
2. उपपज्जवेदनीय कम्म (जिसका परिणाम अगले जन्म में मिलता है)
3. अपरापरियवेदनीय कम्म (अनिश्चित काल में फल देने वाला कर्म)

28) कर्म कभी-कभी 'अहोसी कर्म' हो सकता है, अर्थात उसका कोई परिणाम नहीं होता। अहोसी कर्म में उन कर्मों का समावेश होता है जिनकी आंतरिक दुर्बलता के कारण विपाक (परिणाम) नहीं होता, या जो कर्म अन्य सबल कर्मों के कारण निष्प्रभावी हो जाते हैं।

29) इन सभी बातों पर विचार करने के बाद भी तथागत बुद्ध के "कर्म का नियम अनिवार्य है" इस सिद्धांत पर कोई आघात नहीं पहुँचता।

30) कर्म का विपाक केवल कर्ता को ही भोगना पड़ता है और इसके अलावा इसमें कुछ और आशय नहीं है - केवल इतना ही कर्म सिद्धांत में अभिप्रेत नहीं है। केवल यही अभिप्राय है ऐसा मानना गलत है। कभी-कभी एक के कर्म का परिणाम उसके बजाय दूसरे को भोगना पड़ता है। फिर भी यह सब कर्म-नियम के ही परिणाम हैं, क्योंकि वही कर्म-नियम नैतिक व्यवस्था को संचालित या स्थापित करता है।

31) व्यक्ति आते हैं, जाते हैं, परंतु विश्व की नैतिक व्यवस्था सदा बनी रहती है। और उसी प्रकार इस व्यवस्था को बनाने वाला कर्म-नियम भी अबाधित रहता है।

32) इसी कारण तथागत बुद्ध के धम्म में, जो स्थान अन्य धर्मों में ईश्वर को दिया गया है, वह स्थान नीति (नैतिकता) को प्राप्त हुआ है।

33) वास्तविक विश्व में नैतिक व्यवस्था कैसे बनी रहती है - इसका तथागत बुद्ध ने जो उत्तर दिया है, वह सीधा और निर्विवाद है।

34) ऐसा होते हुए भी इस उत्तर का सही अर्थ कभी-कभार ही समझा जाता है। प्रायः सदा ही इसका गलत अर्थ लगाया जाता है, गलत बताया जाता है, या इसकी गलत व्याख्या की जाती है। नैतिक व्यवस्था कैसे बनी रहती है, इस प्रश्न के उत्तर के रूप में ही तथागत बुद्ध ने कर्म सिद्धांत प्रतिपादित किया था - इस सत्य का बहुत कम लोगों को ध्यान रहता है।

35) फिर भी, कर्म सिद्धांत प्रतिपादित करने में बुद्ध का यही हेतु था।

36) कर्म-नियमों का संबंध केवल सामान्य नैतिक व्यवस्था से है। व्यक्ति के सौभाग्य या दुर्भाग्य से उसका संबंध नहीं है।

37) उनका प्रयोजन विश्व की नैतिक व्यवस्था को बनाए रखना है।

38) इसी कारण 'कर्म-नियम' धम्म का एक प्रमुख अंग है।

पोस्ट 104
#अधम्म_क्या_है?
1) दैवी चमत्कारों पर विश्वास करना अर्थात अधम्म

1) जब-जब कोई घटना घटित होती है, तब मनुष्य मात्र को यह जानने की आवश्यकता महसूस होती है कि वह कैसे घटी, उसका कारण क्या है।

2) कभी-कभी कारण और कार्य इतने निकट होते हैं कि कार्य के कारण का पता लगाना कठिन नहीं होता।

3) परंतु कभी-कभी कार्य (परिणाम) कारण से इतना दूर होता है कि वहाँ कार्य-कारण का पता नहीं चलता। स्थूल दृष्टि से देखने पर ऐसा लगता है कि इस परिणाम का कोई कारण ही नहीं था।

4) तब ऐसा प्रश्न उत्पन्न होता है कि यह घटना कैसे घटी?

5) ऐसे समय में सामान्य उत्तर यह होता है कि यह घटना किसी दैवी कारण से अर्थात चमत्कार से घटी होगी।

6) तथागत बुद्ध के पूर्ववर्तियों ने इन प्रश्नों के विभिन्न प्रकार से उत्तर दिए हैं।

7) पकुध कच्चायन प्रत्येक घटना का कोई कारण होना नहीं मानते थे। वे कहते थे कि घटनाएँ बिना कारण के स्वतंत्र रूप से घटित होती हैं।

8) मक्खली गोसाल मानते थे कि घटना का कारण होना चाहिए, परंतु वे ऐसा प्रचार करते थे कि वह कारण मानवीय शक्ति से परे कहीं प्रकृति, अनिवार्य आवश्यकता, वस्तुओं के आंतरिक नियम, पूर्वनियोजित दैव आदि जैसी चीजों में खोजा जाना चाहिए।

9) तथागत बुद्ध ने ऐसे सिद्धांतों का खंडन किया। उनका कहना था कि प्रत्येक घटना का कारण होता है। इतना ही नहीं, प्रत्येक कारण भी मानवीय या प्राकृतिक कारणों का ही परिणाम है।

10) काल, प्रकृति, अनिवार्य आवश्यकता आदि को किसी भी घटना का कारण मानने का उनका विरोध था।

11) यदि काल, प्रकृति, अनिवार्य आवश्यकता ही केवल घटना के एकमात्र कारण हैं, तो फिर हमारी स्थिति क्या है?

12) क्या मनुष्य काल, प्रकृति, आकस्मिकता, ईश्वर, दैव, अनिवार्य आवश्यकता आदि के हाथों की एक कठपुतली मात्र है?

13) यदि मनुष्य स्वतंत्र नहीं है, तो मनुष्य के अस्तित्व का प्रयोजन क्या है? यदि वह दैवी चमत्कारों पर विश्वास करने लगे, तो उसकी बुद्धि का क्या उपयोग?

14) यदि मनुष्य स्वतंत्र है, तो प्रत्येक घटना का मानवीय या प्राकृतिक कारण होना चाहिए। किसी भी घटना का उद्गम दैवी चमत्कार में होना संभव नहीं है।

15) संभवतः ऐसा हो सकता है कि घटना का वास्तविक कारण न मिले, परंतु यदि वह बुद्धिमान है, तो कभी न कभी एक दिन वह उसे अवश्य पा लेगा।

16) दैवी चमत्कारवाद का खंडन करने में तथागत बुद्ध के तीन हेतु थे:

17) उनका पहला हेतु था - मनुष्य को बुद्धिवादी बनाना।

18) उनका दूसरा हेतु था - मनुष्य को स्वतंत्रतापूर्वक सत्य की खोज करने के लिए तैयार करना।

19) उनका तीसरा हेतु था - उन भ्रामक मान्यताओं के उद्गम स्थान को नष्ट करना जो मनुष्य की खोज करने की प्रवृत्ति को मार देती हैं।

20) यही बुद्ध धम्म का कर्म-सिद्धांत अथवा हेतुवाद कहलाता है।

21) यह हेतुवाद बुद्ध धम्म का मुख्य सिद्धांत है। वह बुद्धिवाद सिखाता है और बुद्ध धम्म बुद्धिवाद से भिन्न नहीं है।

22) इसी कारण दैवी चमत्कारों की पूजा अधम्म मानी जाती है।

पोस्ट 105
ईश्वर पर विश्वास धम्म का अंग नहीं (I)
1) यह जग किसने बनाया? यह एक सामान्य प्रश्न है। इस जग को ईश्वर ने बनाया - यह उसका एक सामान्य उत्तर है।

2) ब्राह्मणीय योजना में इस ईश्वर को प्रजापति, ईश्वर, ब्रह्मा, महाब्रह्मा इत्यादि नामों से पुकारा जाता है।

3) यह ईश्वर कौन है? वह कैसे अस्तित्व में आया? इन प्रश्नों का वहाँ कोई उत्तर नहीं है।

4) जो लोग ईश्वर पर विश्वास करते हैं, वे उसका वर्णन सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञ के रूप में करते हैं।

5) ईश्वर में कुछ नैतिक गुण होने का भी वर्णन करते हैं। ऐसा कहा जाता है कि ईश्वर शिव (कल्याणकारी), न्यायी और दयालु है।

6) क्या तथागत बुद्ध ने ईश्वर को सृष्टिकर्ता के रूप में स्वीकार किया है? यह प्रश्न है।

7) उत्तर है - "नहीं", उन्होंने स्वीकार नहीं किया है।

8) ऐसे अनेक कारण हैं जिनके लिए उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धांत को स्वीकार नहीं किया।

9) किसी ने भी ईश्वर को देखा नहीं है, लोग केवल ईश्वर के बारे में बोलते हैं।

10) ईश्वर अज्ञात और अदृश्य है।

11) कोई भी यह सिद्ध नहीं कर सकता कि ईश्वर ने यह सब जग रचा है। जग रचा हुआ नहीं है, बल्कि विकसित हुआ है।

12) ईश्वर पर विश्वास करने में क्या लाभ है? कोई लाभ नहीं है।

13) तथागत कहते हैं कि ईश्वर पर आधारित धर्म कल्पनाश्रित धर्म हैं।

14) इसलिए ईश्वर पर आधारित धर्म किसी काम का नहीं है।

15) उनके परिणामस्वरूप केवल भ्रामक मान्यताएँ उत्पन्न होती हैं।

16) तथागत बुद्ध ने इस प्रश्न को यहीं नहीं छोड़ा। उन्होंने इस प्रश्न के विभिन्न पहलुओं पर विचार किया है।

17) जिन कारणों से उन्होंने ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धांत को अस्वीकार किया है, वे अनेक कारण हैं।

18) उन्होंने ऐसा विचार रखा है कि ईश्वर के अस्तित्व का सिद्धांत सत्य पर आधारित नहीं है।

19) यह विचार उन्होंने वासेट्ठ और भारद्वाज इन दो ब्राह्मणों के साथ किए गए संभाषण में स्पष्ट किया है।

20) वासेट्ठ और भारद्वाज इन दोनों में मुक्ति का सत्य मार्ग कौन सा और असत्य मार्ग कौन सा - इस संबंध में विवाद उत्पन्न हुआ।

21) इस समय तथागत अपने महान भिक्षु संघ के साथ कोशल जनपद में विहार कर रहे थे। वहाँ मनसाकड़ नामक ब्राह्मण गाँव में अचिरवती नदी के तट पर स्थित एक आम्रवन में वे ठहरे हुए थे।


पोस्ट 106
ईश्वर पर विश्वास धम्म का अंग नहीं (II)
22) वासेट्ठ और भारद्वाज दोनों मनसाकड़ गाँव में रहते थे। जब उन्होंने सुना कि तथागत उनके गाँव में ठहरे हैं, तो वे उनके पास गए। और दोनों ने तथागत के सामने अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।

23) भारद्वाज ने कहा, "अध्वर्यु ब्राह्मणों ने जो मार्ग दिखाया है, वह सीधा मार्ग है, उसमें सीधे मुक्ति का मार्ग है। और जो कोई उस मार्ग के अनुसार चलता है, वह मार्ग उसे ब्रह्मसायुज्य (ब्रह्म से एकता) प्रदान करता है।"

24) वासेट्ठ बोला, "हे तथागत, बहुत से ब्राह्मण बहुत से मार्ग दिखाते हैं - अध्वर्यु ब्राह्मण, तैत्तिरीय ब्राह्मण, छांदोग्य ब्राह्मण, उसी प्रकार बह्वृच ब्राह्मण - ये प्रत्येक अपने दिखाए गए मार्ग से ब्रह्मसायुज्य मिलने की बात कहते हैं।"

25) "जिस प्रकार किसी गाँव या नगर के अनेक रास्ते होते हैं, फिर भी वे सभी रास्ते उस गाँव तक पहुँचाते हैं, उसी प्रकार इन ब्राह्मणों द्वारा दिखाए गए मार्ग अंततः ब्रह्मसायुज्य की ओर ले जाते हैं।"

26) तथागत बुद्ध ने उससे पूछा, "वासेट्ठ, तुम्हारा कहना यह है कि सभी मार्ग सही हैं?" वासेट्ठ बोला, "श्रमण गौतम, हाँ, यही मेरा कहना है।"

27) "परंतु वासेट्ठ, इन तीनों वेदों को जानने वाले ब्राह्मणों में से किसी एक ने भी ब्रह्मा का साक्षात् आमने-सामने दर्शन किया है क्या?"

28) "नहीं, गौतम, नहीं।"

29) "इन तीनों वेदों को जानने वाले ब्राह्मणों के गुरुओं ने भी ब्रह्मा को आमने-सामने देखा है क्या?"

30) "नहीं, गौतम, नहीं।"

31) "किसी ने भी ब्रह्मा को नहीं देखा, किसी को भी ब्रह्म-साक्षात्कार नहीं हुआ।" वासेट्ठ बोला, "हाँ, ऐसा ही है।" "तो फिर तुम कैसे मानते हो कि ये ब्राह्मण जो कहते हैं, वह सत्य पर आधारित है?"

32) "वासेट्ठ, जिस प्रकार एक दूसरे को थामे चलने वाली अंधों की एक पंक्ति होती है - उसमें आगे वाले को नहीं दिखता, बीच वाले को नहीं दिखता, पीछे वाले को भी नहीं दिखता - उसी प्रकार मुझे लगता है, इन ब्राह्मणों के शब्द अंधों के शब्दों के समान हैं। उनमें से आगे वाले को नहीं दिखता, बीच वाले को नहीं दिखता, अंत में वाले को भी नहीं दिखता। इन ब्राह्मणों के शब्द उपहासास्पद हैं, वे केवल पोखले, व्यर्थ शब्द हैं, उनमें कोई अर्थ नहीं है।"

33) "वासेट्ठ, यह बात किसी ऐसी स्त्री से प्रेम करने वाले मनुष्य के समान नहीं है जिसे उसने कभी देखा ही नहीं?" "हाँ, वैसी ही है," वासेट्ठ ने उत्तर दिया।

34) "वासेट्ठ, तो फिर मुझे बताओ - यदि लोग तुमसे पूछें, 'मित्र, जिस अति सुंदर स्त्री पर तुम इतना प्रेम करते हो और जिसकी तुम कामना करते हो, वह है कौन? वह क्षत्रिय है, ब्राह्मण है, वैश्य है या शूद्र है?'"


पोस्ट 107
ईश्वर पर विश्वास धम्म का अंग नहीं (III)
35) सृष्टि के तथाकथित निर्माता महाब्रह्मा की उत्पत्ति के संबंध में चर्चा करते हुए तथागत भारद्वाज और वासेट्ठ को संबोधित करते हुए बोले:

36) "मित्रों, वह प्रथम जन्म लेने वाला प्राणी कहता है - 'मैं ब्रह्मा हूँ, महाब्रह्मा हूँ, विजेता हूँ, अपराजित हूँ, सर्वद्रष्टा हूँ, सर्वाधिकारी हूँ, मालिक हूँ, निर्माता हूँ, रचयिता हूँ, व्यवस्थापक हूँ। मैं स्वयं अपना स्वामी हूँ, और जो हैं तथा आगे होने वाले हैं, उनका मैं जनक हूँ। मुझसे ही ये सब प्राणी जन्मे हैं।'"

37) "तुम्हारा कहना है कि 'पूज्य, विजेता, अपराजित, जो हैं और जो होंगे उनके जनक, जिनके कारण सबकी उत्पत्ति हुई है, वे ब्रह्मा स्थायी हैं, सदा रहने वाले हैं, नित्य हैं, अपरिवर्तनशील हैं, वे अनंत काल तक वैसे ही बने रहेंगे। तो फिर उन ब्रह्मा द्वारा उत्पन्न किए गए हम इस लोक में आकर अस्थायी, अनित्य, परिवर्तनशील, अल्पजीवी, मरणधर्मी कैसे हो गए?"

38) इस प्रश्न के पास वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नहीं था।

39) तथागत का तीसरा विचार ईश्वर की सर्वशक्तिमानता के संबंध में था। "यदि ईश्वर सर्वशक्तिमान है और सारी सृष्टि का वह बलवत्तर कारण है, तो उससे मनुष्य के मन में कुछ भी कार्य करने की अपनी स्वतंत्र इच्छा का होना संभव नहीं है। उसे कुछ करने की न तो आवश्यकता है, न कुछ करने की इच्छा, न प्रयत्न करने का संकल्प ही स्फुरित होगा। इससे मनुष्य मात्र इस जगत में एक निष्क्रिय प्राणी बनकर रह जाएगा, जिसे कोई कार्य नहीं करना है। यदि ऐसा है, तो ब्रह्मा ने मनुष्य को बनाया ही क्यों?"

40) इसका भी वासेट्ठ के पास कोई उत्तर नहीं था।

41) तथागत का चौथा विचार यह था - यदि ईश्वर शिवस्वरूप (कल्याणकारी) है, तो मनुष्य हत्यारे, चोर, व्यभिचारी, झूठ बोलने वाले, निंदक, बकवादी, लोभी, द्वेषी, विकृत क्यों होते हैं? इसका कारण ईश्वर ही होना चाहिए। शिवस्वरूप ईश्वर के अस्तित्व में यह कैसे संभव है?

42) तथागत का पाँचवाँ विचार ईश्वर की सर्वज्ञता, न्यायप्रियता और दयालुता के संबंध में था।

43) "यदि कोई महान सृष्टिकर्ता है और वह न्यायी तथा दयालु है, तो फिर जगत में इतना अन्याय क्यों फैला हुआ है?" - ऐसा प्रश्न तथागत ने किया। वे आगे बोले - "जिसके पास दृष्टि है, वह चारों ओर घृणित दृश्य देखेगा। ब्रह्मा ने अपनी रचना को सुधारा क्यों नहीं? जिसकी शक्ति असीम और व्यापक है, उसके हाथ कल्याण करने के लिए आगे क्यों नहीं बढ़ते? उसके द्वारा रचित सृष्टि दुःख भोग में क्यों डूबी हुई है? वह सबको सुख क्यों नहीं देता? भ्रष्टाचार, चोरी, अज्ञान क्यों फैलता रहता है? असत्य सत्य पर क्यों विजय पाता है? सत्य और न्याय पराजित क्यों होते हैं? मेरे मत में, अन्याय को आश्रय देने के लिए जग बनाने वाला तुम्हारा यह ब्रह्मा परम अन्यायी ठहरता है।"

44) "सब प्राणियों में व्याप्त तुम्हारा ईश्वर है। जो उन प्राणियों को सुखी या दुःखी बनाता है, उनसे पाप या पुण्य करवाता है - वह ईश्वर स्वयं पाप से कलंकित है। या तो मनुष्य उस ईश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं चलता, या वह ईश्वर न्यायी और अच्छा नहीं है, अथवा वह अंधा है।"

पोस्ट 108
ईश्वर पर विश्वास धम्म का अंग नहीं (IV)
45) तथागत का ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धांत के संबंध में अंतिम विचार यह था कि ईश्वर के अस्तित्व के सिद्धांत पर चर्चा करने से कोई लाभ नहीं है।

46) तथागत के अनुसार धर्म का केंद्र मनुष्य का देवता से संबंध नहीं है, बल्कि मनुष्य का मनुष्य से संबंध है। धर्म का उद्देश्य यह है कि सभी मनुष्य सुखी हों, इस प्रकार से मनुष्यों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए।

47) तथागत के देवता के अस्तित्व पर विश्वास के विरुद्ध होने का एक और कारण था।

48) तथागत धार्मिक क्रियाकलापों के विरोधी थे। इस विरोध का कारण यह था कि ये क्रियाकलाप भ्रामक मान्यताओं के आगार होते हैं, और भ्रामक मान्यताएँ अष्टांग मार्ग के महत्वपूर्ण तत्व सम्यक दृष्टि की शत्रु हैं।

49) तथागत की दृष्टि में ईश्वर पर विश्वास एक अत्यंत भयानक बात है। क्योंकि ईश्वर पर विश्वास पूजा और प्रार्थना का उत्पादक है। पूजा और प्रार्थना की आवश्यकता से पुरोहित पद उत्पन्न होता है, और पुरोहित ऐसी दुष्ट बुद्धि को संभव बनाता है।

50) ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास के संबंध में ये विचार व्यावहारिक थे, परंतु वे अधिकतर सैद्धांतिक थे। तथागत जानते थे कि ये विचार ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास को पूरी तरह से मारक नहीं थे।

51) फिर भी ऐसा नहीं समझना चाहिए कि उनके पास मारक विचार नहीं था। उन्होंने एक ऐसा विचार रखा जो निःसंदेह देवता पर विश्वास का खंडन करने वाला है। यह विचार प्रतीत्यसमुत्पाद के सिद्धांत में अंतर्निहित है।

52) इस सिद्धांत के अनुसार, ईश्वर है या नहीं - यह महत्वपूर्ण प्रश्न नहीं है। उसी प्रकार, ईश्वर ने यह सृष्टि बनाई या नहीं - यह भी प्रश्न नहीं है। असली प्रश्न यह है कि निर्माता ने यह सृष्टि कैसे बनाई? ईश्वर के अस्तित्व पर विश्वास का समर्थन इस प्रश्न के उत्तर का निष्कर्ष है कि यह जग कैसे बना।

53) महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि ईश्वर ने सृष्टि भाव (किसी पदार्थ) से उत्पन्न की या अभाव (शून्य) से?

54) यह विश्वास करना संभव नहीं है कि कुछ भी नहीं से कुछ उत्पन्न किया गया।

55) यदि कहा जाए कि तथाकथित ईश्वर ने कुछ तरी से कुछ निर्मित किया, तो जिस 'कुछ तरी' से उसने नया 'कुछ तरी' निर्मित किया, वह निर्मिति के पूर्व ही अस्तित्व में होना चाहिए। इसलिए ईश्वर को उनके पूर्व ही अस्तित्व में रहे 'कुछ तरी' का निर्माता नहीं कहा जा सकता।

56) यदि ईश्वर ने कुछ वस्तुएँ निर्माण करने से पहले 'किसी और ने' 'कुछ' निर्मित किया हो, तो ईश्वर को निर्माता या आदि कारण नहीं कहा जा सकता।

57) ईश्वर सब सृष्टि का निर्माता है - यह विश्वास तर्कदृष्टि से असंगत होने के कारण अधर्म है। यह विश्वास केवल असत्य पर आधारित विश्वास ठहरता है।

पोस्ट 109
ब्रह्म-सायुज्य पर आधारित धर्म अधर्म है
1) जब तथागत अपने धर्म का प्रचार कर रहे थे, उस समय एक सिद्धांत प्रचलित था, जिसे वेदांत कहा जाता था।

2) इस सिद्धांत के तत्व संक्षिप्त और सीधे थे।

3) इस समस्त विश्व के पीछे एक सर्वव्यापक जीवन तत्व विद्यमान है, उसे ब्रह्म या ब्रह्मन् कहा जाता है।

4) यह ब्रह्म एक वास्तविकता है।

5) आत्मा और ब्रह्म एक ही हैं।

6) आत्मा और ब्रह्म का एकीकरण करने से मनुष्य को मोक्ष मिलता है - यह इस सिद्धांत का दूसरा तत्व है।

7) आत्मा और ब्रह्म एक हैं - इस ज्ञान से आत्मा ब्रह्म के साथ एकरूपता प्राप्त करता है।

8) आत्मा को "मैं ब्रह्म हूँ" का ज्ञान होने के लिए संसार का त्याग करना आवश्यक है।

9) इस सिद्धांत को वेद कहते हैं।

10) तथागत बुद्ध के मन में इस सिद्धांत के प्रति आदर नहीं था। उनके अनुसार इस सिद्धांत का आधार मिथ्या था, इसका कोई उपयोग नहीं था और इसलिए यह स्वीकार करने योग्य नहीं था।

11) यह अपना मत तथागत ने भारद्वाज और वासेट्ठ इन दो ब्राह्मणों के साथ हुए संवाद में स्पष्ट किया है।

12) तथागत बुद्ध का कहना था कि किसी भी बात को स्वीकार करने के लिए उसके पास कोई न कोई प्रमाण होना चाहिए।

13) प्रमाण के दो प्रकार हैं - प्रत्यक्ष और अनुमान।

14) तथागत बुद्ध का प्रश्न यह था - क्या किसी ने ब्रह्म का प्रत्यक्ष अनुभव किया है? क्या तुमने ब्रह्म को देखा है? क्या तुमने ब्रह्म के साथ बातचीत की है? क्या तुमने ब्रह्म का आभास पाया है?

15) वासेट्ठ ने उत्तर दिया - "नहीं।"

16) ब्रह्म के अस्तित्व का दूसरा प्रमाण अनुमान है, वह उसके अस्तित्व को सिद्ध करने के लिए अपर्याप्त है।

17) कुछ लोग कहते हैं कि वस्तु अदृश्य होते हुए भी उसका अस्तित्व होता है, इसलिए वे कहते हैं कि ब्रह्म अदृश्य होते हुए भी उसका अस्तित्व है।

18) यह एक स्थूल वक्तव्य है, जो असंभव को स्थापित करने के लिए किया गया है।

19) फिर भी, तर्क के लिए यह मान लेते हैं कि वस्तु अदृश्य होते हुए भी उसका अस्तित्व हो सकता है।

20) इसका उत्तम उदाहरण बिजली है। बिजली अदृश्य होते हुए भी उसका अस्तित्व है।

21) परंतु यह तर्क भी पर्याप्त नहीं है।

22) अदृश्य वस्तु को भी अपने अस्तित्व को किसी दूसरे रूप में प्रकट करना आवश्यक है, तभी उसकी वास्तविकता मान्य हो सकती है।

23) परंतु यदि अदृश्य वस्तु किसी दूसरे रूप में अपने अस्तित्व को प्रकट नहीं करती, तो उसकी वास्तविकता मान्य नहीं हो सकती।

24) इसलिए, बिना प्रत्यक्ष या अनुमान प्रमाण के, केवल इसलिए मान लेना कि ब्रह्म है क्योंकि कुछ लोग ऐसा कहते हैं, मिथ्या है।

25) तथागत बुद्ध का निष्कर्ष था कि ब्रह्म-सायुज्य पर आधारित धर्म अधर्म है, क्योंकि यह बिना प्रमाण के, केवल आस्था और अंधविश्वास पर टिका है।

26) ऐसा धर्म मनुष्य को सत्य के मार्ग पर नहीं ले जा सकता, बल्कि उसे भ्रम और अज्ञान में डालता है।


पोस्ट 110
आत्म्यापर विश्वास यह अधर्म है (I)
1) तथागत बुद्ध ने कहा है कि आत्मा पर आधारित धर्म काल्पनिक धर्म है।

2) किसी ने भी आत्मा को नहीं देखा है, न ही आत्मा से संभाषण किया है।

3) आत्मा अज्ञात और अदृश्य है।

4) जो वस्तु वास्तविक है, वह आत्मा नहीं, बल्कि मन है। मन आत्मा से भिन्न है।

5) तथागत ने कहा – आत्मा पर विश्वास करना निरुपयोगी है।

6) इसलिए आत्मा पर आधारित धर्म हमारे लिए उचित नहीं है।

7) ऐसा धर्म केवल भ्रामक मान्यताओं का जनक होता है।

8) बुद्ध ने इस प्रश्न को यहीं नहीं छोड़ा, उन्होंने इस प्रश्न की सांगोपांग चर्चा की है।

9) आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास उतना ही सामान्य है जितना ईश्वर पर विश्वास।

10) आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास ब्राह्मण धर्म का एक अंग है।

11) ब्राह्मण धर्म में जीव को आत्मा या आत्मन् कहा जाता है।

12) ब्राह्मण धर्म में आत्मा उस विशेष तत्व का नाम है जो शरीर से पृथक है, परंतु शरीर के भीतर जन्म से ही वास करता है।

13) आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास के साथ अन्य संबद्ध विश्वास भी जुड़े हैं।

14) आत्मा शरीर के साथ मृत्यु को प्राप्त नहीं होता। वह अगले जन्म के समय दूसरे शरीर में जन्म लेता है।

15) शरीर आत्मा का एक परिधान मात्र है।

16) क्या तथागत आत्मा पर विश्वास करते हैं? नहीं, तथागत आत्मा पर विश्वास नहीं करते। आत्मा के संबंध में उनके सिद्धांत को अनात्मवाद कहते हैं।

17) यदि शरीर रहित आत्मा माना जाए तो उसके संबंध में अनेक प्रश्न उठते हैं – आत्मा क्या है? वह कहाँ से आया? शरीर की मृत्यु के बाद उसका क्या होता है? वह कहाँ जाता है? शरीर की मृत्यु के बाद वह परलोक में किस रूप में रहता है? कितने काल तक वह वहाँ रहता है? इन सब प्रश्नों के उत्तर तथागत ने आत्मा का अस्तित्व मानने वालों से माँगे।

18) अपनी जाँच-पड़ताल में उन्होंने अपनी सामान्य पद्धति से यह दिखाया कि आत्मा की कल्पना कितनी अस्पष्ट है।

19) जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, उनसे आत्मा के आकार और आकृति के बारे में पूछा।

20) उन्होंने आनंद से पूछा – आत्मा के संबंध में अनेक प्रकार के मत हैं। कुछ लोग कहते हैं, 'मेरे आत्मा का आकार है और वह अत्यंत सूक्ष्म है।' दूसरे कुछ कहते हैं कि आत्मा का रूप है और वह अनंत है, और सूक्ष्म भी है। और कुछ ऐसा कहते हैं – वह निराकार और अनंत है।

21) आनंद, आत्मा के संबंध में अनेक प्रकार के मत हैं।

22) जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, उनकी आत्मा के संबंध में क्या कल्पना है? यह भी तथागत का दूसरा प्रश्न है। कोई कहते हैं – आत्मा सुख-दुःख के अनुभव की क्रिया है। दूसरे कोई कहते हैं – नहीं, मेरा आत्मा सुख-दुःख के अनुभव की क्रिया नहीं है, अनुभवशीलता उसका धर्म है। आत्मा के संबंध में ऐसी विविध कल्पनाएँ हैं।

23) इसके बाद तथागत ने जो आत्मा के अस्तित्व पर विश्वास करते हैं, उनसे प्रश्न पूछा – शरीर की मृत्यु के बाद आत्मा की क्या स्थिति होती है?

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