1893 के शिकागो विश्व धर्म संसद में अनागारिक धम्मपाल



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अनागारिक धम्मपाल महाबोधी विहार मुक्ती आंदोलन की आवाज 1893 को शिकागो विश्व धर्म संसद तक पहुंचायी थी। उन्होंने महाबोधि मंदिर को बौद्धों के नियंत्रण में वापस लाने के अपने प्रयासों का उल्लेख किया, जो उस समय शैव पुजारियों के अधीन था।

#उनके_भाषण_का_परिणाम यह हुआ कि, न्यूयॉर्क के व्यवसायी चार्ल्स टी. स्ट्रॉस ने शिकागो में थियोसोफिकल सोसाइटी की बैठक में बौद्ध धर्म स्वीकार किया और पहली बार गैर-एशियाई अमेरिकियों को बौद्ध धर्म से परिचित कराया। 

अनागारिका धम्मपाल ने 18 सितंबर,1893 को शिकागो विश्व धर्म संसद में अपना प्रमुख भाषण दिया, जिसमें उन्होंने बौद्ध धर्म की सार्वभौमिकता, नैतिकता, और ऐतिहासिक महत्व पर केंद्रित था। जो ऐतिहासिक महत्व को रेखांकित किया।

धम्मपाल ने अपने भाषण की शुरुआत में कहा, "इतिहास स्वयं को दोहरा रहा है। पच्चीस शताब्दी पहले भारत ने एक बौद्धिक और धार्मिक क्रांति देखी, जिसने एकेश्वरवाद, पुरोहितों के स्वार्थ, और कर्मकांडों को उखाड़ फेंका और एक संश्लेषित धर्म की स्थापना की, जिसे उचित रूप से 'धम्म'—दार्शनिक धर्म कहा गया।"
उन्होंने बौद्ध धर्म को एक दार्शनिक और नैतिक प्रणाली के रूप में प्रस्तुत किया,जो पुरोहितवाद और अंधविश्वास के खिलाफ था। उन्होंने बुद्ध को एक महान सुधारक के रूप में चित्रित किया, जिन्होंने मानवता को करुणा और तर्क का मार्ग दिखाया।

 अनागारिक धम्मपाल का लक्ष्य पश्चिमी दर्शकों के लिए बौद्ध धर्म को तर्कसंगत और आधुनिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करना था, ताकि इसे पश्चिमी ईसाई मिशनरियों द्वारा लगाए गए "नकारात्मक, नास्तिक, और निष्क्रिय" जैसे लेबलों से मुक्त किया जा सके। उन्होंने बौद्ध धर्म को विज्ञान, यूरोपीय प्रबुद्धता (Enlightenment) और नैतिकता के साथ जोड़ा।
#बौद्ध_धर्म_और_विज्ञान:
धम्मपाल ने बौद्ध धर्म को पश्चिमी दर्शकों के लिए आधुनिक और तर्कसंगत बनाया, यह कहते हुए कि यह यूरोपीय प्रबुद्धता और वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है। उन्होंने बौद्ध धर्म के कर्म और कारण-परिणाम (causation) के सिद्धांत को वैज्ञानिक सिद्धांतों से जोड़ा, जो जापानी ज़ेन गुरु सोएन शाकु ने भी अपने भाषण में उल्लेख किया था।
उन्होंने कहा कि बौद्ध धर्म "नास्तिक" या "नकारात्मक" नहीं है, जैसा कि ईसाई मिशनरियों ने चित्रित किया, बल्कि यह एक तर्कसंगत और मानवतावादी दर्शन है।
#बुद्ध_की_शिक्षाओं_और_नैतिकता:
धम्मपाल ने बुद्ध की शिक्षाओं, विशेष रूप से चार आर्य सत्य (दुख, दुख का कारण, दुख का निवारण, और अष्टांगिक मार्ग) और अहिंसा पर जोर दिया। उन्होंने बौद्ध नैतिकता को गृहस्थों (लौकिक लोगों) के लिए भी प्रासंगिक बताया, जिसमें करुणा, सत्य, और संयम शामिल हैं।

उन्होंने सम्राट अशोक के शासन को आदर्श बौद्ध शासन के रूप में प्रस्तुत किया, जहां शांति और नैतिकता पर आधारित समाज था। उन्होंने कहा कि अशोक ने बौद्ध धर्म को विश्व स्तर पर फैलाया, जो सहिष्णुता और शांति का प्रतीक था।
#पश्चिमी_दर्शकों_को_चुनौती:
धम्मपाल ने अपने दर्शकों को चुनौती दी, जब उन्होंने पूछा, "आप में से कितनों ने बुद्ध के जीवन के बारे में पढ़ा है?" जब केवल पांच लोगों ने हाथ उठाया, तो उन्होंने कहा, "केवल पांच! 47.5 करोड़ लोग हमारे धर्म को स्वीकार करते हैं, जो प्रेम और आशा का धर्म है। आप स्वयं को महान राष्ट्र कहते हैं, फिर भी इस महान शिक्षक का इतिहास नहीं जानते। आप हमें कैसे आंक सकते हैं!"
यह कथन उनके भाषण का एक प्रभावशाली हिस्सा था, जिसने पश्चिमी दर्शकों को बौद्ध धर्म के प्रति जागरूक किया और उनकी अज्ञानता पर सवाल उठाया।
#सहिष्णुता_और_सार्वभौमिकता:
धम्मपाल ने बौद्ध धर्म की सहिष्णुता और सार्वभौमिकता पर जोर दिया, यह कहते हुए कि यह सभी धर्मों के प्रति सम्मान सिखाता है। उन्होंने बौद्ध धर्म को आधुनिक समय के लिए आवश्यक बताया, जहां सहिष्णुता और शांति की जरूरत है। उन्होंने ईसाई मिशनरियों की आलोचना की, जिन्होंने बौद्ध धर्म को नकारात्मक रूप में चित्रित किया, और कहा कि बौद्ध धर्म का सच्चा सार प्रेम, करुणा, और तर्क में निहित है।
#भारत_में_बौद्ध_धर्म_का_पतन:
धम्मपाल ने भारत में बौद्ध धर्म के पतन का उल्लेख किया और इसके लिए मुस्लिम शासन को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि "मुस्लिम कट्टरता" ने भारत में बौद्ध धर्म को कमजोर किया, जिसके कारण बौद्ध स्थल जैसे बोधगया और कुशीनगर उपेक्षित हो गए।
धम्मपाल सिर्फ भिक्षु नहीं थे, वे बौद्ध चेतना के क्रांतिकारी प्रचारक थे।
आज जब दुनिया शांति खोज रही है,
तब बुद्ध का धम्म ही भविष्य की राह है। 
संदर्भ:-
World’s Parliament of Religions.

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