राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले की वसीयत
समाजिक_आंदोलन_में_परिवारवाद_से_ज्यादा_व्यक्ति_की_योग्यता_श्रेष्ठता_को_महत्व_है।
राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ने अपनी वसीयत में अपने समाज के लिए उदारता और व्यापक दृष्टिकोण को उजागर किया है। समाज में पिछड़े वर्ग को समानता के साथ साथ समान अधिकार, अवसर मिलने चाहिए इसके लिए सत्यशोधक आंदोलन को अधिक व्यापक करने के लिए उन्होंने अपने परिवार से भी अधिक महत्वपूर्ण सत्यशोधक आंदोलन में समर्पित लायक कार्यकर्ता, व्यक्ति को ज्यादा महत्व दिया है। उनकी वसीयत आंदोलन के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण दस्तावेज है। ऐसे आंदोलन के प्रति त्याग और समर्पण कि मिसाल राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले ने अपने वसीयत में लिखी है।
वे लिखते हैं.....
प्रचलित मान्यता के अनुसार चिरंजीव यशवन्त का विवाह संपन्न हुआ हो या नहीं हुआ हो मैं जोतीराव गोविंदराव फुले और मेरी पत्नी सौभाग्यवती सावित्रीबाई पती जोतिराव फुले हम दोनों की मृत्यु के बाद सारी रस्में सत्यशोधक विचारधारा के अनुसार पूरी करने का अधिकार केवल चिरंजीव यशवन्त को है। बाप-दादाओं पुरखो के रिवाज अनुसार हम दोनों की लाशों को नमक में गाड़ देंगे। आर्यभट्ट की देखा-देखी हमें कभी भी हमारे शरीर का दाह संस्कार न करें। यदि हमारी मृत्यु के समय चिरंजीव यशवन्त उपस्थित नहीं हैं तो सत्य शोधक समाज का कोई भी सदस्य जो उपस्थित हो उसे सभी संस्कार करने का अधिकार है। या यदि मेरी मृत्यु के बाद चिरंजीव यशवन्त हमेशा स्कूल जाता है और मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करता है और अन्य डिग्रियाँ प्राप्त करने का प्रयास किए बिना एक आवारा और बाहरी व्यक्ति के बच्चे की तरह व्यवहार करना शुरू कर देता है, तो मेरी पत्नी द्वारा सत्य शोधक समाज के कार्यकर्ता सदस्यों के बहुमत से, पुणे में मेरा मकान नंबर 394 चिरंजीव यशवन्त को दे दिया जाएगा अथवा खानवड़ी यहां मेरे हिस्से में आया खेत, बागान और कुएं में हिस्सा दे अन्य सभी मेरे संपत्तियों में उसका हिस्सा रद्द कर दिया जाना चाहिए। तथा समाज के बहुसंख्यक सदस्यों के बहुमत से यशवन्त की जगह माली, कुळवाड़ी, धनगर आदि शूद्र समाज का कोई भी पुत्र जो सभी बच्चों में बुद्धिमान एवं योग्य हो वह मेरी संपत्ति का स्वामी हो तथा सारा कामकाज उसके द्वारा चलाया जाये।
सारांश :-
शुद्रातीशुद्र और दासानुदास प्रथा को मानने वाले आर्यभट्ट ब्राह्मण जाति और उसके अनुयायियों की मेरे मृत शरीरपर और मृत्यु सम्बंधित विधि पर परछाई नहीं पड़ने दे। इसलिए निर्माणकर्ता से नम्र प्रार्थना कर हम अपनी राजीखुशी अक्कल, होशियारी तथा होशोहवास के साथ लिखाकर रख रहा हूं।
दि.10 जुलाई 1887
दस्तखत
जोतीराव गोविंदराव फुले दस्तूरखुद
गवाह- सेवाराम शिवराम तिवारी, चाकण।
संदर्भ:-
महात्मा फुले समग्र साहित्य
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