युद्ध, झगडे का विकल्प मध्यस्थता
सिध्दार्थ गौतम द्वारा शांती समझौता मतलब आज कि मध्यस्थता
(Mediation)
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भगवान बुद्ध कहते है, "जिस प्रकार अपने जीवन का खतरा उठाते हुए मां अपने शिशु की देख भाल करती है,उसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ती को सभी प्राणियों के प्रति प्रेम प्रदान करने का मन बनाना चाहिये। उसे संपूर्ण विश्व के प्रति सद्भावना रखनी चाहिए, उपर नीचे और उस पार, सभी के लिये उसके मन मे घृणाहीन और शत्रृतारहीत बंधु प्रेम होना चाहिये।एसी जीवन पद्धति विश्व मे सर्वोत्तम है।" दुनिया में जो आक्रमण कर विनाशकारी हिंसात्मक परिणाम मिलते हैं इस समस्या का समाधान "युद्ध में न होकर बुद्ध मे है" यह सिद्धांत हर कोई जानता है समझता है पर अंमल करने मे नकारात्मकता होती है। राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय व्यवहार कुशलता और स्वार्थ के कारण अन्य लोग हस्तक्षेप करने से कतराते हैं।धर्म के सिद्धांत को देखा जाय तो एक धर्म पर आक्रमण करने पर उसी धर्म अनुयायियों ने मदन करना अपेक्षाकृत होता है परंतु विनाशकारी परिस्थितियों मे उसी धर्मों के लोग मदत के लिए कतराते हैं क्योंकि उनकी अपनी समस्याये होती है जो आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक समस्या उन्होंने खुलकर आगे आनेसे रोकती है फिस समस्या का समाधान भी निकलना जरूरी है आजतक इतिहास मे जो सफलतापूर्वक समस्याओं का समाधान मिला है वह अंतिम सत्य है वह बुद्ध का मार्ग है।
हिंसा यह बल प्रयोग का केवल एक दूसरा नाम है और यद्यपि बल का प्रयोग सृजनात्मक उद्देश्यों के लिए किया जाना चाहिए, परंतु शक्ति के रूप में बल प्रयोग तथा हिंसा के रूप में बल प्रयोग के बीच अंतर समझाना आवश्यक है। एक साध्य की उपलब्धि में अन्य अनेक साध्यों का विनाश शामिल होता है, जो उस साध्य से अभिन्न होते हैं, जिसे नष्ट करने का प्रयास किया जाता है। बल प्रयोग को इस प्रकार नियमित करना चाहिए कि वह अनिष्टकर साध्य को नष्ट करने की प्रक्रिया में यथासंभव अधिक से अधिक साध्यों की रक्षा कर सके। बुद्ध की अहिंसा निरपेक्ष नहीं थी,साम्यवादी हिंसा का प्रतिपादन एक निरपेक्ष सिद्धांत के रूप में करते हैं। बुद्ध इसके घोर विरोधी थे बुद्ध हिंसा के विरुद्ध थे परंतु वह न्याय के पक्ष में भी थे और जहां पर न्याय के लिए बल प्रयोग अपेक्षित होता है, वहां उन्होंने बल प्रयोग करने की अनुमति दी है।
बुद्ध कहते है; "एक अपराधी व दोषी को दंड अवश्य दिया जाना चाहिए और एक निर्दोष व्यक्ति को मुक्त व स्वतंत्र कर देना चाहिए यदि एक दंडाधिकारी एक-एक अपराधी को दंड देता है, तो यह दंडाधिकारी का दोष नहीं है। दंड का कारण अपराधी का दोष व अपराध होता है जो दंडाधिकारी दंड देता है, वह न्याय का ही पालन कर रहा होता है। उस पर अहिंसा का कलंक नहीं लगता। जो व्यक्ति न्याय तथा सुरक्षा के लिए लड़ता है, उसे अहिंसा का दोषी नहीं बनाया जा सकता। यदि शांति बनाए रखने के सभी साधन असफल हो गए हों, तो हिंसा का उत्तरदायित्व उस व्यक्ति पर आ जाता है, जो युद्ध को शुरू करता है। व्यक्ति को दुष्ट शक्तियों के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करना चाहिए। यहां युद्ध हो सकता है, परंतु यह स्वार्थ की या स्वार्थपूर्ण उद्देश्यों की शर्तों के लिए नहीं होना चाहिए।'
युद्ध और शत्रृता इनमें सुलाह मशवरा हो होना यही कारगार इलाज है
विवाद मे समझौता का माध्यम मध्यस्तता माध्यम होती है जो पंचायत,बिरादरी,परिवार के मुखिया या बुजुर्गो के माध्यम से सदीयों से समस्या पर समझौता किया जाता रहा है दो हजार पांचसौ साल पूर्व सिध्दार्थ गौतम द्वारा विवाद पर समझौता के द्वारा समस्या सुलझाना यह मध्यस्थता का मुलाधार है।वर्तमान मे संविधानिक और कानूनी तौर पर न्याय व्यवस्था मे बडे प्रभावी रूप से मध्यस्थता (Mediation)सफलतापूर्वक कार्यान्वित किया जा रहा है। मध्यस्थी याने (Mediation)जो न्यायव्यवस्था, न्यायदान मे इस विकल्प के माध्यम से(CPC) Civic Procedure Code धारा 89 के तहथ विवाद को व्यक्ति की इच्छा से कार्यपद्धति की प्रक्रिया का अवलंब कर आपस मे समझौता करने के लिये तटस्थ व्यक्ति के सहभाग से विवादीय पक्षकारों को एकजगह लाकर उनमे संमति के माध्यम से समझोता करने को मध्यस्थता काहा जाता है। मध्यस्थता (Mediation)मे जो तटस्थ व्यक्ती को Mediator कहा जाता है यह व्यक्ति प्रशिक्षत एवं तज्ञ व्यक्ती होते हैं जिनमें न्यायमूर्ती, न्यायाधीश, निवृत्त न्यायाधीश, तज्ञ अधीवक्ता इनके माध्यम से विवाद को सुलझाने मे मदत की जाती हैं जिसमे गोपणीयता का पालन एवं निर्णय को किसी पर न थोपकर विवाद को समझोता के माध्यम से छुटने हेतु अणुकुल परीस्थिती का निर्माण कर संवाद और चर्चा के माध्यम से पारदर्शीता और गोपणीयता का पालन कर मध्यस्थता की जाती हैं।
2500 वर्ष पूर्व मध्यस्थता के माध्यम से राज्य के विवाद को सुलझाने का उदाहरण देखने को मिलता हैं। शाक्यां के राज्य की सिमा को लग कर कोलिय का राज्य था "रोहिणी" नदी विवाद के कारण दोनो राज्ये मे नदी विभाजन को लेकर विवाद था। रोहिणी नदी का पाणी शाक्य और कोलीय दोनो अपनी खेतीबाड़ी के लिए उपयोग मे लाते थे रोहिणी नदी का पाणी किसने कितना लेना इस बात को लेकर गंभीर विवाद होता था जिसका परिणाम झगड़ा,हातापाई और हिंसा मे होता था।
सिध्दार्था जब अठ्ठाईस वर्ष के थे तब शाक्या और कोलिय सेवको के बीच रोहीनी नदी के पाणी को लेकर बडा संघर्ष हुआ दोनों राज्य के लोग गभीर घायल हुए। जब संघर्ष की जानकारी शाक्य और कोलीय को मिली तब ये प्रश्न केवल युध्द के माध्यम से हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है ऐसा उन्हे लगा इसी कारण शाक्य के सेनापतीने कोलियो के साथ युध्द का ऐलान करने के प्रश्न पर विचार विमर्श के लिए शाक्य संघ का अधिवेशन बुलाया।
संघ के सभासदो को उद्देश्य कर सेनापती बोले: हमारे लोगों पर कोलियों ने हल्ला करने के कारण हमारे लोगों को उस वक्त पीछे आना पडा। इस तरह के आक्रमण इसके पूर्व अनेकों बार कोलियो द्वारा किये गये हमने आजतक सहा है इसके आगे यह सहना असंभव है यह रुकना चाहिए जिसका एकमात्र मार्ग कोलियों के विरुध्द युध्द का आगाज हैं इसलिए संघ द्वारा युध्द का ऐलान किया जाये ऐसा मैं ठराव को प्रस्तुत करता हूँ जिनका विरोध है वे अपनी बात रखें।
सिध्दार्थ गौतम आपनी जगह खडें होकर बोले:"इस ठराव को मैं विरोध करता हूँ युध्द से कोई भी प्रश्न सुलझता नही है युध्द से हमारा हेतु सफल नाही होगा बल्कि इसके कारण दुसरे नये युद्ध के बिजो का रोपण होगा। जो दुसरो की हत्या करता है उसे उसकि हत्या करनेवाला दुसरा मिलता है। जो दुसरे को जितता है उसे जितनेवाला दुसरा मिलता है। और जो दुसरे से ठगी करता है उनके साथ ठगी करनेवाला दुसरा मिलता है।
सिध्दार्थ गौतम आगे बोले: "संघने कोलियों के विरुध्द युध्द की घोषणा करणे मे जल्दबाजी नही करनी चाहिए पहले दोषी कौन है यह निश्चित करना चाहिए और गंभीरतापूर्वक तहकीकात करनी चाहिए हमारे लोगों ने भी आक्रमण किया ऐसा सुना है यह सिद्ध होता है तो हम भी निर्दोष नहीं यह सिद्ध होता है।
सेनापतीने उत्तर दिया: "हा हमारे लोगों ने आक्रमण किया तथापि हम यह न भुलें की,पानी लेनेकी पहली पहल हमारी थी।
सिध्दार्थ गौतम बोले: इससे यह स्पष्ट होता हैं कि हम दोषों से पुर्णतः नहीं हैं इसलिए मै सूचित करता हु कि,हमने हमारे शाक्य मे से दो व्यक्ति को चुनना चाहिए और कोलियों को उनमेंसे दो व्यक्तियों को चुनने के लिये कहना चाहिए और इस चारों ने मिलकर पाचवे व्यक्ति का चुनाव करना चाहिए और पांच लोगों ने विवाद को सुलझाना चाहिए।
सिध्दार्थ गौतम की सुचना को अनुमोदन मिला परंतु सेनापतीने सुचना का विरोध किया क्षत्रिय लोग युध्द मे अपना और पराया ऐसा फर्क नही करते प्रत्येक वर्ण ने आपना धर्म पालन करनेमें पुण्य है यही शास्रो की आज्ञा है। आपने राज्यके लिये अपने सगे भाइयों से युद्ध करना चाहीये सेनापति कडक शासन के पक्षधर थे।
सिध्दार्थाने उत्तर दिया: मैं धर्म का अर्थ ऐसा समझता हूँ कि बैर से बैर नहीं रुकता; बैर को प्रेम से मात दि जा सकती है। फिर भी सिध्दार्थ गौतम की सूचना को अमान्य किया गया।
सिध्दार्थ को हदपार दंड देने के कारण उनके कपिलवस्तु छोडने के पश्चात कोलियों से युध्द न करने के विरुध्द शाक्यो न बडा आंदोलना किया कोलिय हमारे भाई है ऐसी घोषणा देने लगे स्त्री पुरुष युवक युवतियों ने निदर्शन किये और इस आंदोलन का परिणाम यह हुआ कि शाक्य संघ ने पुनः सभा का आयोजन करना पडा युद्ध के प्रश्न पर फिर से विचार करना पडा और इस बार कोलियो के साथ समझौता होने के पक्ष मे जनमत तयार हुआ। कोलियो ने शांती से समझौता मध्यस्थता(Mediation)करने हेतु अपने पाच शाक्य दुत चुने गये और शाक्य दुतोसे मध्यस्थता करते के लिए पाच कोलियो के दूत चुने गये। शाक्य कोलियो के दूतों की सभा हुई और उनहोने हमेशा के लिए समझौता करनेवाले मंडल की सहमति से नियुक्ति की निर्णय के पालन की सहमति दी और इस तरह समझौता,मध्यस्थता के माध्यम से युद्ध का अंत शांतता से हुआ।
इसे वर्तमान परिपेक्ष्य मे देखा जाय तो वर्तमान मे शाक्य और कोलिय यह पक्षकार हुए और इनके द्वारा सहमति से चुनाव किया गया व्यक्ति मध्यस्थ (Meditor)हुआ वर्तमान मे मध्यस्थता के माध्यम से अपने विवादो को सौहार्दपूर्ण तरीक़े से ऐक दुसरे की भावनाओं का सन्मान कर विवाद को शांती से मिटाने का बेहतरीन माध्यम मध्यस्थता द्वारा समाज को उपलब्ध कराया है।
संदर्भ:-
CPC &
Buddha and his Dhamma
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