राजा धार्मिक हो तो ऊसकी प्रजाभी धार्मिक होती है

राजा धार्मिक हो तो ऊसकी प्रजाभी धार्मिक होती है
🇸🇨🇪🇺☸🇪🇺🇸🇨
     राज्य में राजा और ऊसकी प्रजा धार्मिक होना मतलब अनाचार, दुराचार,हत्या,पाप,व्यभिचार करकर गंगा स्नान या चारों धाम तिर्थयात्रा कर पापों से मुक्ति होना मतलब धार्मिक होना नहीं होता। इसके विपरीत धार्मिक जिवन होता है जो सदाचार और नैतिकता से परीपूर्ण होता है। "जैसा राजा वैसी प्रजा" यह आमतौर पर समान्य कहावत है लेकिन जनतंत्र मे जिस तरह प्रजा होती है, जिस स्वभाव गुणों की होती हैं वह अपने जैसाही प्रतिनिधि भी चुनती है।  राजा जिस सिद्धांत को मानने वाला होता है वैसे उसकी प्रजाभी अनुकरण करती है।
     राजा जब धार्मिक होता है तब उसके प्रधान तथा कर्मचारी धार्मिक रहते है तब बुद्धिजीवी और गृहस्थ यहभी धार्मिक होते है। जब बुद्धिजीवी और गृहस्थ धार्मिक होते है तब देशकी राज्यकि जनता भी धार्मिक होती है। जबतक राजा धर्मशील नाही होता तब तक उनके प्रधान और कर्मचारी धर्मशील हो नहीं सकते प्रधान और कर्मचारी अधार्मिक हो तो बुद्धिजीवी और गृहस्थभी अधार्मिक होते हैं।बुद्धिजीवी और गृहस्थ अधार्मिक रहे तो नगरवासी और ग्रामवासी यह भी धर्मरहित होते है।
जिस तरह जानवरों का काफिला नदी को पार करते वक्त उनमेंसे वयोवुध्द वृषभ की गलती हो गई तो वह गलत रास्ते पर चलता है गलत राह पर चलता रहा तो उनके पिछ आनेवाला सारा काफिला भी गलत रास्ते परही चलता है। इसतरह इन्सानों मे जिन्हें मुखीया काहा जाता है अगर वह वाममार्ग पर चलने लगे तो अन्य लोग भी उनके रास्ते का अवलंब करते है। इह तरह राजाने कुमार्ग पकड़ लिया तो उस समय सभी राज्य को हानी,क्षति होती है। जानवरों का काफिला नदी को पार करते वक्त मुख्य वृषभ द्वारा सिधे मार्ग का अनुकरण किया गया तो उसके पिछे रहा काफिला भी सिधे मार्ग का अवलम्बन करेगा अन्य लोग उनका अनुकरण करते है और सन्मार्ग से जाते है अगर राजा अच्छा होगा तो सारा राज्य सुखी रहता है।

Comments

Popular posts from this blog

सॉची मोहोत्सव

संस्कारशील_पीढी_ही_समाज_की_समस्या_का_समाधान_है

अधिवक्ताओं ने डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम के प्रति भारी आलोचना क्यों की?