लोकतंत्र हेतु सर्वसामान्य जागृति!!

*लोकतंत्र हेतु सर्वसामान्य जागृति!!*
🔥❓🔥❓🔥❓
*संकलन:-*
*सुरेन मेश्राम*
*अमरावती*
         *भारतीय राजनीती विशेषता वर्तमान राजनीति जो सुव्यवहारिक होने की बजाय इतनी अधिक व्यापारीक एव अव्यवहारिक हो चुकी है कि उसका दुसरा नाम भ्रष्टाचारिता हो गया है. बहुत से सभ्य सज्जन इस राजनीतिके गंदे नाले में उतरने से इनकार करते हैं राजनीती एक ऐसा घृणायुक्त गंदा नाला बन गया है कि इसके पास खड़े रहना न केवल असहनीय कर रखा हैं बल्कि अस्वस्थकर कर रखा है राजनीतीज्ञ बनना गंदे नाले में काम करने के सामान हैं लोकतंत्रको बचाने के लिये समाजके साफ सुथरे तथा नैतिक लोगोंका राजनीतिमें आना बेहद जरीर है लोकतांत्रिक सरकार तबतक लोकतांत्रिक बनी रहती है जबतक इसे दो दल चलाये एक सत्तारूढ दल दुसरा विपक्ष दल यदी विपक्ष दल ही न हो तो लोकतंत्र नामात्र रह जाता है सरकार चलाने के लिए सत्तापक्ष के अतिरिक्त एक विरोधी पक्ष का होना भी आवश्यक है और विपक्ष का वर्तमान अस्तीत्व शुन्य है विपक्ष का ना होणा याह सोचनीय है और सर्वसामान्य जनता को कहा जाता है के राजनीति यह गंदे नाले की गंदगी है मगर लोकतंत्र का आधार राजनीतिक नितीमत्ता है जो डॉ.बाबासाहब ने मार्गदर्शीत किया है.*
*लोकतंत्र की सफलता इस बात पर निर्भर करती है कि मतदाता को मताधिकार का अवसर दिया जाए परंतु मतदार का अधिकार EVM मशीन द्वारा करने से पारदर्शीता खत्म की जा चुकी है आज EVM मतलब शासन करने का अधिकार है आज सर्वसामान्य का मताधिकार तो छिन लिया है लोकतत्र मे सरकारने समाजके प्रती लोकतांत्रिक होना जरुरी है यादी समाज मे सामाजिक लोकतंत्र नाही हो तो लोकतंत्र के औपचारीक ढाचे की कोई क़ीमत नहीं होती बल्कि यह परिस्थितीयो के विपरीत कार्य करनेवाली वस्तु होती है जो परस्पर विरोधी मतलब अधिकारयुक्त और अधिकार रहीत लोगों के बीच भेट पैदा करती है लोकतंत्रमे यह घटकोका न होना मतलब समाज को प्रभावित करना है.*
*सामाजिक विषमताये जो दबाये गये सताया गया वर्ग पर अत्याचार समता का आभाव, विपक्ष की अस्तित्वहिनता एवं राजनीतिक उदासीनता, कानून और प्रशासन के समक्ष बाराबरि का अभाव, अन्याय का शिकार वह वर्ग जिसे मुक्ती दिलाने सहाय्यता हक्क दिलाने के लिये जबतक समाज का हर व्यक्ति पुरी तरहसे तयार नही रहता तब तक लोकतंत्र पर हम कलंक है. अगर हम  कलंक को मिटा नहीं पाते है तो क्रांतिकारी सोच और देशभक्ति की सोच केवल नौटंकी है जो लोकतंत्र को विफल करती है विफलता को सफलता मे परिवर्तीत करने के लिऐ संवैधानिक नैतिकता जो स्वातंत्र, समता,बंधुता जो लोकतंत्र में हमेशा सामान्य स्थिति को प्रचलित करती है यदी इसमें नैतिकता और व्यावहारिक व्यवस्था नहीं रहती है तो व्यवस्था के टुकड़े टुकड़े हो जाते है.*
*लोकतंत्र में विपक्ष और निष्पक्ष चुनाव धनी और व्यापारी लोग किसी भी राजनैतिक दलों को चुनाव कोष में धन देकर और चुनाव को बुरी तरहा से प्रभावित कर समाज को इसका परिणाम विगत सत्तर वर्षों से मिलते आया है और आज भी वही मिल रहे है इसका परीनाम सारी सुविधा इन्हें ही को मिलती है, कानुनो में बदलाव कर स्वयं को लाभकर सत्तारुढ दल की सहायता से समाज को प्रभावित करते आऐ है जो अनैतिक है समझ और नासमझ का अंतर जो महाभारत युद्ध के दौरान भीष्म और कौरव एकसाथ थे पांडवो का पक्ष सही था कौरवो का गलत था भीष्म से पूछा गया अगर पांडव सही है तो कौरवो के साथ क्यों? भीष्मने उत्तर दिया मुझे नमक के प्रति वफादारी करना है कौरव का दिया खाता हूं तो उनके प्रति वफादारी करना जरुरी है चाहे पक्ष गलत क्यों न हो आज यही तो हो रहा है सही को सही कहने तथा गलत का विरोध करने का साहस नहीं है वह काबलियत नैतिकता से निर्माण हो सकती है.*
*आज वर्तमान मे पिछडे, अल्पसंख्यक, श्रमिक वर्ग को व्यवस्था की दास्ता में जकडा है जो शिक्षा विरहित रहने की पुरी व्यवस्था को बरकरार रखा जा रहा है जो आजभी अधिकारो से वंचित हैं, जो व्यक्ति, संघटन, आकलनीय बुद्धिमत्ता, ज्ञान से वंचित है आजकी ऐसी स्थिती का यथायोग्य निर्माण कर विषमतावादी व्यवस्था को बरकरार रखकर लोकतंत्र को जानबूझकर मजाक बनाया है.*

Comments

Popular posts from this blog

सॉची मोहोत्सव

संस्कारशील_पीढी_ही_समाज_की_समस्या_का_समाधान_है

अधिवक्ताओं ने डॉ.बाबासाहेब आंबेडकर द्वारा हिंदू विवाह अधिनियम के प्रति भारी आलोचना क्यों की?