मैत्री अंत करण की स्वतंत्रता

 
मैत्री सिर्फ दोस्तों के साथ बैठने या हँसी-मजाक, खान-पान करना अपना समय एक-दूसरे के साथ बिताना यही मैत्री का अर्थ लेकर चलते है। 

मैत्री तो दुराचारी अनैतिक लोग जिसमें कुसंगति,अभिमानी,जुआरी, व्यभिचारी, शराबी, धोखेबाज़, रिश्वतखोर और हिंसक ऐसे स्वभाव के व्यक्तियों की भी मैत्री होती है इस तरह की नकारात्मक मैत्री से बेहतर है कि सदाचारी व्यक्ति एकांत में रहो, पर सच्चाई का साथ न छोडे। मूर्ख की संगति से दूर रहे; जैसे जंगल में हिरण अकेला फिरता है, वैसे ही आत्मनिर्भर बने।

सच्ची और व्यापार मैत्री बौद्ध धम्म के अनुसार सिर्फ भावना नहीं, वो धम्म की ज्वाला है। पुण्यकर्म भी उतना मूल्य नहीं रखते जितना मैत्री का एक अंश! मैत्री, अंतःकरण की स्वतंत्रता है। वह सब पुण्यकर्मों को अपने में समेट लेती है, प्रकाशित होती है, प्रज्वलित होती है।

मैत्री की व्यापकता सम्पूर्ण प्राणिजगत संपूर्ण जीवमात्र के प्रति करुणा और बंधुभाव। यह केवल मित्रों के लिए नहीं, बल्कि शत्रु के लिए भी उतना ही प्रेमभाव यह भाव केवल मित्रों के लिए नहीं, शत्रुओं के लिए भी हो, यही सच्ची मानवता है।

अगर कभी अपमान हो तो उसका उत्तर भी मैत्री से दे। मैत्री से आत्मविश्वास और ध्येय के प्रति आस्था को मज़बूत करती है। यह अंत:करण की वह स्वतंत्रता है, जो सभी पुण्य कर्मों को अपने भीतर समाहित कर स्वयं प्रकाशमान होने के मार्ग पर चलता है। सम्यक मैत्री में विचार विशाल और शांति से भरा हों मित्रता में कोई सीमा न हो। और द्वेष का कहीं कोई स्थान न हो। 

मैत्री कोई एक दिन,एक महिना एक, साल की संकल्पना नहीं है यह जिवन पद्धति है यह जिने की प्रक्रिया है मैत्री तभी साबीत होगी जब उसका आचरण होगा!

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